धर्मं मानव जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है! अगर हम खुले मन मस्तिस्क से विचार करें तो हम पाएंगे की हर धर्मं के तीन मुख्य अंग होते हैं. पवित्र प्रतिक चिह्न, उनके रीती- रिवाज और सबसे महत्वपूर्ण है उनकी आस्थाएं. धर्मानुसार उनके प्रतिक चिह्न अलग अलग होते हैं! कहीं ॐ को पवित्र माना जाता है वहीँ दुसरे सितारों को पवित्र मानते है तो कही अग्नि पवित्र होती है तो कहीं क्रॉस को पवित्र माना जाता है. इसी प्रकार धर्मानुसार उनके रीती रिवाज भी अलग अलग होते हैं. कुछ पूर्व की और होकर प्रार्थना करते हैं तो कुछ पश्चिम की और होकर सर झुकाते हैं. कुछ घंटी बजाते हैं तो कुछ घुटनों के बल बैठ कर अपना सर झुकाते हैं. इसी प्रकार प्रतीकों और धार्मिक चिन्हों तथा उनके रीती रिवाजों में भी विभिन्नता पुरे विश्व में पाई जाती रही है.
परन्तु, इतने विभेदों के बावजूद भी सभी धर्मं समान हैं! सभी एक जैसे बातों पर ही जोर देते हैं. " चोरी मत करो", " झूठ मत बोलो" , " हमेशा धर्मं के मार्ग पर चलो" इत्यादि. मित्रभाव, भ्रातृत्व, सहानुभूति, और प्रेम ही हर धर्मं की बातों का सार होता है.
यह बात जानने लायक है की पूर्व के सभी धर्मं चाहे वो हिन्दू हो या जैन, बौद्ध हो या सिख या फिर शिन्तो हरेक ने भ्रात्रित्वपूर्ण सहअस्तित्व की बात की है, एक दुसरे के धर्मों और विश्वासों के सम्मान की बात की है. हालाँकि कुछ बातों पर मतभेद थे और होते रहे किन्तु कभी भी धार्मिक मतभेदों को लेकर खून- खराबे जैसी बात देखने को नहीं मिली. उल्टे ज्ञानी एवं जानकार लोग वैचारिक मामलों पर शास्त्रार्थ किया करते थे और एक दुसरे को अपने ज्ञान एवं जानकारी से सहमत करने की कोशिश किया करते थे. पश्चिम में प्रचलित धर्मों एवं मतों ईसाई, यहूदी, इसलाम आदि अपने विश्वासों को लेकर हमेशा आपस में लड़ते रहे और अब तो उनकी इस लडाई ने पूरब का भी रुख कर लिया है.
किन्तु यह बात समझ में नहीं आती है की जब सारे धर्मों और मतों के विश्वास और मान्यताएँ एक ही जैसी हैं तो आपस में लडाई क्यों? मात्र इस बात पर कि मैं पूरब की ओर मुख कर पूजा करता हूँ और तुम पश्चिम की ओर मुंह कर उपासना करते हो, लोग लड़ते हैं. मेरे लिए अगर क्रॉस पवित्र है ओर तुम्हारे लिए चंद्रमा तो हम लडाई करें, ये कोई विवाद का मुद्दा तो नहीं है. ऐसी बातों पर लडाई करना तो बचपना है. ऐसी सारी लडाई मात्र धर्म कि बचपने भरी विवेचना मात्र से ही उपजी हैं. पुरे विश्व भर के लोगों को इस बात को समझना पड़ेगा. धर्मं केले के छिलके की तरह है ओर आध्यात्मिकता उसके अन्दर का फल है. धर्मं महत्वपूर्ण है क्योंकि वो आपको आपके उत्थान की और ले जाता है. किन्तु धर्मं को समझने के लिए हमें धर्मं के अंतर में प्रवेश करना पड़ेगा और धर्मं के अंतर में स्थित यही धर्मं का मूल है जिसे हम आध्यात्मिकता कहते हैं. मेरा तो यह मानना है की आध्यात्मिकता मूलतः वही स्वरुप है जिसे धर्मं प्राप्त करना चाहता है जब वह पुरे विकसित रूप में आता है.
भारतीय आध्यात्मिकता ऐसी शक्ति है जो सबको एकजुट रखना जानती है. यह बताती है की एक लक्ष्य को पाने के कई रास्ते हो सकते है पर सबकी मंजिल अंत में एक ही होती है. और तभी वह सबको स्वीकार करती हुए जीवन को उसकी शानदार विविधता के साथ जीना सिखाती है. उसकी नजर में मानव जीवन धार्मिक विश्वासों की तुलना में हमेशा महत्वपूर्ण रहा है और उसने कभी भी जीवन को धर्मं की बलि चढ़ने का समर्थन नहीं किया है. जब हम आध्यात्मिकता, योग, एवं समाधि जैसी बातों की और विचार करते हैं एवं इन्हें अपने जीवन में अपनाते हैं तो हम सिर्फ उस परम शक्ति से साक्षात्कार का मात्र एक माध्यम अपनाते हैं परन्तु इसका यह अर्थ कतई नहीं है की और कोई दूसरा माध्यम हैं ही नहीं! हमें दुसरे माध्यमों का भी उतना ही सम्मान करना चाहिए. जैसा की श्री श्री रविशंकर जी अपनी आर्ट ऑफ़ लिविंग में कहते है की अपने क्षितिज को विस्तार दो किन्तु अपने जड़ों को गहरा करो.
" मात्र मेरा रास्ता सही है, बाकी सब गलत है" आतंकवाद इसी कट्टरवादी विश्वास की उपज है. आज हम जिसे आतंकवाद का नाम देते है वह तो सदियों से पश्चिमी बर्बर्तावादी विचारधाराओं के साथ चलता आ रहा है. फर्क इतना है की वह बर्बरता आज आधुनिकता का रूप धारण कर रही है. पर रंग रूप बदलने से क्या होगा. क्या हम उसका चरित्र बदल सकते है जो रक्त से सराबोर है? इस बर्बर्तावादी विचारधारा के बीज को समाप्त करने का मात्र एक ही उपाय है की हमें एक व्यापक चरित्र वाले, बहुधार्मिक एवं बहुसांस्कृतिक शिक्षा प्रणाली को आत्मसात करते हुए उसे अपने जीवन में स्थापित करना होगा. भारत समेत पुरे विश्व में व्यापित जाति एवं धर्मं आधारित विभेद, जिसे भ्रष्टाचारी एवं सत्ता- लोलुप समाज के ठेकेदारों ने मात्र अपने तुच्छ लाभों के हेतु प्रश्रय देकर पुरे समाज को विष-व्यापित कर रखा है, के नाश का मात्र एक ही उपाई है की हम धर्मं के बदले उसमे समाहित आध्यात्मिकता को महत्व दें. नहीं तो हम मूर्खों की तरह मात्र केले के छिलके पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करते रहेंगे और उसके अन्दर समाहित केले के स्वादिष्ट फल को त्याग कर उसके अनुपम स्वाद एवं आनंद से वंचित रह जायेंगे.
कुछ लोग कहते है की धर्मं का जन्म भय के बीज से हुआ है. पर मेरा तो यह मानना है कि धर्मं का जन्मा विश्वास से हुआ है. भय तो मात्र कुछ समय तक ही कारगर हो सकता है उसके उपरांत व्यक्ति परिणाम के लिए तैयार हो जाता है.मात्र प्रेम एवं विश्वास ही लम्बे अरसे तक कारगर हो सकता है क्योंकि उससे भावनाये जुडी होती हैं. अगर हम भारत के प्राचीन इतिहास को खंगालेंगे तो हम पाएंगे कि भारत कि सभ्यता और संस्कृति पर प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक हजारों आक्रमण हुए किन्तु न तो वे भारत का आस्तित्व मिटा पाए और न भारतीयता का. बल्कि वे खुद इसमें समाहित होकर भारतीयता का अंग बन गए और अभी भी फल-फूल रहे हैं. पिछले हजारों सालों से होते आ रहे हमलों और आतंरिक कलह के बाद भी भारत एक सशक्त शक्ति बनकर आज भी खडा है. भारतीय आध्यात्मिकता पुरे विश्व के लिए एक खुली किताब है जिससे शांतिपूर्ण सहस्तित्व का सबक सीखा जा सकता है. पर इससे भी महत्वपूर्ण है यह कि हम भारतवासी युवाओं को जिनके ऊपर पुरे देश के भविष्य का दारोमदार है, हमारे महान संतों द्वारा सिखाया गया यह सबक फिर से सीखना होगा. भूतकाल के संतों एवं ऋषियों का सिखाया गया यह सबक ही हमें भविष्य में इस महान पृथ्वी पर हमारा उचित स्थान प्राप्त करा सकता है. जिस भारत को 'जगतगुरु" कि पदवी प्राप्त थी, उसे फिर उस सम्मान को प्राप्त करने कि जरुरत है.
Tuesday, November 10, 2009
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