Tuesday, December 15, 2009

Low Floor Bushes: Who is the villen?

 Bus caught fire


मेट्रो की तरह डीटीसी की लो फ्लोर बसों के भी दिन अच्छे नहीं नजर आ रहे हैं। बृहस्पतिवार को दो बसों में फिर आग लग गई। हालांकि किसी भी यात्री को आंच तक नहीं आई, लेकिन यह बसें मानो मुसीबत बनती जा रही हैं। सरकार ने बस बनाने वाली कंपनी टाटा मोटर्स को कड़ी फटकार लगाई है। डिपो और कंपनी के मैनेजर को निलंबित कर दिया गया। घटना की जांच के लिए चार विशेषज्ञों की एक कमेटी बना दी गई है, जो महीने भर में रिपोर्ट सौंपेगी। पर  दिल्ली में डीटीसी की लो-फ्लोर बसों में आग लगने का सिलसिला ठहरने का नाम नहीं ले रहा है। रविवार रविवार सुबह करीब पौने सात बजे सागर पुर में डीटीसी बस के पिछले हिस्से में आग लग गई. इससे पहले बीते दिन शनिवार को पहली घटना बदरपुर से गुड़गांव जा रही बस में हुई, जिसमें 50 से ज्यादा मुसाफिर थे। सुबह करीब सवा नौ बजे बस महरौली-बदरपुर रोड पर लाल कुआं के सामने से गुजर रही थी, तभी इंजन से धुआं निकलने लगा। बस के पहिये भी जाम हो गए थे। दूसरी घटना अक्षरधाम फ्लाईओवर के पास हुई। रूट नंबर-355 की बस आनंद पर्वत से नोएडा जा रही थी। दोपहर करीब 12 बजे बस अक्षरधाम फ्लाईओवर के नीचे पहुंची तो बस के पीछे वाले राइट साइड के पहिये से धुआं निकलने लगा। उस वक्त बस में करीब 45 सवारियां थीं। ड्राइवर और कंडक्टर ने बस को तुरंत खाली करा लिया।


लो फ्लोर ग्रीन बसों में आग की पिछली घटनाएं 
30 मार्च: राम मनोहर लोहिया अस्पताल के पास रूट नंबर आरएल-77 की बस में आग से काफी नुकसान।
30 नवंबर: राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल के पास रूट नंबर आरएल-77 की बस में आग से मामूली नुकसान।
3 दिसंबर: मोती नगर इलाके में रूट नंबर 832 की बस पूरी तरह से जल गई।
3 दिसंबर : अमर कॉलोनी इलाके में रूट नंबर 724 की बस में आग से मामूली नुकसान। 



इस आग का धुआं कल सोमवार को विधान सभा में भी उठा. दिल्ली  में एक के बाद एक आये दिन लो फ्लोर बसों में आग लगने की घटनाओं का मामला सोमवार को दिल्ली विधानसभा में जोर-शोर से उठाया गया। शीला सरकार ने टाटा पर 4 करो़ड रूपए का जुर्माना किया है और 150 करो़ड रूपए का भुगतान भी रोक लिया है।
इस मामले में परिवहन मंत्री द्वारा दिए गए जवाब से असन्तुष्ट विपक्ष भाजपा ने सदन का बहिष्कार किया। सदस्यों द्वारा उठाये गए इस मामले में परिवहन मंत्री अरविन्द्र सिंह ने कहा कि लो फ्लोर बसें दिल्लीवासियों के लिए पूरी तरह से ठीक हैं। उन्होंने दावा किया कि अब तक एक ही बस में आग लगी है। अन्य बसों में जो घटनाएं हुई उसका सी.एन.जी. कारण नहीं है इन घटनाओं की तकनीकी जांच की जा रही है और जो कमियां पाई जाएंगी उन्हें जल्दी ठीक किया जाएगा।
परिवहन मंत्री ने जानकारी दी कि इन घटनाओं को देखते हुए सरकार ने बस निर्माता टाटा कम्पनी की नई आने वाली बसों का भुगतान रोक दिया है साथ ही कम्पनी पर चार करो़ड रूपए की पेनल्टी लगाई गई है। अरविन्दर सिंह ने कहा कि डी.टी.सी. के बेडे में कुल 991 लो फ्लोर बसें है और इनकी नियमित जांच के बाद ही प्रतिदिन स़डकों पर उतारा जाता है उन्होंने कहा कि अब तक सी.एन.जी. के कारण एक ही बस में आग लगी है। अन्य घटनाएं तकनीकी कारणों से हुई। जिनकी जांच की जा रही है।
उन्होंने कहा कि सरकार इन घटनाओं के प्रति पूरी तरह से चिन्तित है। इसके लिए जहां चार विशेषज्ञों की जांच कमेटी गठित की गई है वहीं टाटा कम्पनी को भी इस मामले में क़डे निर्देश दिए गए हैं और स्पष्ट कहा गया कि वह बसों के रखरखाव सिस्टम को और दुरूस्त करें वरना उसका कान्टैक्ट रद्द भी किया जा सकता है।

पब्लिक के खून पसीने की कमाई खर्च करके भारी भारी भरकम कीमत पर खरीदी गई डीटीसी की लो फ्लोर में आग लगने की घटना ने दिल्ली की बसों की सेफ्टी पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। ये हादसे इसलिए भी गंभीर हैं, क्योंकि न सिर्फ इन बसों की खरीद पर भारी रकम खर्च की गई बल्कि इनके रखरखाव पर डीटीसी को रोजाना लाखों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। हालत यह है कि अगर इन बसों की मेंटेनेंस शर्तों को देखा जाए तो बसों को खरीदने के लिए जितनी कीमत दी गई है, उतनी ही कीमत इन रखरखाव के तौर पर भी दी जाएगी। इसके बावजूद बसों में आग लगने से साफ हो गया है कि पूरे सिस्टम में ही खामियां हैं, जिन्हें दुरुस्त करने की जरूरत है। 
1. मेंटेनेंस : जब बसों को खरीदने के साथ ही उनकी मेंटेनेंस की शर्त जोड़ी गई थी, उस वक्त डीटीसी ने दावा किया था कि इससे शहर में बस व्यवस्था दुरुस्त होगी और चूंकि बस बनाने वाली कंपनी के एक्सपर्ट कर्मचारी ही मेंटेनेंस करेंगे इसलिए सुबह वक्त पर बसें तैयार मिलेंगी। लेकिन हुआ उलटा। हालात यह हैं कि डिपो में मेंटेनेंस पहले से ही बदतर हो गई है। डीटीसी की सौ बसों वाले डिपो में जितना स्टॉफ रखा जाता था, प्राइवेट कंपनी उससे आधा ही रखती है। यह स्टॉफ भी अनट्रेंड है। कई जगह तो कंपनी ने मेंटेनेंस का काम आगे ठेके पर दे दिया है। इन्हें इतना कम वेतन दिया जाता है कि डीटीसी के अधिकारी किसी कर्मचारी को ठीक मेंटेनेंस के लिए डांट देते हैं तो वह कर्मचारी अगले दिन आता ही नहीं है। कायदे से मेंटेनेंस के लिए हर डिपो में ऑटोमोबाइल या मेकेनिकल इंजीनियर होना चाहिए। लेकिन प्राइवेट कंपनी की बसों वाले डिपो में कोई सीनियर इंजीनियर ही नहीं होता। 

2. डीटीसी प्रबंधन  : बसों की मेंटेनेंस करने वाली कंपनी के प्रति डीटीसी के ही कुछ अफसरों की सहानुभूति है। यही वजह है कि कुछ अरसा पहले ठीक तरह से मेंटेनेंस न करने के कारण डीटीसी के कुछ अफसरों ने इस कंपनी पर जुर्माना ठोक दिया था लेकिन डीटीसी के ही कुछ अफसरों ने जुर्माना ठोकने वाले अफसरों की पीठ थपथपाने की बजाय जुर्माने की राशि को ही ज्यादा बताते हुए कमिटी बना दी। यही वजह है कि बसों की मेंटीनेंस पर ही ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता।

3. अनाड़ी ड्राइवर : नई नवेली बसों की बुरी हालत के लिए कुछ हद तक डीटीसी के वे ड्राइवर भी जिम्मेदार हैं, जो अनाड़ी हैं। डीटीसी ने कथित तौर पर भ्रष्टाचार खत्म करने के इरादे से दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड के जरिए ड्राइवर तो नियुक्त कर दिए लेकिन उनमें से कई ड्राइवर तो ऐसे हैं, जिन्होंने इससे पहले शहर की सड़कों पर कभी बस चलाई ही नहीं। यही वजह है कि इन ड्राइवरों को इन अत्याधुनिक बसों की ज्यादा जानकारी ही नहीं हैं। डीटीसी के ही एक वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी का कहना है कि लो फ्लोर बसों में गुरुवार को जो हादसे हुए हैं, उनमें बस के पिछले पहिए जाम हो गए। पहिया जब जाम होने लगता है तो बस उसी तरह से भारी हो जाती है, जैसे टायर पंक्चर होने पर होता है। ऐसे में ट्रेंड ड्राइवर फौरन बस रोककर जांच करता है। लेकिन ड्राइवर अगर बस चलाता रहता है तो उससे इसी तरह टायर गर्म होकर फट जाता है और आग लग जाती है। गुरुवार को भी दोनों ही बसों में पहिया जाम होने की वजह से बस में आग लगी। सीमापुरी में भी तीन महीने पहले इसी तरह बस में आग लगी थी।

4. जिम्मेदारी  : मेंटेनेंस की शर्तें तय होने केबावजूद अब तक जिम्मेदारी तय नहीं है। हालांकि जिन डिपो में लो फ्लोर बसें हैं और उनमें मेंटेनेंस प्राइवेट कंपनी के जिम्मे है लेकिन यह ठीक हो रही है या नहीं, इसे लेकर कोई जवाबदेही तय नहीं है। डिपो में तैनात डीटीसी कर्मचारियों की जिम्मेदारी महज इतनी है कि जब बस डिपो से बाहर पैसेंजरों के लिए तो वह साफ हो। लेकिन बस मेकेनिकल तौर पर दुरुस्त है या नहीं, इसे जांचने का जिम्मा किसका होगा, कोई नहीं जानता। यही वजह है कि बस में खराबी का तभी पता चलता है, जब वह रास्ते में खराब होती है या फिर उसमें आग लगने जैसी कोई घटना होती है।

5. अनसेफ डिज़ाइन  : जब ये बसें खरीदी गईं तो दावा किया गया था कि इनमें ऐसा मटीरियल इस्तेमाल हुआ है जो जल्दी आग नहीं पकड़ता। लेकिन इन घटनाओं से साफ हो गया है कि इसमें दम नहीं है। पीछे इंजन लगा है लेकिन सीटें उसके ऊपर ही बना है। कई एक्सपर्ट इस बस की बॉडी के डिजाइन को ही अनसेफ मानते हैं। आईएफटीआरटी इंडियन फाउंडेशन फॉर ट्रांसपोर्ट रिसर्च के को-ऑर्डिनेटर एस. पी. सिंह बसों का मेंटेनेंस में तो गड़बड़ है डिजाइन भी सेफ नहीं है।



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६. बस बॉडी कोड लागू नहीं : केंद्र सरकार ने बसों की सेफ्टी के लिए बस बॉडी कोड लागू किया है। यह कोड पिछले साल 1 अक्टूबर को लागू होना था, लेकिन कागजातों का अनुवाद न होने की वजह से मामला टल गया। हालांकि कानूनी तौर पर इस बस बॉडी कोड को लागू करना जरूरी नहीं है, लेकिन अगर डीटीसी चाहती तो इस बस बॉडी कोड को अपनी बसों में तो लागू कर ही सकती थी। इस बस बॉडी कोड में बसों में लगने वाली हर चीज के स्तर का कोड तय है। ऐसे में अगर बस बॉडी कोड लागू होता है तो जाहिर है कि इन बसों की सेफ्टी के प्रति पैसेंजरों का विश्वास और बढ़ सकता है।

७.टाइप अप्रूवल : इन बसों के टाइप अप्रूवल को लेकर भी तकनीकी जानकार सवाल उठा रहे हैं। दरअसल, जब भी कोई नया वाहन तैयार होता है, उसका पहले टाइप अप्रूवल लिया जाना जरूरी होता है। इंडियन फाउंडेशन ऑफ ट्रांसपोर्ट रिसर्च एंड ट्रेनिंग के को-ऑडिर्नेटर एस.पी. सिंह का कहना है कि पहले बसों का टाइप अप्रूवल पुणे की एक एजेंसी (एआरएआई) से लिया जाता था, लेकिन अब इन बसों के लिए अहमद नगर की एजेंसी वीआरडीई से टाइप अप्रूवल लिया गया है। सिंह का कहना है कि यह पता लगाया जाना जरूरी है कि आखिर इन बसों के लिए टाइप अप्रूवल एआरएआई से क्यों नहीं लिया गया जबकि अब तक यही बस बनाने वाली कंपनी एआरएआई से ही टाइप अप्रूवल लेती रही है। उनका कहना है कि इन बसों में जिस तरह से हादसे हो रहे हैं, उससे साफ है कि इन बसों में मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट है और उसे दुरुस्त किया जाना जरूरी है।



पर एक बात अभी भी सोचने की है की यही लो फ्लोर बसें दिल्ली के अलावा और भी शहरों में चल रही हैं पर वह ऐसी दुर्घटना की बात सामने नहीं आई है. अगर आई हो तो कृपया बताएं. फिर वजह कहीं कुछ और तो नहीं?  




कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए दिल्ली के रंग-रूप को चार चांद लगाने में एक तरफ तो मेट्रो और दूसरी तरफ लो फ्लोर बसों का खासा योगदान माना जा सकता है। हरी और लाल लो फ्लोर बसें जब सड़कों पर इठलाती-बलखाती चलती हैंतो मन का गदगद हो जाना स्वाभाविक ही है। एक संकेत मिलता है कि हम वर्ल्ड क्लास सिटी के नागरिक बनने की ओर अग्रसर हैं।



मगरयह खुशी यह संतोष पल भर में ही काफूर हो जाता हैक्योंकि जिन बसों की सुंदरता पर हम और आप फिदा हो रहे हैंवह केवल दिखावा ही है। इसे इत्तफाक नहीं कहा जा सकताक्योंकि जब एक महीने में ही चार बसों में आग लग जाए तो कोई भी कह उठेगा कि दाल में काला जरूर हैतभी तो ये खूबसूरत बसें धुएं के गुबार में समा रही हैं।



दरअसलइन बसों की खरीद से लेकर मेंटिनंस तक हर कदम पर इतने आरोप लगते रहे हैं कि हर बार ऐसी घटना पर ठिठकना पड़ता है। बसों की खरीद का मामला लोकायुक्त के पास लंबित है और अब बसों की मेंटिनंस पर भी सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। दिल्ली सरकार द्वारा खरीदी जा रही एक लो फ्लोर सीएनजी बस की कीमत 50 लाख रुपये से अधिक है।



मामला केवल इसी कीमत पर ही नहीं रुकताबल्कि सच तो यह है कि हर साल रखरखाव के नाम पर लगभग 10 लाख रुपये एक बस पर खर्च किए जाते हैं। ऐन्युअल मेंटिनंस कॉन्ट्रैक्ट यानी एएमसी की शर्त बस की खरीद के साथ ही जुड़ी हुई है। एक बस की उम्र आमतौर पर 8 साल मानी जाती है और सरकार प्रति बस करीब 85 लाख रुपये मेंटिनंस ही दे रही है। कुल मिलाकर हिसाब लगाएं तो एक बस 1.35 करोड़ रुपये की बैठती है। हालाँकि 


सरकार ने बसों के खराब रख-रखाव के लिए टेल्‍को पर 4 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया है.सरकार ने चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर इसी तरह हादसे जारी रहे, तो आपराधिक मामला दर्ज किया जाएगा. पूरे मामले की जांच के लिए 4 सदस्‍यीय कमेटी बनाई गई है, जो 1 महीने के अंदर रिपोर्ट पेश करगी. बहरहाल, आरामदायक और सुरक्षित यातायात की चाहत रखने वाले राजधानीवासी को अभी भी सरकार के ठोस कदम का इंतजार है. अब देखते हैं की आगे क्या होगा या क्या होने वाला है फिलहाल कोई राहत तो नहीं दिख रही है और न ही कुछ नया सुनने को आ रहा है बस तलाश है एक बलि के बकरे की? देखते हैं किसकी बलि चद्ती है. तबतक के लिए बस इतना जान लें की ये है दिल्ली मेरी जान!



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