मूल रूप से ये निज़ाम की हैदराबाद रियासत का हिस्सा था.इस क्षेत्र से आंध्र प्रदेश की 294 में से 119 विधानसभा सीटें आती हैं. 1948 में भारत ने निज़ाम की रियासत का अंत कर दिया और हैदराबाद राज्य का गठन किया गया. निजाम के अधीन कुतुबशाही शासन के कारण जीवनशैली और भाषण के मामले में तेलंगाना उत्तर भारत के ज्यादा निकट है। दोनों क्षेत्रों के प्रमुख उत्सव भी अलग-अलग हैं।
1956 में हैदराबाद का हिस्सा रहे तेलंगाना को नवगठित आंध्र प्रदेश में मिला दिया गया.निज़ाम के शासनाधीन रहे कुछ हिस्से कर्नाटक और महाराष्ट्र में मिला दिए गए. इस प्रकार भाषा के आधार पर गठित होने वाला आंध्र प्रदेश पहला राज्य बना.
चालीस के दशक में कामरेड वासुपुन्यया कि अगुवाई में कम्युनिस्टों ने पृथक तेलंगाना की मुहिम की शुरूआत की थी.उस समय इस आंदोलन का उद्देश्य था भूमिहीनों कों भूपति बनाना.छह वर्षों तक यह आंदोलन चला लेकिन बाद में इसकी कमर टूट गई और इसकी कमान नक्सलवादियों के हाथ में आ गई. आज भी इस इलाक़े में नक्सलवादी सक्रिय हैं.1969 में तेलंगाना आंदोलन फिर शुरू हुआ था.दरअसल दोनों इलाक़ों में भारी असमानता है. आंध्र मद्रास प्रेसेडेंसी का हिस्सा था और वहाँ शिक्षा और विकास का स्तर काफ़ी ऊँचा था जबकि तेलंगाना इन मामलों में पिछड़ा है.तेलंगाना क्षेत्र के लोगों ने आंध्र में विलय का विरोध किया था. उन्हें डर था कि वो नौकरियों के मामले में पिछड़ जाएंगे.अब भी दोनों क्षेत्र में ये अंतर बना हुआ है. साथ ही सांस्कृतिक रूप से भी दोनों क्षेत्रों में अंतर है. इस कारण हमेशा राजनितिक रूप से तेलंगाना को संतुष्ट करने के प्रयास किये जाते रहे. शुरुआत में तेलंगाना को लेकर छात्रों ने आंदोलन शुरू किया था लेकिन इसमें लोगों की भागीदारी ने इसे ऐतिहासिक बना दिया.इस आंदोलन के दौरान पुलिस फ़ायरिंग और लाठी चार्ज में साढे तीन सौ से अधिक छात्र मारे गए थे.उस्मानिया विश्वविद्यालय इस आंदोलन का केंद्र था.उस दौरान एम चेन्ना रेड्डी ने 'जय तेलंगाना' का नारा उछाला था लेकिन बाद में उन्होंने अपनी पार्टी तेलंगाना प्रजा राज्यम पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया.इससे आंदोलन को भारी झटका लगा.इसके बाद इंदिरा गांधी ने उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया था.1971 में नरसिंह राव को भी आंध्र प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया था क्योंकि वे तेलंगाना क्षेत्र के थे. चलिए अब के सी आर की बात करते हैं. नब्बे के दशक में के चंद्रशेखर राव तेलुगु देशम पार्टी के हिस्सा हुआ करते थे.1999 के चुनावों के बाद चंद्रशेखर राव को उम्मीद थी कि उन्हें मंत्री बनाया जाएगा लेकिन उन्हें डिप्टी स्पीकर बनाया गया.वर्ष 2001 में उन्होंने पृथक तेलंगाना का मुद्दा उठाते हुए तेलुगु देशम पार्टी छोड़ दी और तेलंगाना राष्ट्र समिति का गठन कर दिया. 2004 में पृथक तेलंगाना की वायदा करके कांग्र्रेस ने केसीआर के साथ चुनाव लड़ा लेकिन बाद में वे वायदे से मुकर गए। तब वाई एस राजशेखर रेड्डी ने चंद्रशेखर राव से हाथ मिला लिया था और पृथक तेलंगाना राज्य का वादा किया.बाद में उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया. इसके बाद तेलंगाना राष्ट्र समिति के विधायकों ने इस्तीफ़ा दे दिया और चंद्रशेखर राव ने भी केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया था.
अलग तेलंगाना राज्य के गठन की प्रक्रिया शुरु करने की केंद्र सरकार की घोषणा ने तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के नेता चंद्रशेखर राव यानी केसीआर को हीरो बना दिया है. पर क्या यह ख़ुशी देर तक कायम रह पायेगी? इसके साथ ही अब एक बार फिर राज्यों के पुनर्गठन की चर्चा चल पड़ी है। ऐसी खबर है कि सरकार दूसरा राज्य पुनर्गठन आयोग गठित करने की सोच रही है। इसी बीच उत्तर प्रदेश की चीफ मिनिस्टर मायावती ने भी अपने प्रदेश को तीन हिस्सों में बांटने पर सहमति जताई है। यही सिफारिश कांग्रेस के स्थानीय नेता भी कर चुके हैं। दूसरे तमाम राज्यों में भी बंटवारे की पुरानी मांगें नई करवट लेने लगी हैं। हालांकि ऐसे लोगों की संख्या भी कोई कम नहीं, जो पुनर्गठन आयोग की चर्चा को कांग्रेस की सियासी चाल मानते हैं। तेलंगाना के नेताओं को खास तौर से यह डर सता रहा था कि अलग राज्य बनाने के अपने कमिटमेंट को टालने के लिए कांग्रेस यह आइडिया खोज लाई है। बहरहाल, इस सियासी हलचल से परे राज्यों के पुनर्गठन का मामला सचमुच विचार की मांग करता है। इस काम में कई तरह की झंझटें तो हैं, लेकिन यह जरूरी है। छोटे राज्यों की मांग गैरवाजिब नहीं कही जा सकती, क्योंकि प्रशासन के लिहाज से बड़े राज्य वाकई अच्छे साबित नहीं होते। यह बात पहले ही साफ हो चुकी है। छोटे राज्यों में काफी हद तक सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक एकरूपता होती है, जिससे विकास योजनाएं बनाना और लागू करना आसान हो जाता है। इस मामले में दिक्कतें यह हैं कि खर्च बढ़ता है, बंटवारे को लेकर असंतोष पैदा होता है और इससे भी छोटे टुकड़ों के लिए मुहिम चल सकती है। फिलहाल करीब दस राज्यों की मांग हो रही है, जैसे गोरखालैंड, कोडागु, विदर्भ, हरित प्रदेश, बुंदेलखंड, पूर्वान्चल, लद्दाख, मिथिलांचल, गोंडवाना और तेलंगाना। डर है कि अगर इन्हें मान लिया गया, तो ऐसी ही अनगिनत मांगें उठ खड़ी होंगी। यह आशंका सही हो सकती है, लेकिन पुनर्गठन आयोग ऐसे पैमाने बनाए और उन्हें मानने के लिए सभी पार्टियां हामी भरें कि अनचाही मांगें जड़ न जमा सकें। फिर भी अगर कोई मांग पैमानों पर खरी हो, तो उसे एडजस्ट करने में ऐतराज क्यों होना चाहिए? राज्यों के बीच आपसी विवाद जरूर एक बड़ा मुद्दा है। जैसे कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा और उड़ीसा में कुछ इलाकों को लेकर विवाद जारी हैं, या फिर नदियों के बंटवारे को लेकर टकराव की नौबत आ जाती है। पुनर्गठन आयोग अगर ऐसे मामलों पर आम सहमति नहीं बनाएगा, तो दसियों नए झगड़े गले पड़ जाएंगे। लिहाजा इस मुद्दे पर बहुत सावधानी की जरूरत है। लेकिन कुल मिलाकर पुनर्गठन का आइडिया फायदेमंद हो सकता है, बशर्ते सभी पार्टियां और संगठन अच्छी नीयत से मिलकर काम करें। एक बात इस सिलसिले में सभी को याद रखनी चाहिए कि तमाम खूबियों के बावजूद छोटे राज्य भी लोगों का भला करने में नाकाम साबित हो जाएंगे, अगर सत्ता का विकेंद्रीकरण नहीं किया गया। विकेंद्रीकरण का कोई विकल्प नहीं, यानी सरकार को अपना आकार घटाना होगा, लालफीताशाही खत्म करनी होगी और नीतियों का निर्माण लोकल लेवल से शुरू करना होगा। कुल मिलकर अभी भी यही समझ में आता है की छोटे राज्यों की मांग के पीछे इनके पीछे सामाजिक और आर्थिक कारक तो हो सकते हैं, लेकिन राजनीतिक कारण सबसे ऊपर हैं। योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष और दसवें वित्ता आयोग के अध्यक्ष रहे कृष्ण चंद पंत अच्छे प्रशासन के लिए छोटे राज्यों के गठन के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन वे मात्र इसे ही विकास की गारंटी नहीं मानते! उनके अनुसार नए राज्यों की यह मांग 1950 के दशक में बने पहले राज्य पुनर्गठन आयोग की याद दिलाती है। उस वक्त राज्यों के बंटवारे का आधार भाषाई था। इसके पीछे भी एक इतिहास था, क्योंकि स्वतंत्रता आंदोलन में गांधीजी के समय में यह बात उठी थी कि जनतंत्र में प्रशासन को आम लोगों की भाषा में काम करना चाहिए। इससे प्रशासन लोगों के नजदीक आ सकेगा। इसी वजह से तब भाषा के आधार पर राज्य बने। अगर उस वक्त भाषा आधार न होता और खुला मैंडेट होता यानी जहां से दबाव आए वहां बात मान ली जाए तो यह काम बहुत मुश्किल हो जाता। भाषा के आधार पर उस समय जो राज्य बने वह आम तौर पर ठीक रहे। दो राज्यों में कोशिश की गई कि इन्हें द्विभाषी रखा जाए-एक बंबई, जिसमें गुजराती व मराठी लोग थे तथा दूसरा था पंजाब, जहां पंजाबी-हिंदी भाषी थे, लेकिन अंत में इन्हें भी भाषाई आधार पर महाराष्ट्र व गुजरात तथा पंजाब व हरियाणा में बांटना पड़ा। इसलिए नए राज्यों के गठन की दिशा में कोई कदम उठाने से पहले बेहद सावधानी बरती जानी चाहिए। यह मुझे जनवरी २८, २००९ को उनके दैनिक जागरण में छपे साक्षात्कार को पढने से पता चला था. आप भी चाहे तो इस लिंक पर जाकर उनके विचार जान सकते हैं.http://in.jagran.yahoo.com/news/opinion/general/6_3_4121468.html. खैर अब आगे चलते हैं. छोटे राज्यों को लेकर जो बहस चल रही है उसके लाभ-हानि वाले, दोनों पहलू हैं। उदाहरण के लिए हरियाणा है, जहां राज्य बनने के बाद आर्थिक प्रगति हुई है और प्रशासन की पकड़ बढ़ी है। उत्ताराखंड का अनुभव भी अच्छा रहा है। मगर सामान्य तौर पर यह कहना पूरी तरह सही नहीं है कि छोटा राज्य बना दिए जाने भर से विकास व प्रशासन, दोनों मोर्चो पर आप झंडा गाड़ देंगे। कई राज्यों में विकास और अच्छे प्रशासन की बातें सही साबित नहीं हुई हैं। झारखंड व छत्तीसगढ़ में उठ रहे सवाल व समस्याएं इसका प्रमाण हैं। प्रगति के लिए राजनीतिक स्थिरता जरूरी है, मगर छोटे राज्यों में इसका अनुभव अच्छा नहीं रहा है।गोवा, झारखंड, मणिपुर, नगालैंड जैसे छोटे राज्यों में बराबर उथल-पुथल मचती रहती है। दल-बदल कानून का फायदा तो हुआ है, पर फिर भी राज्यों में अस्थिरता एक समस्या के रूप में सामने आ रही है। राज्यों के निर्माण में इन सारे पहलुओं पर भी विचार करना जरूरी है। खास तौर पर एक सवाल रह-रह कर मेरे जेहन में उठता रहता है की क्या क्षेत्रीय भावनाएं जिस तरह उभर रही हैं उसमें नए राज्यों का पिटारा खोलना क्या हमारे संघीय ढांचे की मजबूती में दरारें नहीं बढ़ाएगा? पर दूसरी ओर यह भी सही है कि जब तक देश के समक्ष गरीबी, कुपोषण, बेकारी तथा सामाजिक-आर्थिक असंतुलन की विकराल समस्याएं हल नहीं होतीं तब तक नए राज्यों की ऐसी मांगों को रोकना मुश्किल होगा। ऐसे में लोगों के असंतोष को हवा देना खतरनाक हो सकता है। नि:संदेह इस पहलू पर सचेत रहने की जरूरत है। दूसरी ओर भूमंडलीकरण और बाज़ार की ताक़त के ज़ोर पर मनचाहे सौदे करने वाले दौर में राजनीतिक कुशलता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों के आधार पर गठित तीन राज्यों झारखंड, उत्तरांचल और छत्तीसगढ़ आज राजनीतिक रुप से अलग अलग स्थितियों में हैं लेकिन पहले तीन वर्षों की इनकी उपलब्धियाँ इनके निर्माण की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह बनकर खड़ी हैं. विकास, बढ़िया प्रशासन, क्षेत्रीय अस्मिता वगैरह की बातें मात्र कुछ वर्षों बाद भी किसी को याद हो ऐसा नहीं लगता.झारखंड की हालत शायद सबसे ख़राब है. जबकि प्राकृतिक संसाधनों और स्पष्ट आदिवासी पहचान के चलते इसके विकास और पहचान की संभावना सबसे ज़्यादा थी और शायद अब भी है. नक्सली यहाँ के काफ़ी बड़े इलाक़े में समानांतर शासन चला रहे हैं और उनका प्रभाव क्षेत्र तीन वर्षों में काफ़ी बढ़ा है.मंत्रीमंडल और शासन में साझेदार दल यहाँ प्रेशर ग्रुप की तरह काम नहीं करते, बल्कि वे सत्ता और लूट के साझेदार बने हुए हैं. ठेकेदार, व्यापारी, अधिकारी और नेताओं का जितना प्रबल गठजोड़ झारखंड में दिखता है वैसा आज कहीं नहीं है.
यह माना जा रहा था कि प्राकृतिक संसाधनों का ख़जाना होने तथा कलकत्ता और मुंबई से सीधे जुड़े होने के चलते झारखंड में तेज़ी से पूँजी निवेश होगा, बड़े-बड़े उद्योग लगेंगे पर राजनीतिक-प्रशासनिक अराजकता ने ऐसा होने नहीं दिया है.
उल्टे इस बीच मोदी समूह ने बिहार स्पंज का बचा खुचा कारोबार समेटा, जमशेदपुर से लगा आदित्यपुर औद्योगिकक्षेत्र सूना हुआ और निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र की कई इकाइयों ने दम तोड़ा है.होने को सिर्फ़ सड़क और पुलिया का निर्माण हुआ है जिसमें ठीक-ठाक राजस्व वाले इस प्रदेश की पूँजी सड़क पर जाने के साथ-साथ ठेकेदार, इंजीनियर, अधिकारी और नेताओं की जेबों में भी गई है और सब बम-बम कर रहे हैं.एक और विकास हुआ है, जो सिर्फ़ राँची नहीं बल्कि बाक़ी दोनों प्रदेशों की राजधानी में हुआ है - नई राजधानी विकसित करने की तैयारी. अभी मुख्य काम जगह चुनने का चल रहा है.जिधर मुख्यमंत्री और सरकार की नज़र मुड़ती है वहाँ की ज़मीन मंहगी हो जाती है, बिल्डर लॉबी मालामाल हो रही है.पर हालत यह है कि वे यहीं क़ैद होकर रह गए हैं.
उनके मंत्रियों तक पर झूठे आरोपों का घेरा पड़ जाता है, नौकरशाही हावी रहती है.
कभी चौलाई, मड़वा, कोदा में विदेशियों की दिलचस्प ख़बरें उड़ती हैं तो कभी विकास के नाम पर शहर उजड़ने की.नया निवेश, नया उद्योग, नए कारोबार की ख़बर तो अभी तक सुनाई नहीं पड़ी है.वही नौकरशाह, वही ठेकेदार, वही भाजपा और वही काँग्रेस. बाक़ी राज्य तो एक पार्टी के राज का रोना रो सकते हैं उत्तराँचल ने तो दोनों पार्टियों को भुगत कर देख लिया - समाजवादी पार्टी को वह देखना नहीं चाहता और ब्राह्मण-ठाकुर बहुल राज्य में बहुजन समाज पार्टी के लिए कोई गुँजाइश नहीं है. बड़े उद्योग आने या निवेश के फ़ैसलों का तो पता नहीं लेकिन राज्य प्रशासन कभी नदी बेचने के लिए चर्चा में आया तो कभी सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के विनिवेश के विवाद के चलते.
चुनाव के चलते जो चर्चा हो रही है उसे छोड़ भी दें तो नक्सलियों का आतंक, ठेकों की लूट और चालाक-धूर्त अधिकारियों का राज बढ़ा ही है.
नए राज्य बनने और वहाँ विकास-पिछड़ेपन, शासन-कुशासन की चर्चा का कोई अंत नहीं है. पर इतना ज़रुर लगता है कि जो माँग थी, जो घोषित मंशा थी, वह पूरी नहीं हुई है.उत्तराखंड और झारखंड के नाम पर जो लंबी लड़ाई चली और उन आंदोलनों पर जो राजनीतिक रोटियाँ सेंकीं गईं वह सब धरी रह गईं. आदिवासी राज, अपना राज, विकास और सुशासन जैसी चींजें कहीं नहीं दिखतीं. एक और चीज़ न देखें तो चर्चा अधूरी रहेगी.
भूमंडलीकरण और बाज़ार के आकार की ताक़त के आधार पर बेहतर सौदा पटाने के युग में छोटे राज्यों की सार्थकता पर सवाल उठाना ज़रुरी है.
भुखमरी, ख़ुदकशी, नक्सली आतंक, बच्चे बेचने जैसी बदनामी झेलने वाले आँध्र प्रदेश ने इस बीच क्या-क्या पाया है यह याद करना ज़रुरी है.चंद्राबाबू नायडू कितनी बार लाखों टन अनाज, मनचाही नियुक्तियाँ और अरबों का निवेश ले आए हैं इसे याद करना चाहिएसारी मारकाट, सारी बदनामी और सारी मानवनिर्मित आपदाएँ झेलने के बाद गुजरात ने क्या पाया है यह भी याद करना ज़रुरी है.ऐसे में लगता है कि चार सांसदों वाले उत्तराँचल और 14 सांसदों वाले झारखंड की आवाज़ कौन कहाँ सुनेगा?
पर इन छोटे राज्यों की उठती मांग और क्षेत्रीयता के बढ़ते जोर से मैं कही और से भी सशंकित रहता हूँ की कहीं यह सब मात्र राजनितिक फायदे के लिए तो नहीं हो रहा. जाति-धर्म-क्षेत्र-भाषा और न जाने किस किस प्रकार के विवाद ये लोग समय-समय पर केवल अपने फ़ायदे के लिए उठाते रहते हैं, और सामान्य नागरिकों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके, तमाशा देखते रहते हैं। अगर यह क्रम यूं ही चलता रहा, तो हिंदुस्तान एक राष्ट्र नहीं रह जायेगा। भाषा-धर्म और जाति की विभिन्नता इस महान देश को अनेक क्षेत्रों में टुकड़े-टुकड़े कर देगी। अभी अनेक राज्य इस प्रकार का घृणित खेल खेलने में जुटते जा रहे हैं। चाहे महाराष्ट्र हो या तमिलनाडु, चाहे आसाम हो या कश्मीर, चाहे कर्नाटक हो या उड़ीसा; हर तरफ भाषावाद, क्षेत्रवाद, धर्मवाद और जातिवाद की आग को अधिक से अधिक भड़काया जा रहा है। एक दूसरे की भाषा को सीखने और समझने की बजाय हम लोग एक दूसरे की भाषा का तिरस्कार करने में व्यस्त होते जा रहे हैं हमारी मूर्खता यह है कि हम मतलब परस्त राजनेताओं के बहकावे में उलझते जा रहे हैं। इन बातों से न धर्म पनप पायेगा, न जाति; न भाषा का विकास हो पायेगा, न क्षेत्र का। जो कुछ भला होगा, वह केवल राजनेताओं का ही होगा। अगर हर राज्य को छोटे-छोटे राज्यों में बांट दिया जाये, तो उतने अधिक मुख्य मंत्री और मंत्रिगण बन जायेंगे। अगर हर राज्य को राष्ट्र का स्वरूप दे दिया जाये तो उतने ही अधिक प्रधान मंत्री और मंत्री बन जायेंगे। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल, लोकसभा तथा विधान सभा अध्यक्ष आदि आदि कितने सारे पदों पर आसीन हो जायेंगे कितने सारे नेता। परंतु भाषा या धर्म या जाति के आधार पर विभाजन करने से भले ही राजनेता प्रसन्न हो जाये और गर्वित महसूस करने लगें; लेकिन हिंदुस्तान और हिंदुस्तानियों का क्या होगा। वे तो लज्जित महसूस करने की हालत में भी नहीं रह जायेंगे। अति विशाल राष्ट्र रूस का जो बुरा हाल हो चुका है, हम उससे कोई सबक नहीं ले पा रहे हैं।
सबसे अधिक शक्तिशाली, सबसे अधिक प्रगतिशील सोवियत रूस को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर भले ही विश्व में राष्ट्रों की संख्या बढ़गयी हो, और अलग-अलग छोटे-छोटे राष्ट्रों में भले ही राजनेताओं की संख्या बढ़गयी हो लेकिन क्या उन सभी राष्ट्रों का वास्तव में विकास हो रहा है, और क्या वहां के नागरिक अब अधिक प्रसन्न दिखायी दे रहे हैं। मेरा व्यक्तिगत मत यह है कि नेताओं का तो विकास हो गया, परंतु राष्ट्र और नागरिक वैसी ही घुटन महसूस कर रहे हैं, जैसी घुटन एक बहुत बड़े मकान में रहनेवाले किसी व्यक्ति को तब महसूस होती है जब उसे छोटे से एक कमरे में रहने के लिए मजबूर कर दिया जाये। हिंदुस्तान में अलग-थलग लोग विभिन्न अवसरों पर अलगाववाद को बढ़ावा देने की कोशिश करते रहते हैं। कश्मीर को तो बहुत सारे लोग हिंदुस्तान का अंग मानते ही नहीं।केंद्र सरकार भी पता नहीं क्यों उसे विशेष दर्जा देकर अलग रखे हुए है। उत्तर पूर्वी राज्य और दक्षिणी राज्य भी अपने आपको हिंदुस्तान का हिस्सा मानने में हिचकते रहते हैं। पंजाब, खालिस्तान बनते बनते रह गया। हिंदुस्तान का हिस्सा रहे कुछ क्षेत्र, आज पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका कहलाये जानेवाले राष्ट्र बन गये हैं। तिब्बत को चीन निगल ही चुका है और अब सिक्किम भी खतरे में है। पिछले दिनों में दिल्ली के उपराज्यपाल ने दिल्ली आनेवालों को परमिट लेना होगा कहकर एक चिंगारी लगा दी थी । महाराष्ट्र में कई राजनेता बारबार यह मांग करते रहे हैं कि मुंबई आनेवाले लोगों पर रोक लगायी जाये। उनका कहना है कि यहां केवल मराठी भाषी लोग ही रहने चाहिये। अब नया शगूफा मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने छेड़ा है.
यूरोपीय देशों में वहां के नागरिक बिना वीज़ा लिये एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र में आते-जाते रहते हैं। इसी आधार पर सार्क देशों के संगठन ने भी यह प्रस्ताव रखा था कि सार्क देशों के नागरिक एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र, बिना किसी भी रोकटोक के यात्रा कर सकें। कई ऐसे भी देश हैं जहां जाने के लिए पहले से वीजा लेने की आवश्यकता नहीं होती और वहां पहुंचने पर वीज़ा मिल जाता है। जब अनेक राष्ट्र, दूसरे राष्ट्रों के नागरिकों को बिना किसी भी प्रकार की रोक-टोक के, आने-जाने की सुविधा प्रदान कर रहे हैं, तब हिंदुस्तान में एक राज्य से दूसरे राज्य में आना-जाना भी मुश्किल होता जा रहा है। सारा विश्व एक कुटुंब के समान है कहनेवाले ही एक देश को भी एकता के सूत्र में बांध नहीं पा रहे हैं। जो कुछ हिंदुस्तान में घटित हो रहा है, वह भले ही अभी मामूली सी बात लग रही हो, परंतु यदि इसे तुरंत काबू में नहीं लाया गया, तो परिणाम बहुत ही भयानक हो सकते हैं। हिंदुस्तान के बारे में अभी तक शान से कहा जाता था कि यह वह राष्ट्र है, जहां अनेकता में एकता का वास है; जहां आपसी स्नेह तथा भाईचारा कदम-कदम पर दिखायी देता है। लेकिन पिछले कुछ समय से अनेकता में एकता का रूप बदल कर एकता में अनेकता को बढ़ावा देनेवाला नज़र आने लगा है। अब स्नेह को द्वेष में और भाईचारे को नफ़रत में बदलने लगे हैं कुछ स्वार्थी राजनेता। केंद्र सरकार और राज्य सरकारें केवल मूकदर्शक बनी रह जाती हैं। नेताओं को सत्ता की चिंता कुछ इस प्रकार सताती रहती है कि वे अपनी कुर्सी के अलावा कुछ और देख ही नहीं पाते हैं। अलग-अलग दलों की मांगों को स्वीकार करना और अपने स्वार्थवश उनके नेताओं के सामने घुटने टेक कर सब कुछ समर्पित कर देना, सरकारों की विवशता बनती जा रही है। अगर यही हालत बहे रहे तो मुझे तो दर लगता है की अगर हिंदुस्तान की सरकार सख्ती के साथ तुरंत इन अलगाववादी राजनेताओं के साथ पेश नहीं आयेगी, तो वह दिन दूर नहीं, जब हिंदुस्तान में ही एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने के लिए हिंदुस्तान के नागरिकों को ही लेना पड़ेगा - अंतरराज्यीय वीज़ा!
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