२६ नवम्बर २००८: भारतीय इतिहास का एक और काला दिवस! क्या यह दिन और दिनों कि तरह याद आएगा, खासकर तब जब कि उस दिन आतंकवादियों ने यह सन्देश देने कि कोशिश की थी हम भारतीय बस उन खुनी भेडिओं के पंजों में मात्र निरीह मेमनों की मानिंद हैं. अपने सरों को कलम होने और अपने शरीर को चलनी होने के इंतज़ार में मुंह छुपाये! खासकर तब जब की हमने नीरो की मानिंद अपने सपनों में खोये हुए उन आतंकवादियों को अपनी ज़मीं पर बगैर किसी प्रतिरोध के घुस जाने दिया और पूरी दुनिया को यह सन्देश दिया की हम भारतीय भीगे चूहों की तरह मारे जाने को तैयार बैठे हैं! अपनी ही जमीं पर हमें अपने प्राणों की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ा. इस शर्मनाक घटना को आज एक वर्ष हो जायेगा. इस देश की सुरक्षा की मौत को आज एक साल हो गया है. क्या हम आज सचमुच जिन्दा हैं ? क्या हम मात्र यह कहकर बच सकते हैं की आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है? क्या और देश आतंकवाद से नहीं लड़ रहे हैं? हम जो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने की दुहाई देते हैं क्या हमारा वह तंत्र अपने लोगों की सुरक्षा के प्रति गंभीर है? निश्चित तौर पर कुछ कदम उठाये गए हैं परन्तु 'का वर्षा जब कृषि सुखाने, समय चूकी पुनि का पछताने', क्या हमारा सूचना तंत्र इतना संवेदनशील है की वह घटना!!!!!!!!!! दुर्घटना के होने के पूर्व उसकी आपात सुचना दे सके. कभी- कभी मुझे लगता है की सरकार ने आतंक की जड़ों को काटने के लिए कुछ भी नहीं किया है. किन्तु जब हम इसे सरकार के नज़रिए से देखते हैं तब ? हमारे पास पुलिस है, फ़ौज है, कमांडो हैं, फिर भी हम फेल हो जाते है! वज़ह, शायद हम यह समझ ही नहीं पाए हैं की आतंकवादियों के सर पर सींग नहीं होते. वो भी हमारी तरह ही होते हैं. और शायद इन्हें अपने बीच जगह देने वाले भी हम ही हैं! जरुरत है अपनी आँखें और कान खुले रखने की. जरुरत है रात के सन्नाटों में होने वाली दबी आहटों को सुनने की . जरुरत है अपने पड़ोस के मीर जाफर और जयचंदों को पहचानने की! लेकिन क्या हम उस आहट को सुन पा रहे हैं. अगर हम आतंकवाद के मायने नहीं समझ पा रहे हैं तो न हम सुरक्षित हैं और न कभी सुरक्षित होंगे. आतंकवाद है क्या कुछ सनकी और सिरफिरे लोगों के द्वारा अपनी बात मनवाने के लिए अपनाये जाने वाला वहशियाना तरीका! क्या जो दिल्ली की सड़कों पर रोज रात को रोड रेज की वारदातें हो रही हैं क्या वह आंतकवाद नहीं है. आतंकवादियों की गोलियों से नहीं मरे तो किसी ब्लू लाइन के पहिये के नीचे आकर मरेंगे या शराब पीकर गाडी चलते हुए किसी रईसजादे के गाडी के पहियों के नीचे आकर......... या किसी फ़िज़ूल के विरोध प्रदर्शन के चलते फैले दंगे की आंच में झुलस कर मरेंगे.......... (हालाँकि हमारे नेताओं का भी इसमें हाथ होता है पर आम जनता भी इससे अलग नहीं है) मतलब इसके कईएक कारण हो सकते हैं......... मतलब अनगिनत क्या सड़क पर कोई महिला आँखों के सामने बेइज्जत होकर मर जाती है तो किसी को सरेशाम बलात्कार का शिकार होना पड़ता है तो क्या ये आतंकवाद नहीं है. असल में सवाल तो यह है की क्या हमें इस सवाल को उठाने का अधिकार है? क्योंकि जब हम खुद जीना चाहते हैं तो हमें दूसरों को भी जीने का अधिकार देना पड़ेगा. जिस तंत्र पर हम उंगली उठा रहे है क्या हम उसी तंत्र का हिस्सा नहीं हैं. जिस सी एम के सामने ये सब कुछ हुआ वो सी एम दुबारा से एम पी बनकर आज मंत्री बन गया है . जिस डिप्टी सी एम के सामने ये सब कुछ हुआ वो आज फिर से होम मिनिस्टर बन गया है. पर क्या जब हम उन्हें एम पी और विधायक नहीं चुनते तो क्या वो फिर से सत्ता में आ पाते! मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ की इसका सीधा सादा मतलब है की या तो हमनें इस चुनौती को गंभीरता से नहीं लिया है या फिर हमारी नज़र में उन्होंने जो किया वह सही था? और यदि सही था तो फिर इस तंत्र को कोसने का क्या अर्थ है यह मेरी समझ में नहीं आया. कल टीवी पर मैंने जस्टिस लिब्रहान का गुस्सा देखा तो क्या एक जिम्मेदार न्यायवादी जब गुस्से में आप खो सकता है तो क्या एक बहकी हुई भीड़ नहीं खो सकती...... असल में हम कभी एक अराजकतावादी भीड़ मात्र बनकर रह जाते हैं तो कभी किसी साधू सन्यासी की भांति ज्ञान की बात बघारते रहते हैं .. आज सुबह समाचारपत्र में देखा फोर्स वन का गठन हुआ है पर इस बात की गारंटी भी होनी चाहिए की फिर फोर्स वन का कोई जवान शहीद करकरे की तरह बुल्लेट फ्रूफ जैकेट के बाद भी गोलियों का शिकार न हो जाये. इसके बाद भी दिल से यही आवाज़ निकलती है भैया ये इंडिया है, यहाँ सब चलता है, ताज होटल भी अपने जख्म पोंछ कर फिर से टूरिस्ट का स्वागत कर रहा है, लिओपोल्ड कैफे भी गुलज़ार है. यानी कुछ भी हो जाए हमारे जज्बे को कोई दबा नहीं सकता. पर फिर सवाल यही है की हम जिम्मेदार कब होंगे?
Wednesday, November 25, 2009
26/11: do youth feel safe and secrue thereafter?
२६ नवम्बर २००८: भारतीय इतिहास का एक और काला दिवस! क्या यह दिन और दिनों कि तरह याद आएगा, खासकर तब जब कि उस दिन आतंकवादियों ने यह सन्देश देने कि कोशिश की थी हम भारतीय बस उन खुनी भेडिओं के पंजों में मात्र निरीह मेमनों की मानिंद हैं. अपने सरों को कलम होने और अपने शरीर को चलनी होने के इंतज़ार में मुंह छुपाये! खासकर तब जब की हमने नीरो की मानिंद अपने सपनों में खोये हुए उन आतंकवादियों को अपनी ज़मीं पर बगैर किसी प्रतिरोध के घुस जाने दिया और पूरी दुनिया को यह सन्देश दिया की हम भारतीय भीगे चूहों की तरह मारे जाने को तैयार बैठे हैं! अपनी ही जमीं पर हमें अपने प्राणों की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ा. इस शर्मनाक घटना को आज एक वर्ष हो जायेगा. इस देश की सुरक्षा की मौत को आज एक साल हो गया है. क्या हम आज सचमुच जिन्दा हैं ? क्या हम मात्र यह कहकर बच सकते हैं की आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है? क्या और देश आतंकवाद से नहीं लड़ रहे हैं? हम जो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने की दुहाई देते हैं क्या हमारा वह तंत्र अपने लोगों की सुरक्षा के प्रति गंभीर है? निश्चित तौर पर कुछ कदम उठाये गए हैं परन्तु 'का वर्षा जब कृषि सुखाने, समय चूकी पुनि का पछताने', क्या हमारा सूचना तंत्र इतना संवेदनशील है की वह घटना!!!!!!!!!! दुर्घटना के होने के पूर्व उसकी आपात सुचना दे सके. कभी- कभी मुझे लगता है की सरकार ने आतंक की जड़ों को काटने के लिए कुछ भी नहीं किया है. किन्तु जब हम इसे सरकार के नज़रिए से देखते हैं तब ? हमारे पास पुलिस है, फ़ौज है, कमांडो हैं, फिर भी हम फेल हो जाते है! वज़ह, शायद हम यह समझ ही नहीं पाए हैं की आतंकवादियों के सर पर सींग नहीं होते. वो भी हमारी तरह ही होते हैं. और शायद इन्हें अपने बीच जगह देने वाले भी हम ही हैं! जरुरत है अपनी आँखें और कान खुले रखने की. जरुरत है रात के सन्नाटों में होने वाली दबी आहटों को सुनने की . जरुरत है अपने पड़ोस के मीर जाफर और जयचंदों को पहचानने की! लेकिन क्या हम उस आहट को सुन पा रहे हैं. अगर हम आतंकवाद के मायने नहीं समझ पा रहे हैं तो न हम सुरक्षित हैं और न कभी सुरक्षित होंगे. आतंकवाद है क्या कुछ सनकी और सिरफिरे लोगों के द्वारा अपनी बात मनवाने के लिए अपनाये जाने वाला वहशियाना तरीका! क्या जो दिल्ली की सड़कों पर रोज रात को रोड रेज की वारदातें हो रही हैं क्या वह आंतकवाद नहीं है. आतंकवादियों की गोलियों से नहीं मरे तो किसी ब्लू लाइन के पहिये के नीचे आकर मरेंगे या शराब पीकर गाडी चलते हुए किसी रईसजादे के गाडी के पहियों के नीचे आकर......... या किसी फ़िज़ूल के विरोध प्रदर्शन के चलते फैले दंगे की आंच में झुलस कर मरेंगे.......... (हालाँकि हमारे नेताओं का भी इसमें हाथ होता है पर आम जनता भी इससे अलग नहीं है) मतलब इसके कईएक कारण हो सकते हैं......... मतलब अनगिनत क्या सड़क पर कोई महिला आँखों के सामने बेइज्जत होकर मर जाती है तो किसी को सरेशाम बलात्कार का शिकार होना पड़ता है तो क्या ये आतंकवाद नहीं है. असल में सवाल तो यह है की क्या हमें इस सवाल को उठाने का अधिकार है? क्योंकि जब हम खुद जीना चाहते हैं तो हमें दूसरों को भी जीने का अधिकार देना पड़ेगा. जिस तंत्र पर हम उंगली उठा रहे है क्या हम उसी तंत्र का हिस्सा नहीं हैं. जिस सी एम के सामने ये सब कुछ हुआ वो सी एम दुबारा से एम पी बनकर आज मंत्री बन गया है . जिस डिप्टी सी एम के सामने ये सब कुछ हुआ वो आज फिर से होम मिनिस्टर बन गया है. पर क्या जब हम उन्हें एम पी और विधायक नहीं चुनते तो क्या वो फिर से सत्ता में आ पाते! मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ की इसका सीधा सादा मतलब है की या तो हमनें इस चुनौती को गंभीरता से नहीं लिया है या फिर हमारी नज़र में उन्होंने जो किया वह सही था? और यदि सही था तो फिर इस तंत्र को कोसने का क्या अर्थ है यह मेरी समझ में नहीं आया. कल टीवी पर मैंने जस्टिस लिब्रहान का गुस्सा देखा तो क्या एक जिम्मेदार न्यायवादी जब गुस्से में आप खो सकता है तो क्या एक बहकी हुई भीड़ नहीं खो सकती...... असल में हम कभी एक अराजकतावादी भीड़ मात्र बनकर रह जाते हैं तो कभी किसी साधू सन्यासी की भांति ज्ञान की बात बघारते रहते हैं .. आज सुबह समाचारपत्र में देखा फोर्स वन का गठन हुआ है पर इस बात की गारंटी भी होनी चाहिए की फिर फोर्स वन का कोई जवान शहीद करकरे की तरह बुल्लेट फ्रूफ जैकेट के बाद भी गोलियों का शिकार न हो जाये. इसके बाद भी दिल से यही आवाज़ निकलती है भैया ये इंडिया है, यहाँ सब चलता है, ताज होटल भी अपने जख्म पोंछ कर फिर से टूरिस्ट का स्वागत कर रहा है, लिओपोल्ड कैफे भी गुलज़ार है. यानी कुछ भी हो जाए हमारे जज्बे को कोई दबा नहीं सकता. पर फिर सवाल यही है की हम जिम्मेदार कब होंगे?
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