Wednesday, November 25, 2009

Traffic jam: aam aadmi ke aaine mein



 अपने लिखने के पूर्व आपके समक्ष दिल्ली की ट्राफिक की दो तस्वीरें रख रहा हूँ. कृपया सोचियेगा की क्या आप अपनी जिन्दगी में इस तरह के हालत से कभी दो- चार हुए हैं. दिल्ली  की सडकें संभवतः पुरे देश की सबसे कुख्यात सड़कों में से एक है. बाइक सवारों द्वारा खुलेआम जहाँ ट्रेफिक नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं वहीँ उनसे भी दो कदम आगे ब्लू लाइन बस वाले तो यमदूत के गण बने बैठे हैं. शायद उन्हें अनुशासनहीनता का लायसेंस भी उन्हें साथ ही मिल जाता है. पैदल चलने वाले अक्सर ही घायल होते हैं. कभी सड़क हादसों में गंभीर रूप से घायल होकर सड़क पर तड़पते हुए दम तोड़ देते हैं, तो कभी जीवन भर के लिए अपंग होकर सहारे को मोहताज हो जाते हैं. अभी पिछले दिनों मेरे एक सहकर्मी ने अपना अनुभव बताया की उसने एक बार एक फौजी ट्रक ड्राईवर को विजय चौक की रेड लाइट पर बिलकुल लापरवाही के साथ रेड लाइट पर खड़े एक वृद्ध साईकिल चालक को अपने पहियों के नीचे कुचलते हुए देखा था. सुनकर मेरी तो रूह काँप गई की क्या ऐसी भी लापरवाही होती है? यह घटना करीब १५-२0 वर्ष पहले की है, जब की दिल्ली की सड़कों पर इतनी भीड़ भी नहीं हुआ करती थी. ऐसा नहीं है की दिल्ली की ट्राफीक पुलिस कुछ करती नहीं है या कुछ नहीं करना चाहती है. पर मैं अपने पिछले ब्लॉग  में उठाये गए सवाल को फिर से दुहराना चाहूँगा की हम जिम्मेदार कब होंगे?  जबकि हम देखें तो पायेंगे की दिल्ली में खासकर लुत्येंस' जोन में विशेषतौर पर ट्राफिक का इतना बेहतरीन इंतजाम है की शायद हमें यह पुरे देश में कहीं न मिले. इतने फ्लाय ओवेर्स जितने शायद पुरे देश में कहीं नहीं है.फिर भी जाम और जाम! कल मेरा एक सहकर्मी कार्यालय से घर जाने के दौरान जब बस से तीन मूर्ती मार्ग पर पहुंचा तो उसने पाया की वहां जाम ही जाम लगा है. हमारे ऑफिस की कार अनुभाग अधिकारी तो छोड़ने के दौरान जब बंगला साहिब मार्ग पर पहुंची तो वहां उसने पाया की वहां से पन्च्कुइयान रोड तक भरी जाम लगा है. पीछे मुड़ने की कोशिश की तो पाया की लोग  आड़े तिरछे अपनी गाड़ियों को निकलने के प्रयास में उस जाम को और विकट बना रहे हैं. अगले दिन सुबह ड्राईवर ने बताया की एक ब्लू लाइन बस जब आगे निकलने के लिए दूसरी को बिलकुल रगडती हुई चली गई तब जाकर कहीं जाम टूटा. मुझे एक बात समझ में नहीं आती है की जब वी आय पी रूट के लिए जब ट्राफिक को रोक दिया जाता है या उसका रास्ता बदल दिया जाता है तो इन जुलूसों और जलसों के लिए क्या यह उचित नहीं है? खैर में अपने उस साथी के अनुभव पर आता हूँ. तीन मूर्ति मार्ग पर प्रवेश करते ही उसने पाया की ट्राफिक की दो कतारों की जगह चार-पांच कतारें हो गई हैं. मैं खुद भी बस का यात्री हूँ. और कई बार ब्लू लाइन बस का शिकार होते-होते बचा हूँ. एक बार तो मेरी कलाई की हड्डी टूटते टूटते बची थी और एक बार में खुद पहिये के नीचे आते आते बचा. अतः ऐसे अनुभव मेरी रोजाना जिंदगी का हिस्सा हैं. पर मेरा वह साथी अपने स्कूटर पर आता-जाता है अतः उसके लिए यह एक नया अनुभव था. खैर पुराणी बात पर आते हैं. तो फिर हर कतार का वाहन चालक अपने वाहन को आगे निकलने के चक्कर में सड़क पर एक अच्छा खासा जिगसा पजल बना रहा था जिसे क्रमवार करना शायद  किसी के बस में नहीं था. मैंने कई बार ट्राफिक पुलिस वाले को अनियंत्रित ट्राफिक को नियंत्रित करने के प्रयास में असफल होकर सर पर हाथ मरते और बीडी फूंकते देखा है. क्या नियमों के पालन का ठेका नियम पालन कराने वालों ने ही ले रखा है. ?या हम इतने नासमझ हैं की बगैर समझाए मानते ही नहीं. और कई बार हद तो तब हो जाती है की गलती करते पकडे जाने पर छूटने की जुगत भिड़ाते रहते है कभी धनबल से तो कभी बाहुबल से!  फिर से वही सवाल की हम आखिर कब सुधरेंगे ? हर साल सड़क पर गाड़ियों की भीड़ बढती जा रही है. लोगों की भीड़ बढती जा रही है. फिर इसका उपाय क्या है. क्या हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे या कुछ करें. कृपया बताइयेगा.

26/11: do youth feel safe and secrue thereafter?


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२६ नवम्बर २००८: भारतीय इतिहास का एक और काला दिवस! क्या यह दिन और दिनों कि तरह याद आएगा, खासकर तब जब कि उस दिन आतंकवादियों ने यह सन्देश देने कि कोशिश की थी हम भारतीय बस उन खुनी भेडिओं के पंजों में मात्र निरीह मेमनों की मानिंद हैं. अपने सरों को कलम होने और अपने शरीर को चलनी होने के इंतज़ार में मुंह छुपाये! खासकर तब जब की हमने नीरो की मानिंद अपने सपनों में खोये हुए उन आतंकवादियों को अपनी  ज़मीं पर बगैर किसी प्रतिरोध के घुस जाने दिया और पूरी दुनिया को यह सन्देश दिया की हम भारतीय भीगे चूहों की तरह मारे जाने को तैयार बैठे हैं! अपनी ही जमीं पर हमें अपने प्राणों की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ा. इस शर्मनाक घटना को आज एक वर्ष हो जायेगा. इस देश की सुरक्षा की मौत को आज एक साल हो गया है. क्या हम आज सचमुच जिन्दा हैं ? क्या हम मात्र यह कहकर बच सकते हैं की आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है? क्या और देश आतंकवाद से नहीं लड़ रहे हैं? हम जो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने की दुहाई देते हैं क्या हमारा  वह तंत्र अपने लोगों की सुरक्षा के प्रति गंभीर है? निश्चित तौर पर कुछ कदम उठाये गए हैं परन्तु 'का वर्षा जब कृषि सुखाने, समय चूकी पुनि का पछताने', क्या हमारा सूचना तंत्र इतना संवेदनशील है की वह घटना!!!!!!!!!! दुर्घटना  के होने के पूर्व  उसकी आपात सुचना दे सके. कभी- कभी मुझे लगता है की सरकार ने आतंक की जड़ों को काटने के लिए कुछ भी नहीं किया है. किन्तु जब हम इसे सरकार के नज़रिए से देखते हैं तब ? हमारे पास पुलिस है, फ़ौज है, कमांडो हैं, फिर भी हम फेल हो जाते है! वज़ह, शायद हम यह समझ ही नहीं पाए हैं की आतंकवादियों के सर पर सींग नहीं होते. वो भी हमारी तरह ही होते हैं. और शायद इन्हें अपने बीच जगह देने वाले भी हम ही हैं! जरुरत है अपनी आँखें और कान खुले रखने की. जरुरत है रात के सन्नाटों में होने वाली दबी आहटों को सुनने की . जरुरत है अपने पड़ोस के मीर जाफर और जयचंदों को पहचानने की! लेकिन क्या हम उस आहट को सुन पा रहे हैं. अगर हम आतंकवाद के मायने नहीं समझ पा रहे हैं तो न हम सुरक्षित हैं और न कभी सुरक्षित होंगे. आतंकवाद है क्या कुछ सनकी और सिरफिरे लोगों के द्वारा अपनी बात मनवाने के लिए अपनाये जाने वाला वहशियाना तरीका! क्या जो दिल्ली की सड़कों पर रोज  रात को रोड रेज की वारदातें हो रही हैं क्या वह आंतकवाद नहीं है.  आतंकवादियों की गोलियों से नहीं मरे तो किसी ब्लू लाइन के पहिये के नीचे आकर मरेंगे या  शराब पीकर गाडी चलते हुए किसी रईसजादे के गाडी के पहियों के नीचे आकर......... या किसी फ़िज़ूल के विरोध प्रदर्शन के चलते फैले दंगे की आंच में झुलस कर मरेंगे.......... (हालाँकि हमारे नेताओं का भी इसमें हाथ होता है पर आम जनता भी इससे अलग नहीं है) मतलब इसके कईएक कारण हो सकते हैं......... मतलब अनगिनत क्या सड़क पर कोई महिला आँखों के सामने बेइज्जत होकर मर जाती है तो किसी को  सरेशाम बलात्कार का शिकार होना पड़ता है तो क्या ये आतंकवाद नहीं है. असल में सवाल तो यह है की क्या हमें इस सवाल को उठाने का अधिकार है? क्योंकि जब हम खुद जीना चाहते हैं तो हमें दूसरों को भी जीने का अधिकार देना पड़ेगा. जिस तंत्र पर हम उंगली उठा रहे है क्या हम उसी तंत्र का हिस्सा नहीं हैं. जिस सी एम के सामने ये सब कुछ हुआ वो सी एम दुबारा से एम पी बनकर आज मंत्री बन गया है . जिस डिप्टी सी एम के सामने ये सब कुछ हुआ वो आज फिर से होम मिनिस्टर बन गया है. पर क्या जब हम उन्हें एम पी और विधायक नहीं चुनते तो क्या  वो फिर से सत्ता में आ पाते! मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ की इसका सीधा सादा मतलब है की या तो हमनें इस चुनौती को गंभीरता से नहीं लिया है या फिर हमारी नज़र में उन्होंने जो किया वह सही था? और यदि सही था तो फिर इस तंत्र को कोसने का क्या अर्थ है यह मेरी समझ में नहीं आया. कल टीवी पर मैंने जस्टिस लिब्रहान का गुस्सा देखा तो क्या एक जिम्मेदार न्यायवादी जब गुस्से में आप खो सकता है तो क्या एक बहकी हुई भीड़ नहीं खो सकती...... असल में हम कभी एक अराजकतावादी भीड़ मात्र बनकर रह जाते हैं तो कभी किसी साधू सन्यासी की भांति ज्ञान की बात बघारते रहते हैं .. आज सुबह समाचारपत्र में देखा फोर्स वन का गठन हुआ है पर इस बात की गारंटी भी होनी चाहिए की फिर फोर्स वन का कोई जवान शहीद करकरे की तरह बुल्लेट फ्रूफ जैकेट के बाद भी गोलियों का शिकार न हो जाये.  इसके बाद भी दिल से यही आवाज़ निकलती है भैया ये इंडिया है, यहाँ सब चलता है, ताज होटल भी अपने जख्म पोंछ कर फिर से टूरिस्ट का स्वागत कर रहा है, लिओपोल्ड कैफे भी गुलज़ार है. यानी कुछ भी हो जाए हमारे जज्बे को कोई दबा नहीं सकता. पर फिर सवाल यही है की हम जिम्मेदार कब होंगे?  

Tuesday, November 10, 2009

Yuvaon Mein Dharma Aur Adhyatmikta

धर्मं मानव जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है! अगर हम खुले मन मस्तिस्क से विचार करें तो हम पाएंगे की हर धर्मं के तीन मुख्य अंग होते हैं. पवित्र प्रतिक चिह्न, उनके रीती- रिवाज और सबसे महत्वपूर्ण है उनकी आस्थाएं. धर्मानुसार उनके प्रतिक चिह्न अलग अलग होते हैं! कहीं ॐ को पवित्र माना   जाता है वहीँ  दुसरे सितारों को पवित्र मानते है तो कही अग्नि पवित्र होती है  तो कहीं क्रॉस को पवित्र माना जाता है. इसी प्रकार धर्मानुसार उनके रीती रिवाज भी अलग अलग होते हैं. कुछ पूर्व की और होकर प्रार्थना करते हैं तो कुछ पश्चिम की और होकर सर झुकाते हैं.  कुछ घंटी बजाते हैं तो कुछ घुटनों के बल बैठ कर अपना सर झुकाते हैं. इसी प्रकार प्रतीकों और धार्मिक चिन्हों तथा उनके रीती रिवाजों में भी विभिन्नता पुरे विश्व में पाई जाती रही है.

परन्तु, इतने विभेदों के बावजूद भी सभी धर्मं समान हैं! सभी एक जैसे बातों पर ही जोर देते हैं. " चोरी मत करो", " झूठ मत बोलो" , " हमेशा धर्मं के मार्ग पर चलो" इत्यादि. मित्रभाव, भ्रातृत्व, सहानुभूति,  और प्रेम ही हर धर्मं की बातों का सार होता है.

यह बात जानने लायक है की पूर्व के सभी धर्मं चाहे वो हिन्दू हो या जैन, बौद्ध हो या सिख या फिर शिन्तो हरेक ने भ्रात्रित्वपूर्ण सहअस्तित्व की बात की है, एक दुसरे के धर्मों और विश्वासों के सम्मान की बात की है. हालाँकि कुछ बातों पर मतभेद थे और होते रहे किन्तु कभी भी धार्मिक मतभेदों को लेकर खून- खराबे जैसी बात देखने को नहीं मिली. उल्टे ज्ञानी एवं जानकार लोग वैचारिक मामलों पर शास्त्रार्थ किया करते थे और एक दुसरे को अपने ज्ञान एवं जानकारी से सहमत करने की कोशिश किया करते थे. पश्चिम में प्रचलित धर्मों एवं मतों ईसाई, यहूदी, इसलाम  आदि अपने विश्वासों को लेकर हमेशा आपस में लड़ते रहे और अब तो उनकी इस लडाई ने पूरब का भी रुख कर लिया है.

किन्तु यह बात समझ में नहीं आती है की जब सारे धर्मों और मतों के विश्वास  और मान्यताएँ एक ही जैसी हैं तो आपस में लडाई क्यों? मात्र इस बात पर कि मैं पूरब की ओर मुख कर पूजा करता हूँ और तुम पश्चिम की ओर मुंह कर उपासना करते हो, लोग लड़ते हैं.  मेरे लिए  अगर क्रॉस पवित्र है ओर तुम्हारे लिए चंद्रमा तो हम लडाई करें, ये कोई विवाद का मुद्दा तो नहीं है. ऐसी बातों पर लडाई करना तो बचपना है. ऐसी सारी लडाई मात्र धर्म कि बचपने भरी विवेचना मात्र से ही उपजी हैं. पुरे विश्व भर के लोगों को इस बात को समझना पड़ेगा. धर्मं केले के छिलके की तरह है ओर आध्यात्मिकता उसके अन्दर का फल है. धर्मं महत्वपूर्ण है क्योंकि वो आपको आपके उत्थान की और ले जाता है. किन्तु धर्मं को समझने के लिए हमें धर्मं के अंतर में प्रवेश करना पड़ेगा और धर्मं के अंतर में स्थित यही धर्मं का मूल है जिसे हम आध्यात्मिकता कहते हैं. मेरा तो यह मानना है की आध्यात्मिकता मूलतः वही स्वरुप है जिसे धर्मं प्राप्त करना चाहता है जब वह पुरे विकसित रूप में आता है.

भारतीय आध्यात्मिकता ऐसी शक्ति है जो सबको एकजुट रखना जानती है. यह बताती है की एक लक्ष्य को पाने के कई रास्ते हो सकते है  पर सबकी मंजिल अंत में एक ही होती है. और तभी वह सबको स्वीकार करती हुए जीवन को उसकी शानदार विविधता के साथ जीना सिखाती है. उसकी नजर में मानव जीवन धार्मिक विश्वासों की तुलना में हमेशा महत्वपूर्ण रहा है और उसने कभी भी जीवन को धर्मं की बलि चढ़ने का समर्थन नहीं किया है. जब हम आध्यात्मिकता, योग, एवं समाधि जैसी बातों की और विचार करते हैं एवं इन्हें अपने जीवन में अपनाते हैं तो  हम सिर्फ उस परम शक्ति से साक्षात्कार का मात्र एक माध्यम  अपनाते हैं परन्तु इसका यह अर्थ कतई नहीं है की और कोई दूसरा माध्यम  हैं ही नहीं! हमें दुसरे माध्यमों का भी उतना ही सम्मान करना चाहिए. जैसा की श्री श्री रविशंकर जी अपनी आर्ट ऑफ़ लिविंग में कहते है की अपने क्षितिज को विस्तार दो किन्तु अपने जड़ों को गहरा करो.

" मात्र मेरा रास्ता सही है, बाकी सब गलत है" आतंकवाद इसी कट्टरवादी विश्वास की उपज है. आज हम जिसे आतंकवाद का नाम देते है वह तो सदियों से पश्चिमी बर्बर्तावादी विचारधाराओं के साथ चलता आ रहा है. फर्क इतना है की वह बर्बरता आज आधुनिकता का रूप धारण कर रही है. पर रंग रूप बदलने से क्या होगा. क्या हम उसका चरित्र बदल सकते है जो रक्त से सराबोर है? इस बर्बर्तावादी विचारधारा के बीज को समाप्त करने का मात्र एक ही उपाय है की हमें एक व्यापक चरित्र वाले, बहुधार्मिक एवं बहुसांस्कृतिक शिक्षा प्रणाली को आत्मसात करते हुए उसे अपने जीवन में स्थापित करना होगा. भारत समेत पुरे विश्व में व्यापित जाति एवं धर्मं आधारित विभेद, जिसे भ्रष्टाचारी एवं सत्ता- लोलुप समाज के ठेकेदारों ने मात्र अपने तुच्छ लाभों के हेतु प्रश्रय देकर पुरे समाज को विष-व्यापित कर रखा है, के नाश का मात्र एक ही उपाई है की हम धर्मं के बदले उसमे समाहित आध्यात्मिकता को महत्व दें. नहीं तो हम मूर्खों की तरह मात्र केले के छिलके पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करते रहेंगे और उसके अन्दर समाहित केले के स्वादिष्ट फल को त्याग कर उसके अनुपम स्वाद एवं आनंद से वंचित रह जायेंगे.

कुछ लोग कहते है की धर्मं का जन्म भय के बीज से हुआ है. पर मेरा तो यह मानना है कि धर्मं का जन्मा विश्वास से हुआ है. भय तो मात्र कुछ समय तक ही कारगर हो सकता है उसके उपरांत व्यक्ति परिणाम के लिए तैयार हो जाता है.मात्र प्रेम एवं विश्वास ही लम्बे अरसे तक कारगर हो सकता है क्योंकि उससे भावनाये जुडी होती हैं. अगर हम भारत के प्राचीन इतिहास को खंगालेंगे तो हम पाएंगे कि भारत कि सभ्यता और संस्कृति पर प्राचीन काल  से लेकर आधुनिक काल तक हजारों आक्रमण हुए किन्तु न तो वे भारत का आस्तित्व मिटा पाए और न भारतीयता का. बल्कि वे खुद इसमें समाहित होकर भारतीयता का अंग बन गए और अभी भी फल-फूल रहे हैं. पिछले हजारों सालों से होते आ रहे हमलों और आतंरिक कलह के बाद भी भारत एक सशक्त शक्ति बनकर आज भी खडा है. भारतीय आध्यात्मिकता पुरे विश्व के लिए एक खुली किताब है जिससे शांतिपूर्ण सहस्तित्व का सबक सीखा जा सकता है. पर इससे भी महत्वपूर्ण है यह कि हम भारतवासी युवाओं को जिनके ऊपर पुरे देश के भविष्य का दारोमदार है, हमारे महान संतों द्वारा सिखाया गया यह सबक फिर से सीखना होगा. भूतकाल के संतों एवं ऋषियों का सिखाया गया यह सबक ही हमें भविष्य में इस महान पृथ्वी पर हमारा उचित स्थान प्राप्त करा सकता है. जिस भारत को 'जगतगुरु" कि पदवी प्राप्त थी, उसे फिर उस सम्मान को प्राप्त करने कि जरुरत है.

antarvyatha

Aaj kal yuva rajniti ka bada Jor chal raha hai. Main aur mere jaise kai sathi sochte hain ki ye yuva rajniti hai kya bala. aaj bhi hamare MPs aur MLAs ki ausat umra 50 se upar hai to kya we yuva hain. Kya ek Rahul Gandhi ke aane se sari rajniti yuva ho jati hai. Rahulji ki soch bahut aachi hai par mera maanna hai ki ye yuva rajniti aristocrate yuva logo ki jagah aam yuvaon ki honi chahiye. Ek aam yuva jo subah ki roti khane ke baad sham ki roti ki chinta mein ghulte aapne pita ko dekhta hai. Jo chupchap sara khana apne bacchon ko khilane ke bad bhukhi rahti maa ka dard janta hai. Ek yuva jiske man mein system se larne aur uski kamjoriyan door karne ki tarap hai. Kahan hai wo yuva. Shayad abhi tak rajniti mein unke liye jagah nahi bani