हर जिस्म जहर हो गया एक दिन
मुर्दों का शहर हो गया भोपाल एक दिन
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सर्दी की रात थी वो क़यामत की रात थी
दोजख की आग थी वो भयानक सी रात थी
जो भी हो मगर ये भी एक बात थी
कि तहजीबो तरक्की के गिलाजत की रात थी
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मासूम कोई चीखता अम्मी मुझे बचा
मरती बहन भी टेरती भैय्या मुझे उठा
कहता था कोई आँख से आंसू बहा बहा
मरते दफा तो बाप को बेटा खुदा दिखा
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फर्क था न लाश को जात पांत का
नस्ल रंग आज सब साथ साथ था
हिंदू का हाथ थामते मुस्लिम का हाथ था
जां जहाँ था मौत के हाथ था
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देखा गया न जो कभी सोचा गया
नहीं दर्द को भी पी गई भोपाल की जमीं
खुदा करे ये हादसा गुजरे न अब कहीं
शायद ही अगली पीढियां इसपे करे यकीं
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हर जर्रा शरर हो गया भोपाल एक दिन
मुर्दों का शहर हो गया भोपाल एक दिन
मैंने आज के अखबारों की कतरनों से मैंने इस त्रासदी की गवाही देती एक तस्वीर सहेजी है जो मैं आपके साथ बांटना चाहता हूँ .
यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड की स्थापना वर्ष 1969 में हुई थी। इसकी 50.9 प्रतिशत हिस्सेदारी यूनियन कार्बाइड के पास और 49.1 प्रतिशत हिस्सेदारी भारतीय निवेशकों के पास थी। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थान भी शामिल थे।
तो क्या इसका भी हाल क्वात्रोच्ची वाला ही होने वाला है? ये सवाल सिर्फ मेरा नहीं बल्कि उन लाखों लोगों का है जिनके रक्त्सम्बन्धी और मित्र इस त्रासदी के शिकार हुए थे. बी बी सी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली कहते हैं भोपाल कांड के बारे में जब भी बात शुरू होती है, ज़्यादातर मरने वालों और घायलों की तादाद पर आकर रुक जाती है.गैस पीड़ितों के साथ काम करने वाली अब्दुल जब्बार जैसी संस्थाओं का कहना है कि भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता से 713 करोड़ की जो मुआवज़े की राशि यूनियन कार्बाइड से ली थी, वह बहुत कम है. तर्क है कि यह राशि तीन हज़ार मृतकों और तकरीबन एक लाख घायलों के आधार पर तय की गई थी जबकि बाद में यही राशि इससे पाँच गुना लोगों के बीच बाँटी गई.
पीड़ित सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ इस दुर्घटना में 15 हज़ार लोग मारे गए और पांच लाख से अधिक घायल हुए, यानी वे कई तरह की बीमारियों का शिकार हैं. स्वयंसेवी संस्थाओं का यह भी कहना है कि मुआवज़े की यह राशि पीड़ितों को वर्ष 1992 से मिलनीं शुरू हुई, यानी दुर्घटना के सात-आठ साल बाद से.
कई लोगों को तो यह और बाद में मिली क्योंकि उन्हें यह ही साबित करने में सालों लग गए कि वह वहीं हैं जो वह अपने आपको बता रहे हैं और उनके पास पूरे दस्तावेज़ हैं या नहीं. "लेकिन यह तो मुआवज़े की बात है, इस मामले में क्या कोई आपराधिक मुक़दमा नहीं चला और क्या कोई सज़ा हुई लोगों को?" तो इसका जवाब सुनें अब्दुल जब्बार के लोगों के मुह से "सज़ा?, अरे अभी तो मामले में गवाही ही पूरी हुई है." अब बात करते हैं मुवावजे की तो इसका भी जवाब सुनें हुआ यह कि जब सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता से यूनियन कार्बाइड से मुआवज़े की राशि तय हुई तो समझौता यह भी हुआ कि इस मामले में कार्बाइड के ख़िलाफ़ सभी आपराधिक मामलों को ख़त्म कर दिया जाएगा.
नतीजतन, इस मामले में सीबीआई ने अमरीका स्थित यूनियन कार्बाइड कारपोरशन, यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड, यूनियन कार्बाइड इस्टर्न हांगकांग और अन्य जिनमें कंबनी अध्यक्ष वारेन एंडरसन के ख़िलाफ़ केस चल रहा था, वह बंद कर दिया गया. कार्बाइड के ख़िलाफ़ दोबारा आपराधिक केस 1992 में शुरू करवाए गए जब राज कुमार केसवानी जैसे शहर के कुछ प्रतिष्ठित नागरिकों और स्वयंसेवी संस्थाओं ने इसके ख़िलाफ़ अदालत में आवाज़ उठाई.
राज कुमार केसवानी कहते हैं कि इस तरह के समझौते के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना ज़रूरी था वरना यह तो एक उदाहरण बन जाता कि आप भारत में आकर फ़ैक्टरी लगाएँ और अगर आपकी लापरवाहियों से कोई दुर्घटना हो जाए तो पैसे दें और आपके ख़िलाफ़ कोई केस ही नहीं चलेगा. राजकुमार केसवानी ने इस मामले पर पत्रकार के तौर पर घटना से बहुत पहले से ढेरों लेख लिखकर यह चेतावनी देने की कोशिश की थी कि प्लांट में सुरक्षा व्यवस्था की कटौती के चलते कभी भी कोई दुर्घटना हो सकती है.
दोबारा केस शुरू होने के बाद वारेन एंडरसन के ख़िलाफ़ वारंट जारी हुआ लेकिन अदालत के सामने उनकी पेशी नहीं हो पाई है. वारेन एंडरसन फ़िलहाल अमरीका में हैं बल्कि वह घटना के चंद दिनों बाद ही जो भारत से गए तो फिर कभी वापस नहीं आए न ही सीबीआई उनके ख़िलाफ़ लगे आरोपों को लेकर कुछ कर पाई है.
यूनियन कार्बाइड कॉरपोरशन के अध्यक्ष पांच दिसंबर को भोपाल आए तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और यूनियन कार्बाइड के गेस्ट हाउस में रखा गया.लेकिन थोड़ी ही देर में न सिर्फ़ उनकी ज़मानत हो गई बल्कि सरकार ने उन्हें विशेष जहाज़ से दिल्ली भिजवाया, जहाँ से वह अमरीका के लिए रवाना हो गए.इस घटना को लेकर कई प्रश्न पूछे जाते हैं कि आख़िर इतने बड़े अपराध में इतनी जल्दी ज़मानत कैसे मिल गई और आख़िर शासन ने वारेन एंडरसन को दिल्ली जाने के लिए अपना हवाई जहाज़ क्यों दिया? दुर्घटना के समय भोपाल के पुलिस अधीक्षक स्वराज पूरी वारेन एंडरसन की ज़मानत के मामले में सवाल करने पर कहते हैं, "मैं इतना ही कहूँगा कि यह कार्रवाई निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत की गई थी." इस बीच दो और घटनाएँ हुईं. यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड के अधिकारियों ने हाई कोर्ट के सामने यह अर्जी दी कि उनके ख़िलाफ़ चल रहे केस न चलाए जाए. लेकिन अदालत ने इससे मना कर दिया.
लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चलेगा लेकिन दूसरी धाराओं के भीतर, इन धाराओं में सज़ा की अवधि काफ़ी कम है. कुछ ही दिनों बाद सीबीआई ने अपनी और से एक अर्जी दाखिल कर यह कहा कि वारेन एंडरसन और दूसरों के ख़िलाफ़ भी इन्हीं धाराओं में केस चलाया जाए. अब्दुल जब्बर कहते हैं, "अपने कहीं सुना है कि फ़रियादी ख़ुद ही बचाव पक्ष के ख़िलाफ़ इल्ज़ाम कम करने का अनुरोध कर रहा हो?"
सीबीआई की यह अर्जी कोर्ट ने ठुकरा दी है. दूसरी अहम बात यह हुई कि यूनियन कार्बाइड को एक दूसरी अमरीकी कम्पनी डाऊ केमिकल्स ने ख़रीद लिया है और अब मामला यह उठ रहा है कि चूँकि यह कंपनी अब यूनियन कार्बाइड की भी मालिक है इसीलिए उसके ख़िलाफ़ केस चलाया जाए.
एक अधिकारी ने फ़ैसल मोहम्मद अली से कहा कि भोपाल कांड से जुडा आपराधिक मामला अब इतना उलझ गया है कि इसमें शायद ही कुछ हो पाए. जब उन्होंने राज कुमार केसवानी से यह कहा तो वह छूटते ही बोले कि इसे उलझा कौन रहा है यह भी तो सोचिए.उन्होंने कहा कि देश के एक अहम राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी ने डाऊ केमिकल्स से चंदा लिया है और कांग्रेस के एक अहम नेता कंपनी की पैरवी अदालतों में कर रहे हैं. और ये बात मैं यूं ही नहीं कह रहा हूँ . आप खुद इस लिंक पर क्लिक करें और पूरी खबर पढ़ लें .http://thatshindi.oneindia.in/news/2009/11/30/faisaldiary2pp.html . यानी अभी भी इस त्रासदी की डोर उलझी हुई है. और कब तक सुलझेगी पता नहीं. अब बात करें उनकी जो जिन्दा बच गए तो भोपाल गैस कांड में जो प्रभावित लोग ज़िन्दा बच गये थे वे भी आज खुश कहाँ हैं ? पिछले 25 बरसों में जाने कितने लोग धीरे धीरे मर चुके हैं गैस के प्रभाव की वज़ह से । वे जिनके फेफड़े और अन्य अंग प्रभावित हो गये थे वे ,जिनकी बीमारी की मूल वज़ह वह गैस थी और यह बात उन्हे भी नही पता थी । सोचिये उन गर्भवती स्त्रियों ,बच्चों और बूढों के बारे में ज़हरीली गैस जिनकी कोशिकाओं में समा गई थी । यह वैज्ञानिक तथ्य आपको पता है ना ..हम साँस कहीं से भी लें श्वसन क्रिया कोशिकाओं में होती है ।
खैर जिस तरह हिरोशिमा और नागासाकी के विकीरण के प्रभाव को लोग भूल गये उसी तरह आज लोग इस बात को भूल चुके हैं कि यूनियन कार्बाइड नाम की कोई हत्यारी फैक्टरी भी थी । कुछ दिनो तक लोगों ने लाल एवरेडी का बहिष्कार किया फिर भूल गये । पीड़ितों को मुआवज़ा अवश्य मिला लेकिन लोग यह भूल गये कि मुआवज़े के पैसे से दवा खरीदी जा सकती है ज़िन्दगी नहीं !
यह हमारे देश की संस्कृति है कि हत्यारे के नकली आँसू देखकर उसे गले लगा लिया जाता है । हत्यारा फिर फिर हँसता है और गले मिलकर फिर पीठ में छुरा घोंप देता है । 25 बरस पहले मुझे समझ नहीं थी लेकिन गैसकांड पीड़ितों और समाज के हित में काम करने वाली संस्थाओं के आन्दोलन देख सुन कर लगता था कि अब शायद दोबारा देश में ऐसा न हो ,लेकिन वह एक झूठा स्वप्न था ,मानवता की हत्या करने वाली बहुत सारी मल्टीनेशनल कम्पनियाँ फिर आ गईं है....बल्कि इस बार उन्हे नेवता देकर बुलाया गया है । हत्या का तरीका भी अब बदल गया है । इसलिये अब दोबारा देश में ऐसा हो तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये । आज मैं इसे यहीं समाप्त कर रहा हूँ पर इस निवेदन के साथ कि इसके बिम्बों को उस घटना के सन्दर्भ में समझने की कोशिश कीजियेगा और सोचियेगा कि क्या आज हम फिर इन कड़वी सच्चाइयों को भूल कर उत्सवधर्मिता में मग्न नहीं हो गये हैं ?

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