अपने लिखने के पूर्व आपके समक्ष दिल्ली की ट्राफिक की दो तस्वीरें रख रहा हूँ. कृपया सोचियेगा की क्या आप अपनी जिन्दगी में इस तरह के हालत से कभी दो- चार हुए हैं. दिल्ली की सडकें संभवतः पुरे देश की सबसे कुख्यात सड़कों में से एक है. बाइक सवारों द्वारा खुलेआम जहाँ ट्रेफिक नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं वहीँ उनसे भी दो कदम आगे ब्लू लाइन बस वाले तो यमदूत के गण बने बैठे हैं. शायद उन्हें अनुशासनहीनता का लायसेंस भी उन्हें साथ ही मिल जाता है. पैदल चलने वाले अक्सर ही घायल होते हैं. कभी सड़क हादसों में गंभीर रूप से घायल होकर सड़क पर तड़पते हुए दम तोड़ देते हैं, तो कभी जीवन भर के लिए अपंग होकर सहारे को मोहताज हो जाते हैं. अभी पिछले दिनों मेरे एक सहकर्मी ने अपना अनुभव बताया की उसने एक बार एक फौजी ट्रक ड्राईवर को विजय चौक की रेड लाइट पर बिलकुल लापरवाही के साथ रेड लाइट पर खड़े एक वृद्ध साईकिल चालक को अपने पहियों के नीचे कुचलते हुए देखा था. सुनकर मेरी तो रूह काँप गई की क्या ऐसी भी लापरवाही होती है? यह घटना करीब १५-२0 वर्ष पहले की है, जब की दिल्ली की सड़कों पर इतनी भीड़ भी नहीं हुआ करती थी. ऐसा नहीं है की दिल्ली की ट्राफीक पुलिस कुछ करती नहीं है या कुछ नहीं करना चाहती है. पर मैं अपने पिछले ब्लॉग में उठाये गए सवाल को फिर से दुहराना चाहूँगा की हम जिम्मेदार कब होंगे? जबकि हम देखें तो पायेंगे की दिल्ली में खासकर लुत्येंस' जोन में विशेषतौर पर ट्राफिक का इतना बेहतरीन इंतजाम है की शायद हमें यह पुरे देश में कहीं न मिले. इतने फ्लाय ओवेर्स जितने शायद पुरे देश में कहीं नहीं है.फिर भी जाम और जाम! कल मेरा एक सहकर्मी कार्यालय से घर जाने के दौरान जब बस से तीन मूर्ती मार्ग पर पहुंचा तो उसने पाया की वहां जाम ही जाम लगा है. हमारे ऑफिस की कार अनुभाग अधिकारी तो छोड़ने के दौरान जब बंगला साहिब मार्ग पर पहुंची तो वहां उसने पाया की वहां से पन्च्कुइयान रोड तक भरी जाम लगा है. पीछे मुड़ने की कोशिश की तो पाया की लोग आड़े तिरछे अपनी गाड़ियों को निकलने के प्रयास में उस जाम को और विकट बना रहे हैं. अगले दिन सुबह ड्राईवर ने बताया की एक ब्लू लाइन बस जब आगे निकलने के लिए दूसरी को बिलकुल रगडती हुई चली गई तब जाकर कहीं जाम टूटा. मुझे एक बात समझ में नहीं आती है की जब वी आय पी रूट के लिए जब ट्राफिक को रोक दिया जाता है या उसका रास्ता बदल दिया जाता है तो इन जुलूसों और जलसों के लिए क्या यह उचित नहीं है? खैर में अपने उस साथी के अनुभव पर आता हूँ. तीन मूर्ति मार्ग पर प्रवेश करते ही उसने पाया की ट्राफिक की दो कतारों की जगह चार-पांच कतारें हो गई हैं. मैं खुद भी बस का यात्री हूँ. और कई बार ब्लू लाइन बस का शिकार होते-होते बचा हूँ. एक बार तो मेरी कलाई की हड्डी टूटते टूटते बची थी और एक बार में खुद पहिये के नीचे आते आते बचा. अतः ऐसे अनुभव मेरी रोजाना जिंदगी का हिस्सा हैं. पर मेरा वह साथी अपने स्कूटर पर आता-जाता है अतः उसके लिए यह एक नया अनुभव था. खैर पुराणी बात पर आते हैं. तो फिर हर कतार का वाहन चालक अपने वाहन को आगे निकलने के चक्कर में सड़क पर एक अच्छा खासा जिगसा पजल बना रहा था जिसे क्रमवार करना शायद किसी के बस में नहीं था. मैंने कई बार ट्राफिक पुलिस वाले को अनियंत्रित ट्राफिक को नियंत्रित करने के प्रयास में असफल होकर सर पर हाथ मरते और बीडी फूंकते देखा है. क्या नियमों के पालन का ठेका नियम पालन कराने वालों ने ही ले रखा है. ?या हम इतने नासमझ हैं की बगैर समझाए मानते ही नहीं. और कई बार हद तो तब हो जाती है की गलती करते पकडे जाने पर छूटने की जुगत भिड़ाते रहते है कभी धनबल से तो कभी बाहुबल से! फिर से वही सवाल की हम आखिर कब सुधरेंगे ? हर साल सड़क पर गाड़ियों की भीड़ बढती जा रही है. लोगों की भीड़ बढती जा रही है. फिर इसका उपाय क्या है. क्या हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे या कुछ करें. कृपया बताइयेगा.
Wednesday, November 25, 2009
Traffic jam: aam aadmi ke aaine mein
अपने लिखने के पूर्व आपके समक्ष दिल्ली की ट्राफिक की दो तस्वीरें रख रहा हूँ. कृपया सोचियेगा की क्या आप अपनी जिन्दगी में इस तरह के हालत से कभी दो- चार हुए हैं. दिल्ली की सडकें संभवतः पुरे देश की सबसे कुख्यात सड़कों में से एक है. बाइक सवारों द्वारा खुलेआम जहाँ ट्रेफिक नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं वहीँ उनसे भी दो कदम आगे ब्लू लाइन बस वाले तो यमदूत के गण बने बैठे हैं. शायद उन्हें अनुशासनहीनता का लायसेंस भी उन्हें साथ ही मिल जाता है. पैदल चलने वाले अक्सर ही घायल होते हैं. कभी सड़क हादसों में गंभीर रूप से घायल होकर सड़क पर तड़पते हुए दम तोड़ देते हैं, तो कभी जीवन भर के लिए अपंग होकर सहारे को मोहताज हो जाते हैं. अभी पिछले दिनों मेरे एक सहकर्मी ने अपना अनुभव बताया की उसने एक बार एक फौजी ट्रक ड्राईवर को विजय चौक की रेड लाइट पर बिलकुल लापरवाही के साथ रेड लाइट पर खड़े एक वृद्ध साईकिल चालक को अपने पहियों के नीचे कुचलते हुए देखा था. सुनकर मेरी तो रूह काँप गई की क्या ऐसी भी लापरवाही होती है? यह घटना करीब १५-२0 वर्ष पहले की है, जब की दिल्ली की सड़कों पर इतनी भीड़ भी नहीं हुआ करती थी. ऐसा नहीं है की दिल्ली की ट्राफीक पुलिस कुछ करती नहीं है या कुछ नहीं करना चाहती है. पर मैं अपने पिछले ब्लॉग में उठाये गए सवाल को फिर से दुहराना चाहूँगा की हम जिम्मेदार कब होंगे? जबकि हम देखें तो पायेंगे की दिल्ली में खासकर लुत्येंस' जोन में विशेषतौर पर ट्राफिक का इतना बेहतरीन इंतजाम है की शायद हमें यह पुरे देश में कहीं न मिले. इतने फ्लाय ओवेर्स जितने शायद पुरे देश में कहीं नहीं है.फिर भी जाम और जाम! कल मेरा एक सहकर्मी कार्यालय से घर जाने के दौरान जब बस से तीन मूर्ती मार्ग पर पहुंचा तो उसने पाया की वहां जाम ही जाम लगा है. हमारे ऑफिस की कार अनुभाग अधिकारी तो छोड़ने के दौरान जब बंगला साहिब मार्ग पर पहुंची तो वहां उसने पाया की वहां से पन्च्कुइयान रोड तक भरी जाम लगा है. पीछे मुड़ने की कोशिश की तो पाया की लोग आड़े तिरछे अपनी गाड़ियों को निकलने के प्रयास में उस जाम को और विकट बना रहे हैं. अगले दिन सुबह ड्राईवर ने बताया की एक ब्लू लाइन बस जब आगे निकलने के लिए दूसरी को बिलकुल रगडती हुई चली गई तब जाकर कहीं जाम टूटा. मुझे एक बात समझ में नहीं आती है की जब वी आय पी रूट के लिए जब ट्राफिक को रोक दिया जाता है या उसका रास्ता बदल दिया जाता है तो इन जुलूसों और जलसों के लिए क्या यह उचित नहीं है? खैर में अपने उस साथी के अनुभव पर आता हूँ. तीन मूर्ति मार्ग पर प्रवेश करते ही उसने पाया की ट्राफिक की दो कतारों की जगह चार-पांच कतारें हो गई हैं. मैं खुद भी बस का यात्री हूँ. और कई बार ब्लू लाइन बस का शिकार होते-होते बचा हूँ. एक बार तो मेरी कलाई की हड्डी टूटते टूटते बची थी और एक बार में खुद पहिये के नीचे आते आते बचा. अतः ऐसे अनुभव मेरी रोजाना जिंदगी का हिस्सा हैं. पर मेरा वह साथी अपने स्कूटर पर आता-जाता है अतः उसके लिए यह एक नया अनुभव था. खैर पुराणी बात पर आते हैं. तो फिर हर कतार का वाहन चालक अपने वाहन को आगे निकलने के चक्कर में सड़क पर एक अच्छा खासा जिगसा पजल बना रहा था जिसे क्रमवार करना शायद किसी के बस में नहीं था. मैंने कई बार ट्राफिक पुलिस वाले को अनियंत्रित ट्राफिक को नियंत्रित करने के प्रयास में असफल होकर सर पर हाथ मरते और बीडी फूंकते देखा है. क्या नियमों के पालन का ठेका नियम पालन कराने वालों ने ही ले रखा है. ?या हम इतने नासमझ हैं की बगैर समझाए मानते ही नहीं. और कई बार हद तो तब हो जाती है की गलती करते पकडे जाने पर छूटने की जुगत भिड़ाते रहते है कभी धनबल से तो कभी बाहुबल से! फिर से वही सवाल की हम आखिर कब सुधरेंगे ? हर साल सड़क पर गाड़ियों की भीड़ बढती जा रही है. लोगों की भीड़ बढती जा रही है. फिर इसका उपाय क्या है. क्या हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे या कुछ करें. कृपया बताइयेगा.
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