मैं हैरान हूं, परेशान हूं और दुखी हूं। रुचिका के लिए आज पूरे देश से आवाज उठ रही है। लोग हरियाणा के पूर्व डीजीपी राठौर के लिए कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहे हैं। मैं भी चाहता हूं कि राठौर को ऐसी सजा मिले जो आने वाले वक्त में एक नजीर बन जाए लेकिन मैं हैरान इसलिए हूं क्योंकि जबसे मीडिया ने रुचिका को इंसाफ दिलाने के लिए मुहिम छे़ड़ी है ऐसे-ऐसे बयान आ रहे हैं कि मन करता है कि क्यों न उन अधिकारियों और राजनेताओं को इस मामले में आरोपी बनाया जाए, क्यों न उनके खिलाफ भी मुकदमा चलाया जाए।
कुछ बानगी देखिये मात्र अपनी याद्दस्ता ताजा करने के लिए
१. २८ दिसंबर २००९ को IBN खास खबर के माध्यम से सामने आया : रूचिका मामले को दबाने के लिए राठौर ने सीबीआई अफसरों को भी घूस देने की कोशिश की थी। यह सनसनीखेज खुलासा सीबीआई के तत्कालीन संयुक्त निदेशक आरएम सिंह ने किया है। आरएम सिंह ने एक चैनल से बातचीत में साफ कहा कि खुद राठौर उनके पास आए आए थे और उन्हें घर बनाने में सहयोग देने का लालच भी दिया था।
उल्लेखनीय है कि राठौर ने न केवल रूचिका को खुदकुशी के लिए मजबूर किया बल्कि 19 साल तक अपने हथकंडों के बल इसी प्रकार गला घोंटता रहा। मामला सीबीआई में आने के बाद राठौर उसके संयुक्त निदेशक आरएम सिंह को प्रलोभन की पेशकश करने उनके दफ्तर पहुंचे। जब वहां उनका काम नहीं बना तो बाद में वह उनके घर पहुंच गए, मगर वहां भी उन्हें निराश हो होना प़डा।
बाद में राठौर को पता लगा कि आरएम सिंह मकान बनवा रहे हैं तो वह फिर उनके घर पहुंच गए और उनको मकान बनाने में मदद की पेशकश कर दी। आरएम सिंह इससे भी नहीं पसीजे तो राठौर ने तेवर बदल लिए और उन्हें भी धमकी देने से बाज नहीं आए। इसके बाद राठौर सीबीआई निदेशक के पास भी पहुंचे और आरएम सिंह के खिलाफ शिकायत की।
सीबीआई के तत्कालीन निदेशक आरएम सहिं ने खुलासा किया कि राठौर ने अपने प्रभाव का हर स्तर पर इस्तेमाल किया। वह हर उस जगह पर पहुंचे जहां यह फाइल घूमती रही। मगर क़डवा सच यह है कि सभी जगह आरएम सिंह नहीं थे, और यही वजह है कि इस मामले में राठौर को सजा मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिल पाई।
कुछ बानगी देखिये मात्र अपनी याद्दस्ता ताजा करने के लिए
१. २८ दिसंबर २००९ को IBN खास खबर के माध्यम से सामने आया : रूचिका मामले को दबाने के लिए राठौर ने सीबीआई अफसरों को भी घूस देने की कोशिश की थी। यह सनसनीखेज खुलासा सीबीआई के तत्कालीन संयुक्त निदेशक आरएम सिंह ने किया है। आरएम सिंह ने एक चैनल से बातचीत में साफ कहा कि खुद राठौर उनके पास आए आए थे और उन्हें घर बनाने में सहयोग देने का लालच भी दिया था।
उल्लेखनीय है कि राठौर ने न केवल रूचिका को खुदकुशी के लिए मजबूर किया बल्कि 19 साल तक अपने हथकंडों के बल इसी प्रकार गला घोंटता रहा। मामला सीबीआई में आने के बाद राठौर उसके संयुक्त निदेशक आरएम सिंह को प्रलोभन की पेशकश करने उनके दफ्तर पहुंचे। जब वहां उनका काम नहीं बना तो बाद में वह उनके घर पहुंच गए, मगर वहां भी उन्हें निराश हो होना प़डा।
बाद में राठौर को पता लगा कि आरएम सिंह मकान बनवा रहे हैं तो वह फिर उनके घर पहुंच गए और उनको मकान बनाने में मदद की पेशकश कर दी। आरएम सिंह इससे भी नहीं पसीजे तो राठौर ने तेवर बदल लिए और उन्हें भी धमकी देने से बाज नहीं आए। इसके बाद राठौर सीबीआई निदेशक के पास भी पहुंचे और आरएम सिंह के खिलाफ शिकायत की।
सीबीआई के तत्कालीन निदेशक आरएम सहिं ने खुलासा किया कि राठौर ने अपने प्रभाव का हर स्तर पर इस्तेमाल किया। वह हर उस जगह पर पहुंचे जहां यह फाइल घूमती रही। मगर क़डवा सच यह है कि सभी जगह आरएम सिंह नहीं थे, और यही वजह है कि इस मामले में राठौर को सजा मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिल पाई।
२. हरियाणा के पूर्व पुलिस प्रमुख आर.आर. सिंह को भी आज अचानक पुरानी बातें याद आने लगी हैं। कहते हैं राठौर ने सीधे तौर पर तो नहीं पर कई दूसरे तरीकों से उन्हें धमकाने की कोशिश की। अपनी बात आगे बढ़ाने से पहले आपको बता दूं कि जिस वक्त राठौर ने रुचिका का यौन शोषण किया था उस वक्त वो आईजी था और आर.आर. सिंह थे डीजीपी यानी पुलिस के सबसे बड़े अफसर। मेरा सवाल ये है कि अगर पूर्व डीजीपी सिंह ने उसी वक्त ये बात उठाई होती तो क्या राठौर के खिलाफ सजा का पुख्ता आधार तैयार नहीं होता।
हम यह जानते हैं और देखते भी हैं कि समाज में अक्सर लोग किसी की मदद के लिए नहीं सामने आते। यह शिकायत भी अक्सर सुनी जाती है कि लोग इतने स्वार्थी और संवेदनहीन हो गए हैं कि पड़ोसी, पड़ोसी की मदद नहीं करता। लेकिन यह परिवार मनुष्यता की एक दूसरी और उजली तस्वीर सामने लाता है जहां वे एक पराई लड़की के लिए सोलह साल से एक व्यवस्था की निरंकुश ताकत से लड़ते रहे। आराधना शादी कर के ऑस्ट्रेलिया चली गई लेकिन वहां से भी अपना बयान दर्ज करवाने भारत आई, और राठौर को सजा दिलवाने में सबसे बड़ी भूमिका उसके बयान की ही थी।
इस तरह के लोग मनुष्यता में उम्मीद बनाए रखते हैं और किसी समाज के असली नायक ये लोग होते हैं, जिन्हें न करोड़ों रुपया, न ग्लैमर, न करोड़ों फैन्स का प्यार मिलता है लेकिन जो चुपचाप एक क्रूर व्यवस्था के सामने न्याय की उम्मीद का दीया जलाते हैं और बरसों उस दीये को जलाए रखते हैं। हमें इस परिवार को तो सलाम करना चाहिए, लेकिन क्या हम ऐसी व्यवस्था भी बनाएंगे जिसमें रुचिका को आत्महत्या न करना पड़े और एक वृद्ध दंपती को न्याय के लिए एड़ियां न रगड़नी पड़ें।
अब बढ़ते हैं राजनीतिज्ञों की तरफ। बात चाहे भजनलाल की हो या स्वर्गीय बंसीलाल की या फिर चौटाला की। अब ये बात किसी से छुपी नहीं है कि सबने राठौर को प्रश्रय दिया। सबने इस बात का पुख्ता इंतजाम किया कि उसके खिलाफ कोई कार्रवाई न हो। अब चूंकि मामला मीडिया में उछल गया है। देशभर के लोग चाहते हैं कि रुचिका मामले में इंसाफ हो, लिहाजा हर पार्टी अपना दामन बचाने में लगी है। सब ही एक दूसरे के सिर पर ठीकरा फोड़कर खुद को पाक साफ दिखाने में जुटे हैं। एक और बात सामने आई है की NDA की सरकार के दौरान यह मामला तत्कालीन केंद्रीय मंत्री शांता कुमार जी ने व्यक्तिगत तौर पर उठाया था और उन्होंने इस बाबत चिट्ठी भी तत्कालीन मुख्यमंत्री चौटाला को लिखी थी, इसकी चर्चा स्वयं प्रधानमंत्री वाजपईजी से की थी पर उस कवि हृदय की नम आँखों की विवशता पर उनकी राजनितिक मजबूरी खुद हावी हो गई क्योंकि केंद्र में एनडीए की सरकार होने के साथ हरियाणा में भी उन्हीं की सरकार थी इसलिए उन्हें लगा कि अगर किसी को पता चल गया कि वो हरियाणा में अपनी ही सरकार के खिलाफ इस तरह का खत लिख रहे हैं तो शायद उनके खत को भेजने ही न दिया जाए।शांता कुमार आज भी मानते हैं कि हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री चौटाला से गलती हुई है। उनसे अपराध हुआ है। एनडीए ने भी समय रहते इस मामले पर ध्यान नहीं दिया। उनके चिट्ठी लिखने के बाद भी राठौर के खिलाफ कुछ नहीं हुआ। इस खत में एक केंद्रीय मंत्री की बेबसी साफ देखी जा सकती है। शांता कुमार की ये चिट्ठी बताती हैं एक नेता का दर्द जिसके हाथ राजनीति ने बांध रखे थे लेकिन असल सवाल ये है कि जिस मामले ने प्रधानमंत्री और एक केंद्रीय मंत्री तक को हिलाकर रख दिया उस मामले में बाकी नेता इतने संवेदनहीन कैसे हो गए?
चौदह साल की रुचिका गिरहोत्र के साथ छेड़खानी के आरोप में हरियाणा पुलिस के पूर्व डीजीपी एसपीएम राठौर को सजा मिलना एक राहत की बात है। इस प्रसंग में दो तथ्यों पर गौर करना जरूरी है। पहला यह कि राठौर ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए मामले को रफा-दफा करने और रुचिका के परिवार को प्रताड़ित करने की भरपूर कोशिश की। अगर हमारा तंत्र कुछ ज्यादा न्यायप्रिय और संवेदनशील होता तो रुचिका के परिवार को इतनी जलालत न झेलनी पड़ती और रुचिका को आत्महत्या नहीं करनी पड़ती। अगर उन्नीस साल बाद राठौर को सजा मिली है तो वह सिर्फ उसकी सहेली आराधना और उसके माता-पिता मधु और आनंद प्रकाश की हिम्मत और संवेदनशीलता की वजह से है।
रुचिका को न्याय दिलाने की कोशिश करने में इस परिवार को कोई कम तकलीफें नहीं ङोलनी पड़ीं, लेकिन इस सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार ने बेटी की सहेली की खातिर वह सब किया, जो अपने परिवार के लिए करने में भी लोग डर जाते हैं। लगातार प्रताड़नाओं और तकलीफों से रुचिका के परिवार का अपने आप में सिमट जाना समझा जा सकता है, लेकिन प्रकाश परिवार के साहस के सामने सिर्फ सम्मान से सिर झुकाया जा सकता है।हम यह जानते हैं और देखते भी हैं कि समाज में अक्सर लोग किसी की मदद के लिए नहीं सामने आते। यह शिकायत भी अक्सर सुनी जाती है कि लोग इतने स्वार्थी और संवेदनहीन हो गए हैं कि पड़ोसी, पड़ोसी की मदद नहीं करता। लेकिन यह परिवार मनुष्यता की एक दूसरी और उजली तस्वीर सामने लाता है जहां वे एक पराई लड़की के लिए सोलह साल से एक व्यवस्था की निरंकुश ताकत से लड़ते रहे। आराधना शादी कर के ऑस्ट्रेलिया चली गई लेकिन वहां से भी अपना बयान दर्ज करवाने भारत आई, और राठौर को सजा दिलवाने में सबसे बड़ी भूमिका उसके बयान की ही थी।
इस तरह के लोग मनुष्यता में उम्मीद बनाए रखते हैं और किसी समाज के असली नायक ये लोग होते हैं, जिन्हें न करोड़ों रुपया, न ग्लैमर, न करोड़ों फैन्स का प्यार मिलता है लेकिन जो चुपचाप एक क्रूर व्यवस्था के सामने न्याय की उम्मीद का दीया जलाते हैं और बरसों उस दीये को जलाए रखते हैं। हमें इस परिवार को तो सलाम करना चाहिए, लेकिन क्या हम ऐसी व्यवस्था भी बनाएंगे जिसमें रुचिका को आत्महत्या न करना पड़े और एक वृद्ध दंपती को न्याय के लिए एड़ियां न रगड़नी पड़ें।
पर मेरा सवाल है हमारे नीति नियंताओं से कि क्या जनता इसलिए आपको इसलिए चुनती है और अपना नुमैन्दा बनाती है कि एक मासूम लड़की के साथ यौन शोषण हो, वह खुदकुशी कर ले, और आप एक दुसरे के पाले में गेंद फेंकते रहे । आरोपी उसके परिवार को खुलेआम धमकाता रहे और आप चुपचाप देखते रहें। रुचिका मामले में बरती गई घोर लापरवाही के लिए क्या इनके खिलाफ मामला दर्ज नहीं होना चाहिए। एक बानगी भर देखे की ऐसी स्थिति में आम आदमी के साथ क्या होता है http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5391894.cms
क्योकि सत्ता के दलालों के साए में एक मासूम की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा?
इस सारी बहस में हम एक किरदार को भूल रहे हैं. वो है रुचिका का छोटा भाई आशु . खाकी वर्दी की खौफ और हरियाणा पुलिस के शिकंजे से भाई आशु को बचने के लिए रुचिका ने 16 साल पहले 28 दिसंबर 1993 को जहर पी लिया था। अगले ही दिन रुचिका की मौत हो गई। और उसके भाई को पुलिसवालों से कब्जे से रिहाई मिल गई। लेकिन इस साल 21 दिसंबर को रुचिका पर फैसला आने के बाद भी आशु घर से बाहर नहीं निकला, कैमरों के सामने नहीं आया। वो अब भी घुट-घुट कर जी रहा है।
दरअसल आशु के दिल में उस वक्त के आईजी पुलिस एसपीएस राठौर का खौफ है। खाकी वर्दी वाले चाहते थे कि राठौर के खिलाफ दर्ज शिकायत रुचिका वापस ले ले। इसी के लिए रुचिका पर इमोशनल अत्याचार का भयानक दौर शुरू कर दिया गया था। उसी कड़ी में उसके भाई आशु को पुलिस वाले उठा ले गए, करीब दो महीने की अवैध हिरासत में रखा गया और हर टॉर्चर से गुजारा गया। राठौर के इशारे पर आशु पर वाहन चोरी के 6 फर्जी मामले दर्ज कराए गए। इन मामलों में फंसाने के बाद आशु को उसके ही गली-मोहल्ले में हाथों में हथकड़ी लगाकर घुमाया गया।इसके बाद भी जब रुचिका ने केस वापस नहीं लिया तो खाकी वर्दी में छिपे शैतानों ने उसकी जमकर पिटाई की। टॉर्चर करने के बाद जब आशु का बुरा हाल हो जाता तब रुचिका के सामने उसकी परेड करवाई जाती। और खुद आशु के हलफनामे के मुताबिक इस टॉ़र्चर की निगरानी खुद आईजी राठौर करते थे।मकसद सिर्फ एक रुचिका को तोड़ डालो, उसके मनोबल उसकी आत्मा को भी मार डालो। वो अपने भाई का बुरा हाल बर्दाश्त नहीं कर सकेगी और आईजी के खिलाफ दर्ज शिकायत वापस ले ली जाएगी, रुचिका मर गई लेकिन उसने शिकायत वापस नहीं ली। वो मर गई और पीछे छोड़ गई इंसाफ की एक अधूरी लाइन। क्या आशु कभी साहस बटोर कर अपनी बहन की मौत के असली जिम्मेदार लोगों को इंसाफ दिलाने के लिए छेड़े गए इस धर्मयुद्ध में शामिल हो सकेगा।
अब देखते हैं उस मासूम के शब्दों में उसकी पीड़ा की कहानी जो मुझे IBN 7 की वेब साईट पर उनके आर्कैव में मिला और वही में हुबहू लिख रहा हूँ, उसका लिंक भी साथ ही है. http://khabar.josh18.com/news/25318/3
ये शब्द हैं 19 साल पुराने। रुचिका का हलफनामा है - तारीख 21 अगस्त 1990। रुचिका ने ये हलफनामा सौंपा हरियाणा के तत्तकालीन डीजीपी को। रुचिका ने साफ लिखा है कि जनवरी 1990 में उसने पंचकुला लॉन टेनिस क्लब की मेंबरशिप ली थी और वो लगातार यहां खेलने जाती थी। इसी क्लब के अध्यक्ष थे आईपीएस एसपीएस राठौर। कनाडा जाने की तैयारियों की बीच जब रुचिका ने टेनिस क्लब में ये एप्लीकेशन दी कि अब वो खेलने नहीं आ पाएगी तो पहली बार राठौर की शक्ल साफ हुई। हलफनामे में रुचिका लिखती है-- राठौर ने मुझे कहा कि तुम्हें कनाडा नहीं जाना चाहिए। तुम बेहद प्रतिभावान खिलाड़ी हो और मैं तुम्हे टेनिस सिखाने के लिए अलग से कोच का भी इंतजाम कर दूंगा। ये वो वक्त था जब रुचिका एसपीएस राठौर की नजरों में चढ़ती जा रही थी। रुचिका पर अचानक मेहरबान हुए राठौर ने उसके पिता से मिलकर भी अपनी बात दोहराई। राठौर ने रुचिका के पिता से ये भी कहा अपनी बेटी को मुझसे मिलने के लिए भेजिए। रुचिका के पिता को वर्दी में छिपा शिकारी नजर नहीं आया सो 12 अगस्त 1990 को रुचिका अपनी दोस्त आराधना के साथ राठौर से मिलने टेनिस क्लब पहुंची।
जब हम वहां पहुंचे तो राठौर अपने ऑफिस के बाहर खड़े थे। हमें देखकर वो अपने ऑफिस के भीतर चले गए और हमें भी अंदर आने को कहा। मैंने उनसे कहा कि ऑफिस के बाहर ही बात करते हैं लेकिन वो भीतर चलने के बाद ही बात करने के लिए जोर डाल रहे थे। उनके कई बार कहने के बाद मैं और मेरी दोस्त ऑफिस के भीतर चले आए। वहां एक और आदमी मौजूद था। राठौर ने उससे सिर्फ एक कुर्सी लाने को कहा।
जब क्लब का वो कर्मचारी कुर्सी लेकर आया तो उसकी दोस्त आराधना कुर्सी पर बैठ गई। रुचिका खड़ी रहकर ही राठौर से बात कर रही थी। उसी वक्त राठौर ने ऐसा कुछ किया जिससे उनके इरादे जाहिर हो गए। राठौर ने कमरे में मौजूद दूसरे शख्स को दूसरी कुर्सी लाने से भी मना कर दिया। वो बाहर गया तो राठौर ने आराधना को कोच से मिलकर आने को कहा।
"क्या सीबीआई ने ये हलफनामा गौर से नहीं पढ़ा।" अगर पढ़ा होता तो ये बात तो साफ हो जाती कि आईपीएस राठौर के दिमाग में रुचिका को लेकर कोई खिचड़ी पक रही थी। वो मौके के इंतजार में थे और ये मौका सामने खड़ा था।जैसे ही आराधना कमरे से बाहर गई राठौर ने मेरा हाथ पकड़ लिया, मैंने एक झटके से अपना हाथ छुड़ा लिया। वो अपनी कुर्सी से उठे और आगे बढ़ते हुए एक बार फिर मेरा हाथ पकड़ लिया। वो मेरे और पास आ गए एक हाथ कमर पर रखते हुए मुझे अपनी ओर खींचा।एक आईपीएस अफसर, कानून का रखवाला और ये हरकत। साफ है एसपीएस राठौर को अपनी वर्दी का गुरुर था, वर्ना एक 14 साल की टेनिस खिलाड़ी को अकेले कमरे में बुलाने और उसे अपनी ओर खींचने की हिम्मत न करते। पद और रुतबे का नंगा नाच आगे भी जारी रहा।मैंने अपने हाथ से धक्का देकर राठौर को हटाने की कोशिश की...मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है...राठौर का बर्ताव देखकर मैं बुरी तरह सदमे में थी...नर्वस थी। तभी मेरी दोस्त आराधना अचानक कमरे के भीतर पहुंच गई। आराधना को देखते ही राठौर ने मुझे छोड़ दिया और कुर्सी पर वापस बैठ गए।राठौर यहीं नहीं रुके, ये देखकर कि अब तो रुचिका की दोस्त आराधना भी यहां आ गई है, उन्होंने आराधनी को फिर बाहर भेजने की कोशिश की, उसे कोच को यहां बुला कर लाने को कहा। और जब आराधना नहीं गई तो राठौर उस पर चीख पड़े। मैं कमरे से बाहर भाग गई, मैंने अपनी दोस्त आराधना को तुरंत सब कुछ कह दिया। उसने खुद देखा था कि कैसे राठौर मेरे साथ बद्तमीजी कर रहे थे। मैं डरी हुई थी...नर्वस थी...मैंने आराधना से पूछा कि हमें क्या करना चाहिए। क्या अपने पिता को बताऊं। लेकिन राठौर तब आईजी पुलिस थे...वो हमें और हमारे परिवार को परेशान कर सकते थे, इसलिए हमने किसी को इस बारे में नहीं बताने का फैसला किया।शायद रुचिका इस बात से अनजान थी कि ये चुप्पी उस आईपीएस अफसर के हौसले बढ़ाने वाली है। वो तो अब वर्दी के नशे में इतना डूब चुका था कि रोके नहीं रुकने वाला था। जिंदगी के इस मोड़ के बाद रुचिका के लिए बाकी था तो सिर्फ अंधेरा और भयानक बेबसी। ऐसे में उसकी मददगार बनी उसकी सखी, उसकी सहेली, आराधना।वो आराधना जिसने न केवल उस वक्त दोस्ती की मिसाल दी, बल्कि रुचिका की खुदकुशी के 19 साल बाद अब भी उसी दोस्ती की खातिर इस केस को लड़ती रही। रुचिका के हलफनामा में रुचिका का साहस और उसकी समझदारी भी दिखती है।14 अगस्त को फिर रुचिका अपनी दोस्त आराधना के साथ टेनिस खेलने गई। इस उम्मीद के साथ कि जो कुछ 12 अगस्त को हुए वो दोबारा नहीं होगा। हलफनामे में रुचिका ने लिखा कि वो जानबूझ कर ऐसे टाइम पर गई कि उसका सामना राठौर से ना हो। लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंजूर था।हम दोनों खेलने के बाद घर वापस जा रहे थे कि टेनिस क्लब का एक कर्मचारी आया और उसने मुझसे कहा कि आईपीएस राठौर तुम्हें अपने दफ्तर में बुला रहे हैं।रुचिका समझ चुकी थी कि हमारे देश में एक आईपीएस अफसर कितना ताकतवर हो सकता है। वो लड़की को छेड़ने के दो दिन बाद उसे दोबारा अपने कमरे में बुलाने की हिम्मत रख सकता है। क्योंकि उसे शायद ये पता था कि उसकी वर्दी के आगे सब के सब बौने हैं। यहीं रुचिका ने फैसला किया कि वो अब चुप नहीं रहेगी। बिन मां की ये बच्ची एक मां का आंचल तलाश रही थी।मैं आराधना के घर गई और पूरी बात उसकी मां को बताई। मेरी मां नहीं थी इसलिए खुद पर जो गुजरी वो आराधना की मां को बताते-बताते मैं बुरी तरह रोने लगी थी।
ये एक 14 साल की लड़की की तकलीफ है वो लड़की जो आज हमारे बीच में नहीं है, क्योंकि उसने देखा कि ये हलफनामा भेजने के बावजूद पुलिस ने कभी इस आईपीएस अफसर को गिरफ्तार नहीं किया, उल्टे उसका तो प्रमोशन होता गया। उसने देखा कि उसके अपने भाई के माथे पर कार चोरी के 11 केस थोप दिए गए, उसने देखा कि कैसे आईपीएस के खिलाफ बोलने पर उसके पापा की बैंक की नौकरी चली गई, उसने देखा कि कैसे नेताओं ने इस आईपीएस को सजा का कोड़ा मारने के बजाय ईनाम दिए। और इसी के बाद रुचिका ने खुदकुशी कर ली। और जाते जाते वो मार गई इस केस का कत्ल करने वाले हर नेता, हर पुलिसवाले, हर अफसरशाह के मुंह पर तमाचा।
मालूम हो कि इस कांड की शुरुआत में राठौर सिर्फ डीआईजी था। लेकिन सियासी गलियारे में उसकी पैठ इतनी मजबूत थी कि उसने अपने खिलाफ हो रही जांच का ही गला घोंट दिया। जांच करने वाले और एफआईआर की सिफारिश करने वाले डीजीपी को भी धमकियां देता रहा।जाहिर है रुचिका का कातिल कोई एक नहीं था। उस मासूम बच्ची को मारने में तमाम हाथ शामिल हैं। रुचिका के खून से उन सबके हाथ रंगे हैं जिन्होने उसे बचाने की कोशिश नहीं की।
No comments:
Post a Comment