Tuesday, December 15, 2009

कोपेनहेगन के कोपभाजन

डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में जलवायु परिवर्तन पर बहुप्रतीक्षित शिखर बैठक शुरु हो चूकी  है. इसमें 192 देशों के प्रतिनिधि शामिल  हैं, इस उम्मीद के साथ कि ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती पर कोई ठोस सहमति बन सके.कुछ विश्लेषक तो इसे दुनिया में अब तक की सबसे अहम बैठक बता रहे हैं. ७ दिसम्बर से  कोपेनहेगेन पर दुनिया की निगाहें टिकी हैं . इस दौरान सौ से ज़्यादा देशों के राष्ट्राध्यक्ष और लगभग 15 हज़ार प्रतिनिधि जलवायु परिवर्तन की चुनौती पर गहन विचार-विमर्श कर रहे हैं .शिखर बैठक की पूर्व संध्या पर संयुक्त राष्ट्र  के मुख्य वार्ताकार वो डे बोए ने कहा कि बातचीत से पहले जो भूमिका तैयार की गई है, उसे देखते हुए काफी उम्मीद है.
उन्होंने बीबीसी से कहा था  कि अब बहुत सारे देश स्वेच्छा से कार्बन उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य तय कर रहे हैं.उनका कहना था, "पिछले 17 वर्षों में जलवायु परिवर्तन पर इतने सारे देश कभी एक साथ नहीं आए और न ही उत्सर्जन कटौती का लक्ष्य निर्धारित किया."उन्होंने कहा कि ग़रीब देशों को ग्रीन टेक्नोलॉजी देने के प्रस्ताव भी दिए जा रहे हैं और इन सबसे उम्मीद बंधी है कि वर्ष 2050 तक कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए कोई लक्ष्य निर्धारण हो जाएगा.पहली बार अमरीका ने भी उत्सर्जन में कटौती के संकेत दिए हैं. 
चीन  जैसा देश भी कार्बन इंटेनसिटी में 20 से 25 फ़ीसदी कटौती की बात कर रहा है. कोपेनहेगेन सम्मलेन से ठीक पहले भारत ने इस बात का ऐलान कर दिया कि वह स्वयं ही २०२० तक २०/२५ % कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए तैयार है। साथ ही भारत ने इस बात पर कड़ा ऐतराज़ किया है कि इसके लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं होनी चाहिए। जब भारत स्वयं ही इस बात के लिए तैयार है तो अब बारी विकसित देशों की भी बनती है क्योंकि कार्बन उत्सर्जन के लिए वही अधिक उत्तरदायी हैं। भारत की इस बात का चीन ने भी समर्थन किया है जिससे पता चलता है कि भारत का प्रस्ताव वास्तविकता पर आधारित है केवल बयान बाज़ी तक सीमित नहीं है। भारत ने वहां उत्सर्जन पर भी कड़े कानून लागू करने पर ध्यान देने की बात कही है। आज सारी दुनिया में दिल्ली जैसा कोई भी बड़ा शहर नहीं है जहाँ की सार्वजानिक परिवहन सेवा पूरी तरह से पर्यावरण को ध्यान में रख कर बनाई गई हो। भारत ने और खास तौर पर दिल्ली ने यह कई साल पहले ही करके दिखा दिया था कि जहाँ ईमानदारी से प्रयास किया जाए वहां सब कुछ किया जा सकता है.


कोपेनहेगेन- लक्ष्य और मुद्दे

कोपेनहेगेन सम्मेलन का औपचारिक नाम है- यूएनएफसीसीसी में शामिल पक्षों का 15वां सम्मेलन, या संक्षेप में- कॉप15। कोपेनहेगेन में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में जिन सवालों पर विचार किया जाएगा, उनमें प्रमुख हैं-

* क्योटो जलवायु संधि के बाद की संधि पर सहमति बनाना।
* धनी देशों के कार्बन उत्सर्जन में कटौती के बाध्यकारी लक्ष्य।
* विकासशील देशों से उनके उत्सर्जन को धीमा करने की अपेक्षा।
* जलवायु परिवर्तन बचने के उपायों के लिए गरीब देशों की मदद।

कोपेनहेगन में जबकि दुनियाभर के लगभग सभी देश इकट्ठा हो चुके  हैं. हमारे अखबार हमें बता रहे हैं कि कोपेनहेगन में कुछ देशों को कोपभाजन का शिकार होना पड़ सकता है. अखबारों की सदिच्छा और इच्छा अपनी जगह लेकिन कोपेनहेगन में वे देश शेष देशों के कोपभाजन बनेंगे जिन्हें सचमुच बनना चाहिए, ऐसा लगता नहीं है. दुनिया में पर्यावरण के पहले के सम्मेलनों में अगर कभी कुछ ऐसा हुआ होता तो हमें उम्मीद भी बंधती कि दादा देश कोपभाजन का शिकार होंगे और दुनिया का दर्शन बदल जाएगा. लेकिन ऐसा है नहीं. दुनिया के दादा देशों का स्वभाव ऐसा है कि वे अपने कोपभाजन का शिकार शेष विश्व को बनाते हैं. बिना किसी शक के आज हम इस तरह की कार्यशैली के लिए अमेरिका को अगुआ मान सकते हैं. चीन नया नया इस जमात में शामिल हो रहा है और भारत भी दरवाजे पर दस्तक देने के लिए आतुर है. भारत का पक्ष रखते हुए लोकसभा में  पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि भारत किसी दबाव में आकर कोई समझौता नहीं करने जा रहा है जो कुछ भी किया जाएगा बराबरी पर ही होगा। अलग अलग देशों के लिए अलग अलग शर्तों पर काम नहीं किया जा सकता है। देश में मौजूदा वन क्षेत्र को संरक्षित रखा जाएगा और इसको बढ़ाने का भी काम किया जाएगा। भविष्य में कोयले पर आधारित सभी बिजलीघर ५० % प्रदूषण रहित कोयले पर आधारित होंगें। भारत इस मामले में गंभीर है और वह किसी तरह के दबाव में नहीं आने वाला है। यह सही है कि भारत सरकार ने सम्मलेन के पहले ही दुनिया को यह बता दिया है कि क्या सही है और क्या ग़लत ? अब तीसरी दुनिया के विकास शील देशों को यह तय करना है कि किस तरह से एक समान समझौते पर कार्य किया जाए जिससे इन देशों के हितों पर चोट न होने पाए। फिलहाल भारत की तयारी से विकसित देशों को झटका लगने वाला है क्योंकि वे इस सम्मलेन में कुछ शर्तें अन्य देशों पर थोपने की तैयारी किए बैठे थे। अब समय आ गया है कि सारी दुनिया मिलकर एक सही दिशा में काम करे न कि जो कुछ केवल उनके हित में हो। कार्बन उत्सर्जन में ये विकसित देश सबसे आगे हैं और कटौती करने के नाम पर ये अपनी शर्तें विकास शील देशों पर थोपना चाहते हैं। अब ये सारे देश मिलजुलकर पर्यावरण की चिंता करने के लिए कोपेनहेगन में इकट्ठा हो रहे हैं. लेकिन इस इकट्ठा होने का क्या वास्तव में कोई अर्थ है? अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्था डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार  कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन के मसले पर जारी संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में किसी समझौते की दिशा में प्रगति न हो पाने के लिए धनी देश भारत और चीन को दोषी ठहरा रहे हैं, जबकि इसके लिए सिर्फ उन्हीं को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए. डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की जलवायु नीति के प्रमुख किम कार्सटेंसन ने कहा, "धनी देशों में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने की इच्छा का अभाव विनाशकारी है।"यह पूछने पर कि क्या वे देशों के इस पक्ष से सहमत हैं कि भारत और चीन मौजूदा सत्र में बाधक बन रहे हैं, कार्सटेंसन ने इससे असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि इन देशों को याद रखना चाहिए कम-से-कम उन दोनों ने अपनी प्रतिबद्धताएं व्यक्त कर दी हैं, जैसा कि धनी देशों ने अब तक नहीं किया है। इस गूढ़  अर्थ को समझने के लिए दुनिया में पर्यावरण पर चल रही बहस के विषय बिन्दु देखना होगा. आज दुनिया में तीन तरह से पर्यावरण पर बात हो रही है. सबसे पहले पर्यावरण के नाम पर विज्ञान पर बहस हो रही है. दुनिया में जहां कहीं भी पर्यावरण की समस्या है वहां विज्ञान पर व्यापक बहस भी साथ में ही मौजूद है. आज जिसे क्लाइमेट चेंज कहा जा रहा है उस क्लाइमेट चेंज की बहस में भी सर्वाधिक बहस विज्ञान पर ही है. विज्ञान ने औद्योगीकरण को जो टेक्नालाजी दी है उसने विकासवादी व्यक्ति को औंधे मुंह गिरा दिया है. इसलिए चर्चा का सबसे अहम बिन्दु यही है कि इस टेक्नालाजी को कैसे पटखनी दी जाए. जिन्होने इस तकनीकि को आकार दिया वे कह रहे हैं इसे ग्रीन कर दिया जाए. ग्रीन टेक्नालाजी से औद्योगीकरण का शैतान देवदूत में परिवर्तित हो जाएगा और इक्कीसवीं सदी में पर्यावरण की समस्त समस्याओं का निदान हो जाएगा. 


निदान के लिए जिस समाधान को सुझाया जा रहा है उसे दुनिया के कुछ विकसित देश माने और विकसित होते देश उस पर चलने का वादा करें इसके लिए दूसरे क्रम में राजनीतिक सक्रियता है. पर्यावरण की राजनीति में यह तय किया जा रहा है कि कौन सा प्लेयर क्या करेगा. इस राजनीति में कार्बन रूपी ब्रह्मास्र चलाया जा रहा है. अभी चीन और उसके बाद भारत ने कहा है कि वह कार्बन उत्सर्जन को कम करेगें. इसे चीन और भारत की सदिच्छा मानना चाहिए कि वे भी दुनिया के पर्यावरण को लेकर उतने ही चिंतित नजर आ रहे हैं जितने अमेरिका या यूरोप के देश. लेकिन इस सदिच्छा के संदर्भ उतने व्यापक और गहरे नहीं है जितने कि होने चाहिए. कार्बन उत्सर्जन की बहस के बीच विकास को बलिदान करने की तथाकथित तैयारी एक तरह से दुनिया के दादा देशों पर किया जा रहा अहसान नजर आता है जो दुर्भाग्य से उनसे सरोकार नहीं रखता है जिनसे रखना चाहिए. पर्यावरण के नाम पर जो राजनीति हो रही है उसका भी आदि अंत विज्ञान के इर्द गिर्द सिमटा हुआ है. इसलिए इस तरह की राजनीति से पर्यावरण बचाने में कोई मदद मिलेगी, निर्णय कर पाना मुश्किल है. 
कोपेनहेगेन सम्मेलन में लीक हुए दस्तावेज़ों से यह बात सामने आई है कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर किसी संभावित समझौते के मामले में अमीर और विकासशील देशों के बीच गहरा मतभेद है. ग़ौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सम्मलेन के दूसरे दिन ही मेज़बान देश डेनमार्क का मसौदा लीक हो गया था. यह मसौदा अमीर देशों की ओर से तैयार किया गया है. पर्यावरणविदों के मुताबिक़ यह मसौदा अमीर देशों के प्रति बहुत नरम है. साथ ही इसमें विकासशील देशों को प्रयाप्त धन देने का भी सुझाव नहीं है ताकि वे बढ़ते तापमान का मुकाबला करने के उपाय लागू कर सकने में सक्षम हो सकें.फ्रेंड्स ऑफ़ अर्थ के कार्यकारी निदेशक एंडी एटकिन्स का कहना है कि यह मसौदा पहली नज़र में बहुत अच्छा दिखता है, पर है बहुत ख़तरनाक. उनका कहना है कि अमीर देश ग़रीब मुल्कों को धन देंगे ताकि वे अपना कार्बन उत्सर्जन कम कर सकें लेकिन वे ख़ुद इसे करने की बात नहीं कर रहे. जबकि वैज्ञानिक तरीके से देखें तो उन्हें खुद भी ऐसा करना चाहिए. विकसित देशों के अड़ियल रवैये के कारण कोपेनहेगेन क्लाइमेट चेंज समिट में किसी तरह के वैश्विक समझौते की उम्मीदें टूटती नजर आ रही हैं . क्योटो प्रोटोकॉल में तय सिद्दांतों को भविष्य में कार्बन उत्सर्जन रोकने की योजना में शामिल करने का विरोध कर रहे आस्ट्रेलिया से नाराज अफ्रीकी देशों के समूह ने शुरुआती चरण की बैठक का बहिष्कार कर दिया.उसके इस रुख को भारत और चीन ने भी समर्थन दे दिया। अफ्रीकी मुल्क आस्ट्रेलिया के इस प्रस्ताव से नाराज थे कि कार्बन उत्सजर्न व ग्लोबल वार्मिंग रोकने के लिए दीर्घकालीन योजना को नए सिरे से तेयार किया जाए और इसमें क्योटो प्रोटोकॉल की बात ही न हो। कोपेनहेगेन सम्मिट का सबसे महत्वपूर्ण चरण सोमवार से शुरू हुआ। इसकी शुरुआत में ही बड़ा झटका लग गया। जलवायु बदलाव की अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि विकसित और विकासशील देशों के बीच का यह डेडलॉक सम्मिट को फेल करने का अहम कारण बन सकता है। हालाँकि अभी कोशिशें की जा रही हैं कि इस मसले पर एक राय बनाने की कोशिश की जाए. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की निदेशक और पर्यावरण राजनीति की विशेषज्ञ सुनीता नारायण के मुताबिक दुनिया को जलवायु बदलाव के खतरों से बचाने के नजरिए से अंतरराष्ट्रीय एकजुटता के लिए यह बड़ा झटका है। इसकी पूरी जिम्मेदारी विकसित देशों की है जो है जो यह समझने की कोशिश ही नहीं कर रहे कि उन्हें भविष्य में अपने कार्बन उत्सर्जन की दर को घोषित करना चाहिए। यह घोषणा बाध्यकारी होनी चाहिए ताकि बाद में वह मुकर न सकें। इसके लिए क्योटो प्रोटोकॉल को ध्यान में रखकर ही बातचीत हो सकती है और विकसित देश इसे न मानने पर अड़े हुए हैं. 


जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर शुरू हो रही कोपेनहेगेन बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी १७ दिसम्बर को  हिस्सा लेगें.प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कोपेनहेगेन सम्मेलन में हिस्सा लेना का फ़ैसला अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और फ्रांस के राष्ट्रपति निकोला सार्कोज़ी के आग्रह के बाद आया है.पिछले हफ़्ते मनमोहन सिंह से मुलाक़ात के दौरान राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उनसे सम्मेलन में हिस्सा लेने का आग्रह किया था.उसके बाद पोर्ट ऑफ़ स्पेन में मुलाकात के दौरान निकोला सार्कोज़ी ने भी मनमोहन सिंह से अनुरोध किया था कि वो कोपेनहेगेन बैठक में हिस्सा लें. इधर माकपा नेता सीताराम येचुरी ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कोपेनहेगेन जाने का फैसला व्हाइट हाउस के बयान के जवाब में किया गया है तो यह देश के लिए अच्छा नहीं है। कोपेनहेगेन में जलवायु परिवर्तन पर होने वाले शिखर सम्मेलन में जा रहे संसदीय प्रतिनिधिमंडल में येचुरी भी शामिल हैं। उन्होंने व्हाइट हाउस के उस बयान का हवाला दिया, जिसमें दावा किया गया है कि भारत और चीन के शीर्ष नेताओं की अमेरिकी राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद दोनों ही देशों ने पहली बार कार्बन उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य तय किये हैं।माकपा नेता ने कहा कि इसका मतलब दबाव और भारत के रूख में नरमी के रूप में निकलता है। हमें उम्मीद है कि सरकार प्रधानमंत्री द्वारा संसद में व्यक्त प्रतिबद्धताओं के अनुरूप काम करेगी। इन प्रतिबद्धताओं में किसी तरह की नरमी हमें स्वीकार्य नहीं है।' व्हाइट हाउस के बयान में कहा गया कि राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत और चीन के शीर्ष नेताओं के साथ हुई द्विपक्षीय बैठकों और अमेरिका द्वारा उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य घोषित करने के बाद भारत और चीन ने पहली बार कार्बन तीव्रता कम करने के लक्ष्य तय किये हैं। पिछले हफ्ते बहुचर्चित फिल्म २०१२ में देखा था की  कि हमारी पृथ्वी अचानक सूर्य की धधक से नष्ट हो जाती है. इस धधक से पृथ्वी का केंद्र अत्यंत गरम हो जाता है, जिससे पृथ्वी की भीतरी परतों में भारी उथलपुथल मचती है. इसके परिणामस्वरूप प्रलय आ जाती है. सूनामी, भूकंप और ज्‍वालामुखी से पृथ्वी पर समूचा जीवन नष्ट हो जाता है, सिर्फ थोड़े-से आधुनिक जलस्त्रोतों को छोड़कर, जिन्हें जी-8 देशों ने कुछ थोड़े से लोगों को बचाने के लिए तैयार किया है. यह स्तब्ध कर देने वाला कथानक है. पहले ही विश्व इस दबाव को महसूस कर रहा है-पिछले दशक की गर्मियां अब तक सबसे ज्‍यादा तीखी रही हैं. भीषण चक्रवात और तूफान आए, विनाशकारी अकाल पड़े और बरसातें हुईं, समुद्र की सतह खतरनाक रूप से चढ़ गई और तमाम देशों में खेती नष्ट हुई. दूर की छोड़ दें तो भारत में ही इस साल गर्मियों में सूखा पड़ा, मुंबई में असामान्य बारिश हुई और नरगिस चक्रवात ने म्यांमार को भारी क्षति पहुंचाई. यह सब जलवायु परिवर्तन का ही नतीजा है. खतरा सिर्फ जानो-माल को ही नहीं है, बल्कि समाज को भी है, क्योंकि तब असफल देशों की संख्या बढ़ने से आतंकवाद, नशीली दवाओं, हथियारों की तस्करी और विस्थापन में भी इजाफा होगा, जिससे दुनिया और भी असुरक्षित हो जाएगी.

लेकिन कोपेनहेगेन के बेल्ला सेंटर में जलवायु परिवर्तन पर चल रहे शिखर सम्मेलन में आसन्न संकट पर बातचीत के लिए जुटे 192 देशों के रुख से नहीं लगता कि वे पृथ्वी पर खतरे को लेकर कतई चिंतित हैं. सम्मेलन के शुरू में सम्मेलन के अध्यक्ष कोनी हेडेगार्ड ने यह कह कर कुछ उत्साह जगाने की कोशिश की कि  ''इतिहास में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जब विश्व अलग-अलग रास्ते जाने का चुनाव कर सकता है. यह ऐसा निर्णायक क्षण है. हम हरित समृद्धि और सुरक्षित भविष्य की ओर जाने का रास्ता चुन सकते हैं, या गतिरोध वाला रास्ता जिस पर हम जलवायु परिवर्तन के बारे में कुछ भी न करें और उसका खामियाजा हमारी संतानों और उनके बाद वाली संतानों को भरना पड़े. जाहिर है, चुनाव करना कतई कठिन नहीं है.'' 
दुख है कि ऐसी बातें कोई भी गंभीरता से सुनने को तैयार नहीं लगता. कोपेनहेगेन तीन वर्षों से चल रही बातचीत का चरमोत्कर्ष था, जहां से पृथ्वी को बचाने की रूपरेखा निकलनी चाहिए थी. लेकिन हेडेगार्ड और अन्य नेता अब शर्म के साथ इसे ''प्रक्रिया की शुरुआत, न कि अंत'' बता रहे हैं. 192 देशों के नेता 18 दिसंबर को अचानक कोई सामूहिक फैसला न कर लें तो यह सम्मेलन एक राजनैतिक समझैते के रूप में समाप्त होने वाला है जिसमें सिर्फ वे सदिच्छा जाहिर करेंगे, न कि कोई लागू होने वाला कदम उठाएंगे. संक्षेप में, यह सम्मेलन एक गर्मागर्म बहस भर रह जाएगा. इस बीच अमेरिका में यह सम्मेलन पहले ही देर रात के प्रहसनों में मजाक का विषय बन गया है. एनबीसी पर जिमी फैलॉन ने अपने दर्शकों से पूछा, ''क्या आप लोग कोपेनहेगेन में यूएन के पर्यावरण परिवर्तन सम्मेलन को लेकर रोमांचित हैं? हां, यह आज शुरू हो रहा है, राष्ट्रपति ओबामा ने कहा है कि अमेरिका 2020 तक कार्बन उत्सर्जन 17 प्रतिशत तक कम कर सकता है. वे शायद कह सकते हैं कि जाहिर है, तब तक मैं इस पद पर नहीं रंगा. इसलिए मैं कोई भी वादा कर सकता हूं. 2020 तक हर आदमी, औरत और बच्चे के लिए एक मुफ्त एक्सबॉक्स, हर छैला के लिए एक मेगन फॉक्स क्लोन होगा. यह मेरी समस्या नहीं होगी, तब राष्ट्रपति टिंबरलेक की समस्या होगी.'' जे लेनो ने मजाक किया, ''वे कहते हैं, गरमी ऐसे बढ़ती रही तो 2015 तक हिलेरी क्लिंटन पसीज सकती हैं.''

कोपेनहेगेन सम्मेलन कई तरह से अपनी शुरुआत से ही असफल होने वाला था. यह ऐसा सम्मेलन होने वाला था जिसमें क्योटो प्रोटोकॉल के तथाकथित एनेक्स-1 के औद्योगिक देशों को अपने जीएचजी उत्सर्जन में कानूनी रूप से अधिक कटौती का वचन देना था. उन्हें प्रतिबद्धता की दूसरी अवधि को पूरा करना था जो 2012 से 2016 तक होनी थी. यह और बात है कि प्रोटोकॉल के तहत अधिकांश देश 2005 से 2012 तक की प्रतिबद्धता की पहली अवधि के लक्ष्यों को पूरा करने में असफल रहे हैं. इस अवधि में उन्हें अपने जीएचजी उत्सर्जन में 1990 के स्तर से औसत 5 प्रतिशत तक कटौती करनी थी. लेकिन 1992 में रियो के पृथ्वी सम्मेलन में यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसी) पर हस्ताक्षर के बाद से विश्व जीएचजी उत्सर्जन स्तर 30 प्रतिशत तक बढ़ गया है.

आइपीसीसी कह चुका है कि अगर वैश्विक तापमान को दो अतिरिक्त सेंटीग्रेड के खतरे के बिंदु से आगे बढ़ने से रोकना है तो औद्योगिक देशों को 2020 तक अपने जीएचजी स्तर में 1990 के स्तर से 25 से 40 प्रतिशत के बीच कटौती करनी होगी. अमेरिका समेत अधिकांश देश मुश्किल से 5 से 17 फीसदी की कटौती करना चाहते हैं. भारत की ओर से बातचीत करने वाले चंद्रशेखर दासगुप्ता इसे ''दुखद'' बताते हैं. अमेरिका, जो पृथ्वी का शत्रु नंबर एक है, क्योटो प्रोटोकॉल का वर्षों से अनुमोदन करने से इनकार करने के बाद राजी हुआ कि वह अपने कार्बन उत्सर्जन में 2005 के स्तर से 17 प्रतिशत तक कटौती करेगा. अगर आप उसे प्रोटोकॉल के कटऑफ वर्ष 1990 के अनुसार देखें तो यह कटौती मात्र 4 प्रतिशत ही बैठती है, जबकि यह इसकी तिगुनी होनी चाहिए थी.

गरीब देशों पर जलवायु परिवर्तन का असर पड़ने से अमीर देशों को उन्हें भारी मुआवजा देना था ताकि वे विपरीत स्थिति का सामना कर सकें. यूएनएफसीसीसी के मुताबिक, विकासशील देशों को इससे होने वाली क्षति की भरपाई के लिए विकसित देशों को उन्हें प्रतिवर्ष 400 अरब डॉलर मुहैया कराने होंगे. लेकिन अब तक सबसे अधिक 100 अरब डॉलर के मुआवजे के भुगतान की बात ब्रिटिश प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने की थी. यह आंकड़ा भी घट गया है और विकसित देश सिर्फ 40 अरब डॉलर देना चाहते हैं और वह भी केवल सबसे कम विकासशील देशों के लिए. औद्योगिक देशों को स्वच्छ प्रौद्योगिकी भी देनी थी ताकि विकासशील देश अपने यहां उत्सर्जन घटा सकें. लेकिन इन देशों ने बौद्धिक संपदा अधिकार का मुद्दा उठाया है और अब प्रौद्योगिकी ज्ञान की जगह सिर्फ सूचनाओं के आदान-प्रदान पर बात हो रही है.

तो अमेरिका, जहां प्रति व्यक्ति जीएचजी उत्सर्जन औसत भारतीय के मुकाबले 18 गुना है, शर्तें मानने से इनकार क्यों कर रहा है जबकि राष्ट्रपति अमेरिकी रीति-नीति बदलने की बात कह चुके हैं? इसका सीधा-सा जवाब हैः वहां कई बड़ी-बड़ी लॉबियां हैं जो यथास्थिति बनाए रखने के लिए प्रतिवर्ष 30 करोड़ डॉलर खर्च कर रही हैं. इनमें कोयला लॉबी शामिल है जिसकी पैठ 50 में से 22 राज्‍यों में है. फिर तेल लॉबी है, जॉर्ज बुश जिसके करीबी थे. ये लॉबियां ऑटोमोबाइल और हाइवे लॉबी के अतिरिक्त हैं. इसलिए भले ही ओबामा ने 2020 तक कार्बन उत्सर्जन में 17 फीसदी तक कटौती का वादा कर दिया है लेकिन उन्हें ऐसा करने में सीनेट में भारी मुश्किलों का सामना करना होगा. आश्चर्य नहीं कि क्योटो प्रोटोकॉल में अमेरिका की ओर से बातचीत करने वाले तत्कालीन उप-राष्ट्रपति अल गोर को सीनेट ने 95-0 से नकार दिया था-जिसके बाद अमेरिका के बारे में तमाम असुविधाजनक सचाइयां उजागर हो गई थीं. अमेरिका का मुख्य तर्क है कि क्योटो ने दुनिया में सबसे ज्‍यादा जीएचजी का उत्सर्जन करने वाले दो देशों चीन और भारत को शामिल नहीं किया. चीन एक विसंगति है क्योंकि इसने जीएचजी उत्सर्जन के मामले में अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया है और आर्थिक प्रगति के साथ विकासशील देशों की कक्षा से तेजी से बाहर आ रहा है. चीन जानता है कि जीएचजी उत्सर्जन पर लगाम लगाने या हरित प्रौद्योगिकी लाने में उसे करीब एक दशक लगेगा. तब उत्सर्जन कम करने पर उसके विकास पर कोई असर नहीं पड़ेगा. इसलिए अभी हाल तक वह बिना किसी बंदिश के, स्वेच्छा से भी कटौती करने से इनकार कर रहा था. लेकिन पिछले महीने राष्ट्रपति हु जिंताओ ने घोषणा की कि चीन अपने यहां कार्बन उत्सर्जन में 40 फीसदी की कटौती करेगा. यह मात्रा भी विकसित देशों से की जा रही अपेक्षा की तुलना में कुछ भी नहीं है, क्योंकि उनसे पूरा का पूरा उत्सर्जन खत्म करने की उम्मीद की जाती है, जबकि उत्सर्जन का संबंध जीडीपी में प्रत्येक डॉलर जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा से जुड़ा है. वास्तविक अर्थों में चीन के उत्सर्जन स्तर में कमी नहीं आएगी-सिर्फ गति धीमी होगी.

अमेरिकी अड़ियलपन किसी वायरस की तरह यूरोप में भी फैल गया है. अब यूरोप भी भारी कटौती के अपने वादे से पीछे हटने लगा है, जो उन्होंने शुरू में किया था. एक समय यूरोप 2050 तक अपने यहां जीएचजी उत्सर्जन में 50 फीसदी की कटौती की बात कर रहा था. लेकिन यूरोप उत्सर्जन में कटौती करके अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी अमेरिका के मुकाबले औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में पीछे नहीं रहना चाहता. कटौती से उत्पादन लागत बढ़ेगी. परंपरागत ईंधन के मुकाबले पुनःप्रयोग में आने वाली ऊर्जा महंगी पड़ती है. कुछ समय के लिए जब तेल की कीमतें प्रति बैरल 160 डॉलर पर थीं तो वैकल्पिक ऊर्जा आशाजनक लगने लगी थी. लेकिन तेल की कीमतें प्रति बैरल 70 डॉलर पर आने के बाद ये आशाएं धूमिल पड़ गईं.

जलवायु परिवर्तन पर वार्ता को अगर किसी एक बात ने सबसे ज्‍यादा झटका दिया तो वह है आर्थिक मंदी. रोजगार सुरक्षा पहली प्राथमिकता बन गई है. विकसित देश जब बेरोजगारी की दर कम करने की कोशिश कर रहे हैं, वे जीवन शैली में कोई बदलाव या अर्थव्यवस्था में हेरफेर नहीं चाहेंगे. इसलिए पिछले दो वर्षों से वे आपस में मिलकर क्योटो प्रोटोकॉल को निष्फल करने की साजिश में जुट गए हैं. अमीर देशों का एक गुट बनाते हुए ऑस्ट्रेलिया, जो प्रति व्यक्ति जीएचजी उत्सर्जन में सबसे आगे है, वर्षों तक प्रोटोकॉल में शामिल होने से इनकार करता रहा है. जब वहां केविन रड प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने अंततः उसका समर्थन किया लेकिन उसके बाद से ऑस्ट्रेलिया प्रोटोकॉल के सिद्धांतों को नष्ट करने में लगा रहा है.

कोपेनहेगेन से पहले ऑस्ट्रेलिया ने एक प्रस्ताव रखा था, जिसमें प्रतिबद्धता की बात आने पर विकसित और विकासशील देशों के बीच अंतर को बिगाड़ने की कोशिश की गई थी. क्योटो प्रोटोकॉल में माना गया था कि औद्योगिक देशों पर ऐतिहासिक जिम्मेदारी है क्योंकि उन्होंने पिछली दो सदियों में वातावरण में टनों जीएचजी का उत्सर्जन किया है. इन देशों को न सिर्फ उत्सर्जन में कटौती करनी होगी बल्कि विकासशील देशों की आर्थिक मदद करनी होगी. चीन और भारत समेत जी-77 देशों ने पाया कि यह प्रस्ताव पूरे प्रोटोकॉल को ही पलट देने का प्रयास है ताकि इस पर नए सिरे से बातचीत हो. उन्होंने तुरंत इसे खारिज कर दिया.

इस बीच अमीर देशों ने ज्‍यादा जरूरतमंद देशों को वित्तीय मदद देने का प्रस्ताव देकर जी-77 देशों में फूट डालने की कोशिश की, खासकर मालदीव जैसे द्वीपीय देशों को, जो खतरे में हैं. चीन और भारत को, जो स्वच्छ विकास व्यवस्था के तहत भारी रकम पा चुके हैं, चुप रखने के लिए उन्होंने कहा कि जंगलों को बचाने के लिए और मुआवजा दिया जाएगा. इस प्रकार वन कटाई और विनाश से उत्सर्जन में कमी के लिए एक कोष जारी किया गया जो ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे देशों को अपने जंगलों को बचाने में मदद करेगा. विकासशील देशों का रुख नरम रखने में असफल होने के बाद विकसित देश अब एक डेनिश प्रस्ताव पर जोर दे रहे हैं जो कोपेनहेगेन से निकलने वाला एक राजनैतिक समझैता होगा. 'प्लेज ऐंड रिव्यू' नाम के इस प्रस्ताव को जी-77 और चीन पहले ही क्योटो प्रोटोकॉल के मुख्य प्रावधानों को नष्ट करने के प्रयास के तौर पर देख रहे हैं. कोपेनहेगेन में कोई वाजिब समझैता नहीं होता है तो नेताओं को दुनिया भर में आम जनता के गुस्से का सामना करना पड़ेगा. खासकर औद्योगिक देशों में, जिन्हें अपने स्वार्थ के कारण पृथ्वी के दुश्मन के तौर पर देखा जा रहा है. फिल्म 2012 कहीं हमारी आशंका से पहले न सच बन जाए. कृपया लिंक देखे 
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किन्तु विडम्बना तो यह है की पर्यावरण की बात करते समय जिस एक विषय पर बिल्कुल ही बात नहीं हो रही है वह है- पर्यावरण का दर्शन. पर्यावरण का दर्शन अर्थात मनुष्य के जीवन का दर्शन. विज्ञान के प्रभाव में धीरे धीरे मनुष्य ने पर्यावरण के दर्शन से अपना जीवन दर्शन अलग कर लिया है और विज्ञान के साथ मिलकर जीवन का अनोखा दर्शन विकसित कर लिया है. या तो हम समझना नहीं चाहते या वाकई हमें समझ में नहीं आता कि वर्तमान पर्यावरण की समस्या का मूल कारण इसके विज्ञानमय दर्शन में ही निहित है. जैसा कि आज हो रहा है सारी बहस सिर्फ विज्ञान पर आकर सिमट गयी है. क्या इससे कोई रास्ता निकलेगा? हमें, आपको और उनको भी यह समझना होगा कि विज्ञानमय दर्शन और औद्योगीकरण की यूरोपीय अवधारणा इस समस्या के मूल में है. आज जिसे विकास कहा जा रहा है वह समस्या के मूल में है. कुछ समय पहले पश्चिम ने ही नारा दिया था कि बिना विनाश के विकास. लेकिन जल्द ही उनको लगा कि विनाश न करने की बात करके भी विकास के दौरान विनाश को रोक पाना मुश्किल है. तो फिर उन्होंने नारा दिया है सतत विकास. मैं कहता हूं, विकास को सस्टेनेबल बनाने की बजाय दिमाग को सस्टेनेबल बनाओ. दस-पचास साल की योजना बनाने की बजाय हजार साल की योजना बनाओ क्योंकि हजार साल बाद भी धरती पर हमारी संताने तो रहेंगी ही. अगर उनके लिए आप धरती को सुरक्षित छोड़ना चाहते हैं तो अपने दर्शन में बदलाव करना ही होगा.लेकिन जब दर्शन में बदलाव की बात होती है तो कोई इस पर बात नहीं करना चाहता. कोपेनहेगन में भी यही होगा. विज्ञान पर राजनीति होगी और सब लोग विदा हो जाएंगे. उर्जा के जिन विकल्पों को साफ सुथरा बताया जा रहा है उस पर आगे बढ़ने की बात होगी जिसमें परमाणु तकनीकि से बिजली पैदा करने की वकालत होगी. विज्ञान की समस्या को विज्ञान के समाधान से समझने समझाने की कोशिश होगी. इसलिए कोपेनहेगन के कोपभाजन का शिकार वे तो कतई नहीं होंगे जो इसके विनाश के लिए जिम्मेदार हैं. यह थोड़ा असहज है लेकिन सच्चाई यही है कि कोपेनहेगन के कोपभाजन का शिकार एक बार फिर पर्यावरण ही बनाया जाएगा लेकिन ऐसा होगा पर्यावरण बचाने के नाम पर. हालाँकि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा है कि उनका देश ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को सीमित करने संबंधी करार पर दस्तखत करने को तैयार है, बशर्ते इससे प़डने वाले आर्थिक बोझ को सभी समान रूप से उठाने के लिए तैयार हों. पूर्व में भी यही सब चलता रहा है. एक  बानगी भर देखें :
रियो सम्मेलन- 1992

ब्राजील में हुए रियो-पृथ्वी-सम्मेलन में पर्यावरण की रक्षा के लिए एक संधि पर सहमति बनी जिसे "यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेन्शन ऑन क्लाइमेट चेंज" या यूएनएफसीसीसी कहते हैं। रियो में सहमति बनी थी कि ग्लोबल वामिंüग के लिए जिम्मेदार गैसों की मात्रा इस हद तक सीमित की जाए कि जलवायु परिवर्तन मानव नियंत्रण से बाहर नहीं जाए।

क्योटो सम्मेलन- 1997

क्योटो में 1997 में हुई संधि की मुख्य बात ये थी कि औद्योगीकृत देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को 1990 के स्तर से, करीब सवा पांच प्रतिशत कम करेंगे। क्योटो संधि बाध्यकारी नहीं थी, अमरीका ने इस पर हस्ताक्षर भी नहीं किए थे। इसलिए इससे ज्यादा उम्मीदें लगाई भी नहीं गई थीं। यह संधि 2012 में खत्म हो रही है।

बाली सम्मेलन- 2007

दो साल पहले बाली सम्मेलन में तय हुआ था कि ग्लोबल वामिंüग के खिलाफ प्रभावी और दीर्घकालिक उपायों पर सहमति बनाई जाएगी। इसके लिए दिया गया वक्त कोपेनहेगेन सम्मेलन के साथ ही खत्म होने वाला है।

इधर चीन वर्ष 2050 तक अपनी कुल ऊर्जा खपत में एक तिहाई हिस्से की आपूर्ति नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से करने की योजना बना रहा है।चीन के एक स्थानीय अखबार ने यह खबर दी है। कोयले पर पूरी तरह निर्भर चीन दुनिया भर में सबसे अधिक मात्रा में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करता है। "चाइना डेली" के मुताबिक वर्ष 2020 तक देश में होने वाली कुल ऊर्जा खपत में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत पहुंचने का अनुमान है।
अखबार ने ऊर्जा अनुसंधान संस्थान के महानिदेशक हान वेंक द्वारा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के लिए तैयार किए गए ब्लूप्रिंट  का हवाला देते हुए यह दावा किया है। हान के मुताबिक वर्ष 2030 तक देश की कुल ऊर्जा खपत में नवीकरणीय स्रोतों की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है जिससे एक अरब टन कोयला बचाया जा सकेगा। वर्ष 2050 तक कुल ऊर्जा खपत में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतोंकी हिस्सेदारी बढ़कर एक तिहाई हो जाएगी।
जिससे दो अरब टन कोयले की खपत कम हो जाएगी।12 लाख किलोवाट बिजली पैदा होती है अखबार के मुताबिक चीन में अभी पवन ऊर्जा से 12 लाख किलोवाट से अधिक बिजली पैदा की जाती है जो वर्ष 2000 में साढे तीन लाख किलोवाट ही थी।

2 और 2.5 का फेर 
इस बात पर लगभग आम सहमति है कि धरती के गर्म होते जाने का असर जलवायु और जैव-विविधता पर पड़ना अवश्यम्भावी है। ग्लोबल वार्मिग के दुष्प्रभावों को नियंत्रित करने के लिए जरूरी है कि औद्योगीकरण से पहले के मुकाबले धरती के तापमान में वृद्धि 2 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा नहीं हो। तापमान में इससे ज्यादा वृद्धि नहीं हो, इसके लिए जरूरी है कि वातावरण में कार्बन की मात्रा में 2.5 लाख मेगाटन से ज्यादा की वृद्धि नहीं हो।



जबकि  कोपेनहेगेन में जलवायु सम्मेलन के दस दिन पहले फ़्रांस और ब्रिटेन ने विकासशील देशों में पर्यावरण सुरक्षा क़दमों में मदद के लिए विकसित देशों का एक कोष बनाने का सुझाव दिया था . त्रिनिडाड व टोबैगो में त्रेपन सदस्यों वाले राष्ट्रकुल देशों के शिखर सम्मेलन की शुरुआत में ब्रिटिश प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने कहा था  कि उनका देश 10 अरब डॉलर का कोष बनाने का प्रस्ताव दे रहा है और स्वयं आनेवाले तीन वर्षों में उसमें 1.3 अरब डॉलर का योगदान देगा. सम्मेलन में मेहमान के तौर पर भाग ले रहे फ़्रांसीसी राष्ट्रपति निकोला सारकोज़ी ने कहा था  कि कोपेनहेगेन में तय होना चाहिए कि इस कोष में 2010 से 2012 तक हर साल 10 अरब डॉलर जमा किए जाएंगे. अगले ही साल से ग़रीब देश इस कोष का लाभ उठा सकेंगे. पर इसमें से कुछ वास्तविक भी है या महज घोषणा भर. कोपेनहेगेन से कुछ निकलेगा इसकी संभावना नहीं के बराबर है । सवाल है जो पर्यावरण अमेरिका के लिये अर्थशास्त्र है, वही पर्यावरण हमारे लिये संस्कृति है । और कोपेनहेगेन में इसी संस्कृति को कानूनी जामा पहनाकर टेक्नालाजी बेचने-खरीदने का धंधा शुरु हुआ है । संस्कृति बेचकर विकासशील देशो के उन्हीं उघोगों और कारपोरेट सेक्टरो को कमाने के लिये कोपेनहेगेन में 200 बिलियन डालर है जिनके धंधे तले भारत में किसानी खतरे में पड चुकी है और पीने का पानी दुर्लभ हो रहा है । मनमोहन सिंह भी इसी समझ पर ठप्पा लगाने 18 दिसंबर को कोपेनहेगेन जायेंगे। मनमोहन के अर्थशास्त्र ने जो नयी सस्कृति देश में परोसी है, उसमें धंधे और मुनाफे में सबकुछ सिमट गया है । लोकतंत्र का हर पहरुआ पहेल मुनाफा बनाता है फिर सवाल खड़ा करता है । अछूता चौथा खम्भा यानी मीडिया भी नहीं है। जाहिर है धंधा मीडिया की जरुरत बन चुकी है तो कोपेनहेगेन को लेकर उसकी रिपोर्टिग भी उसी दिशा में बहेगी जिस दिशा में मुनाफा पानी तक सोख ले रहा है । पृथ्वी गर्म हो रही है। जीवन को खतरा है । 2012 तक सबकुछ खत्म हो जायेगा.....कुछ इसी तरह अखबार और न्यूज चैनल लगातार खबरे दिखा भी रहे है । इसी मीडिया के लिये कोई मायने नहीं रखता कि आधुनिकता और औघोगिकरण के साये में कैसे मानसून को ही छिन लिया गया । बीते बीस सालों के मनमोहनइक्नामिक्स के दौर में 45 हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या कर ली और नौ फीसदी खेती योग्य जमीन को बंजर बनाया गया । चार फिसदी खेती की जमीन को उघोगों ने हड़प लिया । यह सवाल मीडिया के लिये मौजू नहीं है । याद कीजिये कैसे दो दशक पहले तक एक बहस होती थी कि पत्रकारिता और साहित्य एक दूसरे से जुडे हुये हैतब सरोकार का सवाल सबसे बड़ा माना जाता है । लेकिन नये दौर में पत्रकारिता बिकने को तैयार है तो साहित्य कमरे में बौद्धिकता से दो दो हाथ कर रहा है । कहते है तीसरा विश्वयुद्द पानी को लेकर ही होगा । ऐसे में बात कोपेनहेगेन की क्या करें........... 


होगा वही जो अमेरिका और उसके पिछलग्गू चाहेंगे और शायद सबसे पीछे की कतार में हम खड़े नजर आयेंगे.






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