Wednesday, December 30, 2009

Ruchika Girhotra Molestation Case: Suicide or Murder :Justice Delayed is Justice Denied


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मैं हैरान हूं, परेशान हूं और दुखी हूं। रुचिका के लिए आज पूरे देश से आवाज उठ रही है। लोग हरियाणा के पूर्व डीजीपी राठौर के लिए कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहे हैं। मैं भी चाहता हूं कि राठौर को ऐसी सजा मिले जो आने वाले वक्त में एक नजीर बन जाए लेकिन मैं हैरान इसलिए हूं क्योंकि जबसे मीडिया ने रुचिका को इंसाफ दिलाने के लिए मुहिम छे़ड़ी है ऐसे-ऐसे बयान आ रहे हैं कि मन करता है कि क्यों न उन अधिकारियों और राजनेताओं को इस मामले में आरोपी बनाया जाए, क्यों न उनके खिलाफ भी मुकदमा चलाया जाए।
कुछ बानगी देखिये मात्र अपनी याद्दस्ता ताजा करने के लिए
१. २८ दिसंबर २००९ को IBN खास खबर  के माध्यम से सामने आया  :  रूचिका मामले को दबाने के लिए राठौर ने सीबीआई अफसरों को भी घूस देने की कोशिश की थी। यह सनसनीखेज खुलासा सीबीआई के तत्कालीन संयुक्त निदेशक आरएम सिंह ने किया है। आरएम सिंह ने एक चैनल से बातचीत में साफ कहा कि खुद राठौर उनके पास आए आए थे और उन्हें घर बनाने में सहयोग देने का लालच भी दिया था।
उल्लेखनीय है कि राठौर ने न केवल रूचिका को खुदकुशी के लिए मजबूर किया बल्कि 19 साल तक अपने हथकंडों के बल इसी प्रकार गला घोंटता रहा। मामला सीबीआई में आने के बाद राठौर उसके संयुक्त निदेशक आरएम सिंह को प्रलोभन की पेशकश करने उनके दफ्तर पहुंचे। जब वहां उनका काम नहीं बना तो बाद में वह उनके घर पहुंच गए, मगर वहां भी उन्हें निराश हो होना प़डा।
बाद में राठौर को पता लगा कि आरएम सिंह मकान बनवा रहे हैं तो वह फिर उनके घर पहुंच गए और उनको मकान बनाने में मदद की पेशकश कर दी। आरएम सिंह इससे भी नहीं पसीजे तो राठौर ने तेवर बदल लिए और उन्हें भी धमकी देने से बाज नहीं आए। इसके बाद राठौर सीबीआई निदेशक के पास भी पहुंचे और आरएम सिंह के खिलाफ शिकायत की।
सीबीआई के तत्कालीन निदेशक आरएम सहिं ने खुलासा किया कि राठौर ने अपने प्रभाव का हर स्तर पर इस्तेमाल किया। वह हर उस जगह पर पहुंचे जहां यह फाइल घूमती रही। मगर क़डवा सच यह है कि सभी जगह आरएम सिंह नहीं थे, और यही वजह है कि इस मामले में राठौर को सजा मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिल पाई।

२. हरियाणा के पूर्व पुलिस प्रमुख आर.आर. सिंह को भी आज अचानक पुरानी बातें याद आने लगी हैं। कहते हैं राठौर ने सीधे तौर पर तो नहीं पर कई दूसरे तरीकों से उन्हें धमकाने की कोशिश की। अपनी बात आगे बढ़ाने से पहले आपको बता दूं कि जिस वक्त राठौर ने रुचिका का यौन शोषण किया था उस वक्त वो आईजी था और आर.आर. सिंह थे डीजीपी यानी पुलिस के सबसे बड़े अफसर। मेरा सवाल ये है कि अगर पूर्व डीजीपी सिंह ने उसी वक्त ये बात उठाई होती तो क्या राठौर के खिलाफ सजा का पुख्ता आधार तैयार नहीं होता।
अब बढ़ते हैं राजनीतिज्ञों की तरफ। बात चाहे भजनलाल की हो या स्वर्गीय बंसीलाल की या फिर चौटाला की। अब ये बात किसी से छुपी नहीं है कि सबने राठौर को प्रश्रय दिया। सबने इस बात का पुख्ता इंतजाम किया कि उसके खिलाफ कोई कार्रवाई न हो। अब चूंकि मामला मीडिया में उछल गया है। देशभर के लोग चाहते हैं कि रुचिका मामले में इंसाफ हो, लिहाजा हर पार्टी अपना दामन बचाने में लगी है। सब ही एक दूसरे के सिर पर ठीकरा फोड़कर खुद को पाक साफ दिखाने में जुटे हैं। एक और बात सामने आई है की NDA की सरकार के दौरान यह मामला तत्कालीन केंद्रीय मंत्री शांता कुमार जी ने व्यक्तिगत तौर पर उठाया था और उन्होंने इस बाबत चिट्ठी भी तत्कालीन मुख्यमंत्री चौटाला को लिखी थी, इसकी चर्चा स्वयं प्रधानमंत्री वाजपईजी से की थी पर उस कवि हृदय की नम आँखों की विवशता पर उनकी राजनितिक मजबूरी खुद हावी हो गई क्योंकि केंद्र में एनडीए की सरकार होने के साथ हरियाणा में भी उन्हीं की सरकार थी इसलिए उन्हें लगा कि अगर किसी को पता चल गया कि वो हरियाणा में अपनी ही सरकार के खिलाफ इस तरह का खत लिख रहे हैं तो शायद उनके खत को भेजने ही न दिया जाए।शांता कुमार आज भी मानते हैं कि हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री चौटाला से गलती हुई है। उनसे अपराध हुआ है। एनडीए ने भी समय रहते इस मामले पर ध्यान नहीं दिया। उनके चिट्ठी लिखने के बाद भी राठौर के खिलाफ कुछ नहीं हुआ। इस खत में एक केंद्रीय मंत्री की बेबसी साफ देखी जा सकती है। शांता कुमार की ये चिट्ठी बताती हैं एक नेता का दर्द जिसके हाथ राजनीति ने बांध रखे थे लेकिन असल सवाल ये है कि जिस मामले ने प्रधानमंत्री और एक केंद्रीय मंत्री तक को हिलाकर रख दिया उस मामले में बाकी नेता इतने संवेदनहीन कैसे हो गए?
चौदह साल की रुचिका गिरहोत्र के साथ छेड़खानी के आरोप में हरियाणा पुलिस के पूर्व डीजीपी एसपीएम राठौर को सजा मिलना एक राहत की बात है। इस प्रसंग में दो तथ्यों पर गौर करना जरूरी है। पहला यह कि राठौर ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए मामले को रफा-दफा करने और रुचिका के परिवार को प्रताड़ित करने की भरपूर कोशिश की। अगर हमारा तंत्र कुछ ज्यादा न्यायप्रिय और संवेदनशील होता तो रुचिका के परिवार को इतनी जलालत न झेलनी पड़ती और रुचिका को आत्महत्या नहीं करनी पड़ती। अगर उन्नीस साल बाद राठौर को सजा मिली है तो वह सिर्फ उसकी सहेली आराधना और उसके माता-पिता मधु और आनंद प्रकाश की हिम्मत और संवेदनशीलता की वजह से है।
रुचिका को न्याय दिलाने की कोशिश करने में इस परिवार को कोई कम तकलीफें नहीं ङोलनी पड़ीं, लेकिन इस सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार ने बेटी की सहेली की खातिर वह सब किया, जो अपने परिवार के लिए करने में भी लोग डर जाते हैं। लगातार प्रताड़नाओं और तकलीफों से रुचिका के परिवार का अपने आप में सिमट जाना समझा जा सकता है, लेकिन प्रकाश परिवार के साहस के सामने सिर्फ सम्मान से सिर झुकाया जा सकता है।
 हम यह जानते हैं और देखते भी हैं कि समाज में अक्सर लोग किसी की मदद के लिए नहीं सामने आते। यह शिकायत भी अक्सर सुनी जाती है कि लोग इतने स्वार्थी और संवेदनहीन हो गए हैं कि पड़ोसी, पड़ोसी की मदद नहीं करता। लेकिन यह परिवार मनुष्यता की एक दूसरी और उजली तस्वीर सामने लाता है जहां वे एक पराई लड़की के लिए सोलह साल से एक व्यवस्था की निरंकुश ताकत से लड़ते रहे। आराधना शादी कर के ऑस्ट्रेलिया चली गई लेकिन वहां से भी अपना बयान दर्ज करवाने भारत आई, और राठौर को सजा दिलवाने में सबसे बड़ी भूमिका उसके बयान की ही थी।

इस तरह के लोग मनुष्यता में उम्मीद बनाए रखते हैं और किसी समाज के असली नायक ये लोग होते हैं, जिन्हें न करोड़ों रुपया, न ग्लैमर, न करोड़ों फैन्स का प्यार मिलता है लेकिन जो चुपचाप एक क्रूर व्यवस्था के सामने न्याय की उम्मीद का दीया जलाते हैं और बरसों उस दीये को जलाए रखते हैं। हमें इस परिवार को तो सलाम करना चाहिए, लेकिन क्या हम ऐसी व्यवस्था भी बनाएंगे जिसमें रुचिका को आत्महत्या न करना पड़े और एक वृद्ध दंपती को न्याय के लिए एड़ियां न रगड़नी पड़ें।
पर मेरा सवाल है हमारे नीति नियंताओं से  कि क्या जनता इसलिए आपको इसलिए चुनती है और अपना नुमैन्दा  बनाती है कि एक मासूम लड़की के साथ यौन शोषण हो, वह खुदकुशी कर ले, और आप एक दुसरे के पाले में गेंद फेंकते रहे । आरोपी उसके परिवार को खुलेआम धमकाता रहे और आप चुपचाप देखते रहें। रुचिका मामले में बरती गई घोर लापरवाही के लिए क्या इनके खिलाफ मामला दर्ज नहीं होना चाहिए।  एक बानगी भर देखे की ऐसी स्थिति में आम आदमी के साथ क्या होता है http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5391894.cms
क्योकि सत्ता के दलालों के साए में एक मासूम की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा? 
इस सारी बहस में हम एक किरदार को भूल रहे हैं. वो है रुचिका का छोटा भाई आशु . खाकी वर्दी की खौफ और हरियाणा पुलिस के शिकंजे से  भाई  आशु को बचने के लिए रुचिका  ने 16 साल पहले 28 दिसंबर 1993 को  जहर पी लिया था। अगले ही दिन रुचिका की मौत हो गई। और उसके भाई को पुलिसवालों से कब्जे से रिहाई मिल गई। लेकिन इस साल 21 दिसंबर को रुचिका पर फैसला आने के बाद भी आशु घर से बाहर नहीं निकला, कैमरों के सामने नहीं आया। वो अब भी घुट-घुट कर जी रहा है। 
दरअसल आशु के दिल में उस वक्त के आईजी पुलिस एसपीएस राठौर का खौफ है। खाकी वर्दी वाले चाहते थे कि राठौर के खिलाफ दर्ज शिकायत रुचिका वापस ले ले। इसी के लिए रुचिका पर इमोशनल अत्याचार का भयानक दौर शुरू कर दिया गया था। उसी कड़ी में उसके भाई आशु को पुलिस वाले उठा ले गए, करीब दो महीने की अवैध हिरासत में रखा गया और हर टॉर्चर से गुजारा गया। राठौर के इशारे पर आशु पर वाहन चोरी के 6 फर्जी मामले दर्ज कराए गए। इन मामलों में फंसाने के बाद आशु को उसके ही गली-मोहल्ले में हाथों में हथकड़ी लगाकर घुमाया गया।इसके बाद भी जब रुचिका ने केस वापस नहीं लिया तो खाकी वर्दी में छिपे शैतानों ने उसकी जमकर पिटाई की। टॉर्चर करने के बाद जब आशु का बुरा हाल हो जाता तब रुचिका के सामने उसकी परेड करवाई जाती। और खुद आशु के हलफनामे के मुताबिक इस टॉ़र्चर की निगरानी खुद आईजी राठौर करते थे।मकसद सिर्फ एक रुचिका को तोड़ डालो, उसके मनोबल उसकी आत्मा को भी मार डालो। वो अपने भाई का बुरा हाल बर्दाश्त नहीं कर सकेगी और आईजी के खिलाफ दर्ज शिकायत वापस ले ली जाएगी, रुचिका मर गई लेकिन उसने शिकायत वापस नहीं ली। वो मर गई और पीछे छोड़ गई इंसाफ की एक अधूरी लाइन। क्या आशु कभी साहस बटोर कर अपनी बहन की मौत के असली जिम्मेदार लोगों को इंसाफ दिलाने के लिए छेड़े गए इस धर्मयुद्ध में शामिल हो सकेगा। 
अब देखते हैं उस मासूम के शब्दों में उसकी पीड़ा की कहानी जो मुझे IBN 7 की वेब साईट पर उनके आर्कैव में मिला और वही में हुबहू लिख रहा हूँ, उसका लिंक भी साथ ही है. http://khabar.josh18.com/news/25318/3
ये शब्द हैं 19 साल पुराने। रुचिका का हलफनामा है - तारीख 21 अगस्त 1990। रुचिका ने ये हलफनामा सौंपा हरियाणा के तत्तकालीन डीजीपी को। रुचिका ने साफ लिखा है कि जनवरी 1990 में उसने पंचकुला लॉन टेनिस क्लब की मेंबरशिप ली थी और वो लगातार यहां खेलने जाती थी। इसी क्लब के अध्यक्ष थे आईपीएस एसपीएस राठौर। कनाडा जाने की तैयारियों की बीच जब रुचिका ने टेनिस क्लब में ये एप्लीकेशन दी कि अब वो खेलने नहीं आ पाएगी तो पहली बार राठौर की शक्ल साफ हुई। हलफनामे में रुचिका लिखती है-- राठौर ने मुझे कहा कि तुम्हें कनाडा नहीं जाना चाहिए। तुम बेहद प्रतिभावान खिलाड़ी हो और मैं तुम्हे टेनिस सिखाने के लिए अलग से कोच का भी इंतजाम कर दूंगा। ये वो वक्त था जब रुचिका एसपीएस राठौर की नजरों में चढ़ती जा रही थी। रुचिका पर अचानक मेहरबान हुए राठौर ने उसके पिता से मिलकर भी अपनी बात दोहराई। राठौर ने रुचिका के पिता से ये भी कहा अपनी बेटी को मुझसे मिलने के लिए भेजिए। रुचिका के पिता को वर्दी में छिपा शिकारी नजर नहीं आया सो 12 अगस्त 1990 को रुचिका अपनी दोस्त आराधना के साथ राठौर से मिलने टेनिस क्लब पहुंची।
जब हम वहां पहुंचे तो राठौर अपने ऑफिस के बाहर खड़े थे। हमें देखकर वो अपने ऑफिस के भीतर चले गए और हमें भी अंदर आने को कहा। मैंने उनसे कहा कि ऑफिस के बाहर ही बात करते हैं लेकिन वो भीतर चलने के बाद ही बात करने के लिए जोर डाल रहे थे। उनके कई बार कहने के बाद मैं और मेरी दोस्त ऑफिस के भीतर चले आए। वहां एक और आदमी मौजूद था। राठौर ने उससे सिर्फ एक कुर्सी लाने को कहा।
जब क्लब का वो कर्मचारी कुर्सी लेकर आया तो उसकी दोस्त आराधना कुर्सी पर बैठ गई। रुचिका खड़ी रहकर ही राठौर से बात कर रही थी। उसी वक्त राठौर ने ऐसा कुछ किया जिससे उनके इरादे जाहिर हो गए। राठौर ने कमरे में मौजूद दूसरे शख्स को दूसरी कुर्सी लाने से भी मना कर दिया। वो बाहर गया तो राठौर ने आराधना को कोच से मिलकर आने को कहा।
"क्या सीबीआई ने ये हलफनामा गौर से नहीं पढ़ा।" अगर पढ़ा होता तो ये बात तो साफ हो जाती कि आईपीएस राठौर के दिमाग में रुचिका को लेकर कोई खिचड़ी पक रही थी। वो मौके के इंतजार में थे और ये मौका सामने खड़ा था।जैसे ही आराधना कमरे से बाहर गई राठौर ने मेरा हाथ पकड़ लिया, मैंने एक झटके से अपना हाथ छुड़ा लिया। वो अपनी कुर्सी से उठे और आगे बढ़ते हुए एक बार फिर मेरा हाथ पकड़ लिया। वो मेरे और पास आ गए एक हाथ कमर पर रखते हुए मुझे अपनी ओर खींचा।एक आईपीएस अफसर, कानून का रखवाला और ये हरकत। साफ है एसपीएस राठौर को अपनी वर्दी का गुरुर था, वर्ना एक 14 साल की टेनिस खिलाड़ी को अकेले कमरे में बुलाने और उसे अपनी ओर खींचने की हिम्मत न करते। पद और रुतबे का नंगा नाच आगे भी जारी रहा।मैंने अपने हाथ से धक्का देकर राठौर को हटाने की कोशिश की...मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है...राठौर का बर्ताव देखकर मैं बुरी तरह सदमे में थी...नर्वस थी। तभी मेरी दोस्त आराधना अचानक कमरे के भीतर पहुंच गई। आराधना को देखते ही राठौर ने मुझे छोड़ दिया और कुर्सी पर वापस बैठ गए।राठौर यहीं नहीं रुके, ये देखकर कि अब तो रुचिका की दोस्त आराधना भी यहां आ गई है, उन्होंने आराधनी को फिर बाहर भेजने की कोशिश की, उसे कोच को यहां बुला कर लाने को कहा। और जब आराधना नहीं गई तो राठौर उस पर चीख पड़े। मैं कमरे से बाहर भाग गई, मैंने अपनी दोस्त आराधना को तुरंत सब कुछ कह दिया। उसने खुद देखा था कि कैसे राठौर मेरे साथ बद्तमीजी कर रहे थे। मैं डरी हुई थी...नर्वस थी...मैंने आराधना से पूछा कि हमें क्या करना चाहिए। क्या अपने पिता को बताऊं। लेकिन राठौर तब आईजी पुलिस थे...वो हमें और हमारे परिवार को परेशान कर सकते थे, इसलिए हमने किसी को इस बारे में नहीं बताने का फैसला किया।शायद रुचिका इस बात से अनजान थी कि ये चुप्पी उस आईपीएस अफसर के हौसले बढ़ाने वाली है। वो तो अब वर्दी के नशे में इतना डूब चुका था कि रोके नहीं रुकने वाला था। जिंदगी के इस मोड़ के बाद रुचिका के लिए बाकी था तो सिर्फ अंधेरा और भयानक बेबसी। ऐसे में उसकी मददगार बनी उसकी सखी, उसकी सहेली, आराधना।वो आराधना जिसने न केवल उस वक्त दोस्ती की मिसाल दी, बल्कि रुचिका की खुदकुशी के 19 साल बाद अब भी उसी दोस्ती की खातिर इस केस को लड़ती रही। रुचिका के हलफनामा में रुचिका का साहस और उसकी समझदारी भी दिखती है।14 अगस्त को फिर रुचिका अपनी दोस्त आराधना के साथ टेनिस खेलने गई। इस उम्मीद के साथ कि जो कुछ 12 अगस्त को हुए वो दोबारा नहीं होगा। हलफनामे में रुचिका ने लिखा कि वो जानबूझ कर ऐसे टाइम पर गई कि उसका सामना राठौर से ना हो। लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंजूर था।हम दोनों खेलने के बाद घर वापस जा रहे थे कि टेनिस क्लब का एक कर्मचारी आया और उसने मुझसे कहा कि आईपीएस राठौर तुम्हें अपने दफ्तर में बुला रहे हैं।रुचिका समझ चुकी थी कि हमारे देश में एक आईपीएस अफसर कितना ताकतवर हो सकता है। वो लड़की को छेड़ने के दो दिन बाद उसे दोबारा अपने कमरे में बुलाने की हिम्मत रख सकता है। क्योंकि उसे शायद ये पता था कि उसकी वर्दी के आगे सब के सब बौने हैं। यहीं रुचिका ने फैसला किया कि वो अब चुप नहीं रहेगी। बिन मां की ये बच्ची एक मां का आंचल तलाश रही थी।मैं आराधना के घर गई और पूरी बात उसकी मां को बताई। मेरी मां नहीं थी इसलिए खुद पर जो गुजरी वो आराधना की मां को बताते-बताते मैं बुरी तरह रोने लगी थी।
ये एक 14 साल की लड़की की तकलीफ है वो लड़की जो आज हमारे बीच में नहीं है, क्योंकि उसने देखा कि ये हलफनामा भेजने के बावजूद पुलिस ने कभी इस आईपीएस अफसर को गिरफ्तार नहीं किया, उल्टे उसका तो प्रमोशन होता गया। उसने देखा कि उसके अपने भाई के माथे पर कार चोरी के 11 केस थोप दिए गए, उसने देखा कि कैसे आईपीएस के खिलाफ बोलने पर उसके पापा की बैंक की नौकरी चली गई, उसने देखा कि कैसे नेताओं ने इस आईपीएस को सजा का कोड़ा मारने के बजाय ईनाम दिए। और इसी के बाद रुचिका ने खुदकुशी कर ली। और जाते जाते वो मार गई इस केस का कत्ल करने वाले हर नेता, हर पुलिसवाले, हर अफसरशाह के मुंह पर तमाचा।

मालूम हो कि इस कांड की शुरुआत में राठौर सिर्फ डीआईजी था। लेकिन सियासी गलियारे में उसकी पैठ इतनी मजबूत थी कि उसने अपने खिलाफ हो रही जांच का ही गला घोंट दिया। जांच करने वाले और एफआईआर की सिफारिश करने वाले डीजीपी को भी धमकियां देता रहा।जाहिर है रुचिका का कातिल कोई एक नहीं था। उस मासूम बच्ची को मारने में तमाम हाथ शामिल हैं। रुचिका के खून से उन सबके हाथ रंगे हैं जिन्होने उसे बचाने की कोशिश नहीं की।






Tuesday, December 15, 2009

कोपेनहेगन के कोपभाजन

डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में जलवायु परिवर्तन पर बहुप्रतीक्षित शिखर बैठक शुरु हो चूकी  है. इसमें 192 देशों के प्रतिनिधि शामिल  हैं, इस उम्मीद के साथ कि ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती पर कोई ठोस सहमति बन सके.कुछ विश्लेषक तो इसे दुनिया में अब तक की सबसे अहम बैठक बता रहे हैं. ७ दिसम्बर से  कोपेनहेगेन पर दुनिया की निगाहें टिकी हैं . इस दौरान सौ से ज़्यादा देशों के राष्ट्राध्यक्ष और लगभग 15 हज़ार प्रतिनिधि जलवायु परिवर्तन की चुनौती पर गहन विचार-विमर्श कर रहे हैं .शिखर बैठक की पूर्व संध्या पर संयुक्त राष्ट्र  के मुख्य वार्ताकार वो डे बोए ने कहा कि बातचीत से पहले जो भूमिका तैयार की गई है, उसे देखते हुए काफी उम्मीद है.
उन्होंने बीबीसी से कहा था  कि अब बहुत सारे देश स्वेच्छा से कार्बन उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य तय कर रहे हैं.उनका कहना था, "पिछले 17 वर्षों में जलवायु परिवर्तन पर इतने सारे देश कभी एक साथ नहीं आए और न ही उत्सर्जन कटौती का लक्ष्य निर्धारित किया."उन्होंने कहा कि ग़रीब देशों को ग्रीन टेक्नोलॉजी देने के प्रस्ताव भी दिए जा रहे हैं और इन सबसे उम्मीद बंधी है कि वर्ष 2050 तक कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए कोई लक्ष्य निर्धारण हो जाएगा.पहली बार अमरीका ने भी उत्सर्जन में कटौती के संकेत दिए हैं. 
चीन  जैसा देश भी कार्बन इंटेनसिटी में 20 से 25 फ़ीसदी कटौती की बात कर रहा है. कोपेनहेगेन सम्मलेन से ठीक पहले भारत ने इस बात का ऐलान कर दिया कि वह स्वयं ही २०२० तक २०/२५ % कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए तैयार है। साथ ही भारत ने इस बात पर कड़ा ऐतराज़ किया है कि इसके लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं होनी चाहिए। जब भारत स्वयं ही इस बात के लिए तैयार है तो अब बारी विकसित देशों की भी बनती है क्योंकि कार्बन उत्सर्जन के लिए वही अधिक उत्तरदायी हैं। भारत की इस बात का चीन ने भी समर्थन किया है जिससे पता चलता है कि भारत का प्रस्ताव वास्तविकता पर आधारित है केवल बयान बाज़ी तक सीमित नहीं है। भारत ने वहां उत्सर्जन पर भी कड़े कानून लागू करने पर ध्यान देने की बात कही है। आज सारी दुनिया में दिल्ली जैसा कोई भी बड़ा शहर नहीं है जहाँ की सार्वजानिक परिवहन सेवा पूरी तरह से पर्यावरण को ध्यान में रख कर बनाई गई हो। भारत ने और खास तौर पर दिल्ली ने यह कई साल पहले ही करके दिखा दिया था कि जहाँ ईमानदारी से प्रयास किया जाए वहां सब कुछ किया जा सकता है.


कोपेनहेगेन- लक्ष्य और मुद्दे

कोपेनहेगेन सम्मेलन का औपचारिक नाम है- यूएनएफसीसीसी में शामिल पक्षों का 15वां सम्मेलन, या संक्षेप में- कॉप15। कोपेनहेगेन में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में जिन सवालों पर विचार किया जाएगा, उनमें प्रमुख हैं-

* क्योटो जलवायु संधि के बाद की संधि पर सहमति बनाना।
* धनी देशों के कार्बन उत्सर्जन में कटौती के बाध्यकारी लक्ष्य।
* विकासशील देशों से उनके उत्सर्जन को धीमा करने की अपेक्षा।
* जलवायु परिवर्तन बचने के उपायों के लिए गरीब देशों की मदद।

कोपेनहेगन में जबकि दुनियाभर के लगभग सभी देश इकट्ठा हो चुके  हैं. हमारे अखबार हमें बता रहे हैं कि कोपेनहेगन में कुछ देशों को कोपभाजन का शिकार होना पड़ सकता है. अखबारों की सदिच्छा और इच्छा अपनी जगह लेकिन कोपेनहेगन में वे देश शेष देशों के कोपभाजन बनेंगे जिन्हें सचमुच बनना चाहिए, ऐसा लगता नहीं है. दुनिया में पर्यावरण के पहले के सम्मेलनों में अगर कभी कुछ ऐसा हुआ होता तो हमें उम्मीद भी बंधती कि दादा देश कोपभाजन का शिकार होंगे और दुनिया का दर्शन बदल जाएगा. लेकिन ऐसा है नहीं. दुनिया के दादा देशों का स्वभाव ऐसा है कि वे अपने कोपभाजन का शिकार शेष विश्व को बनाते हैं. बिना किसी शक के आज हम इस तरह की कार्यशैली के लिए अमेरिका को अगुआ मान सकते हैं. चीन नया नया इस जमात में शामिल हो रहा है और भारत भी दरवाजे पर दस्तक देने के लिए आतुर है. भारत का पक्ष रखते हुए लोकसभा में  पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि भारत किसी दबाव में आकर कोई समझौता नहीं करने जा रहा है जो कुछ भी किया जाएगा बराबरी पर ही होगा। अलग अलग देशों के लिए अलग अलग शर्तों पर काम नहीं किया जा सकता है। देश में मौजूदा वन क्षेत्र को संरक्षित रखा जाएगा और इसको बढ़ाने का भी काम किया जाएगा। भविष्य में कोयले पर आधारित सभी बिजलीघर ५० % प्रदूषण रहित कोयले पर आधारित होंगें। भारत इस मामले में गंभीर है और वह किसी तरह के दबाव में नहीं आने वाला है। यह सही है कि भारत सरकार ने सम्मलेन के पहले ही दुनिया को यह बता दिया है कि क्या सही है और क्या ग़लत ? अब तीसरी दुनिया के विकास शील देशों को यह तय करना है कि किस तरह से एक समान समझौते पर कार्य किया जाए जिससे इन देशों के हितों पर चोट न होने पाए। फिलहाल भारत की तयारी से विकसित देशों को झटका लगने वाला है क्योंकि वे इस सम्मलेन में कुछ शर्तें अन्य देशों पर थोपने की तैयारी किए बैठे थे। अब समय आ गया है कि सारी दुनिया मिलकर एक सही दिशा में काम करे न कि जो कुछ केवल उनके हित में हो। कार्बन उत्सर्जन में ये विकसित देश सबसे आगे हैं और कटौती करने के नाम पर ये अपनी शर्तें विकास शील देशों पर थोपना चाहते हैं। अब ये सारे देश मिलजुलकर पर्यावरण की चिंता करने के लिए कोपेनहेगन में इकट्ठा हो रहे हैं. लेकिन इस इकट्ठा होने का क्या वास्तव में कोई अर्थ है? अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्था डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार  कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन के मसले पर जारी संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में किसी समझौते की दिशा में प्रगति न हो पाने के लिए धनी देश भारत और चीन को दोषी ठहरा रहे हैं, जबकि इसके लिए सिर्फ उन्हीं को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए. डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की जलवायु नीति के प्रमुख किम कार्सटेंसन ने कहा, "धनी देशों में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने की इच्छा का अभाव विनाशकारी है।"यह पूछने पर कि क्या वे देशों के इस पक्ष से सहमत हैं कि भारत और चीन मौजूदा सत्र में बाधक बन रहे हैं, कार्सटेंसन ने इससे असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि इन देशों को याद रखना चाहिए कम-से-कम उन दोनों ने अपनी प्रतिबद्धताएं व्यक्त कर दी हैं, जैसा कि धनी देशों ने अब तक नहीं किया है। इस गूढ़  अर्थ को समझने के लिए दुनिया में पर्यावरण पर चल रही बहस के विषय बिन्दु देखना होगा. आज दुनिया में तीन तरह से पर्यावरण पर बात हो रही है. सबसे पहले पर्यावरण के नाम पर विज्ञान पर बहस हो रही है. दुनिया में जहां कहीं भी पर्यावरण की समस्या है वहां विज्ञान पर व्यापक बहस भी साथ में ही मौजूद है. आज जिसे क्लाइमेट चेंज कहा जा रहा है उस क्लाइमेट चेंज की बहस में भी सर्वाधिक बहस विज्ञान पर ही है. विज्ञान ने औद्योगीकरण को जो टेक्नालाजी दी है उसने विकासवादी व्यक्ति को औंधे मुंह गिरा दिया है. इसलिए चर्चा का सबसे अहम बिन्दु यही है कि इस टेक्नालाजी को कैसे पटखनी दी जाए. जिन्होने इस तकनीकि को आकार दिया वे कह रहे हैं इसे ग्रीन कर दिया जाए. ग्रीन टेक्नालाजी से औद्योगीकरण का शैतान देवदूत में परिवर्तित हो जाएगा और इक्कीसवीं सदी में पर्यावरण की समस्त समस्याओं का निदान हो जाएगा. 


निदान के लिए जिस समाधान को सुझाया जा रहा है उसे दुनिया के कुछ विकसित देश माने और विकसित होते देश उस पर चलने का वादा करें इसके लिए दूसरे क्रम में राजनीतिक सक्रियता है. पर्यावरण की राजनीति में यह तय किया जा रहा है कि कौन सा प्लेयर क्या करेगा. इस राजनीति में कार्बन रूपी ब्रह्मास्र चलाया जा रहा है. अभी चीन और उसके बाद भारत ने कहा है कि वह कार्बन उत्सर्जन को कम करेगें. इसे चीन और भारत की सदिच्छा मानना चाहिए कि वे भी दुनिया के पर्यावरण को लेकर उतने ही चिंतित नजर आ रहे हैं जितने अमेरिका या यूरोप के देश. लेकिन इस सदिच्छा के संदर्भ उतने व्यापक और गहरे नहीं है जितने कि होने चाहिए. कार्बन उत्सर्जन की बहस के बीच विकास को बलिदान करने की तथाकथित तैयारी एक तरह से दुनिया के दादा देशों पर किया जा रहा अहसान नजर आता है जो दुर्भाग्य से उनसे सरोकार नहीं रखता है जिनसे रखना चाहिए. पर्यावरण के नाम पर जो राजनीति हो रही है उसका भी आदि अंत विज्ञान के इर्द गिर्द सिमटा हुआ है. इसलिए इस तरह की राजनीति से पर्यावरण बचाने में कोई मदद मिलेगी, निर्णय कर पाना मुश्किल है. 
कोपेनहेगेन सम्मेलन में लीक हुए दस्तावेज़ों से यह बात सामने आई है कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर किसी संभावित समझौते के मामले में अमीर और विकासशील देशों के बीच गहरा मतभेद है. ग़ौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सम्मलेन के दूसरे दिन ही मेज़बान देश डेनमार्क का मसौदा लीक हो गया था. यह मसौदा अमीर देशों की ओर से तैयार किया गया है. पर्यावरणविदों के मुताबिक़ यह मसौदा अमीर देशों के प्रति बहुत नरम है. साथ ही इसमें विकासशील देशों को प्रयाप्त धन देने का भी सुझाव नहीं है ताकि वे बढ़ते तापमान का मुकाबला करने के उपाय लागू कर सकने में सक्षम हो सकें.फ्रेंड्स ऑफ़ अर्थ के कार्यकारी निदेशक एंडी एटकिन्स का कहना है कि यह मसौदा पहली नज़र में बहुत अच्छा दिखता है, पर है बहुत ख़तरनाक. उनका कहना है कि अमीर देश ग़रीब मुल्कों को धन देंगे ताकि वे अपना कार्बन उत्सर्जन कम कर सकें लेकिन वे ख़ुद इसे करने की बात नहीं कर रहे. जबकि वैज्ञानिक तरीके से देखें तो उन्हें खुद भी ऐसा करना चाहिए. विकसित देशों के अड़ियल रवैये के कारण कोपेनहेगेन क्लाइमेट चेंज समिट में किसी तरह के वैश्विक समझौते की उम्मीदें टूटती नजर आ रही हैं . क्योटो प्रोटोकॉल में तय सिद्दांतों को भविष्य में कार्बन उत्सर्जन रोकने की योजना में शामिल करने का विरोध कर रहे आस्ट्रेलिया से नाराज अफ्रीकी देशों के समूह ने शुरुआती चरण की बैठक का बहिष्कार कर दिया.उसके इस रुख को भारत और चीन ने भी समर्थन दे दिया। अफ्रीकी मुल्क आस्ट्रेलिया के इस प्रस्ताव से नाराज थे कि कार्बन उत्सजर्न व ग्लोबल वार्मिंग रोकने के लिए दीर्घकालीन योजना को नए सिरे से तेयार किया जाए और इसमें क्योटो प्रोटोकॉल की बात ही न हो। कोपेनहेगेन सम्मिट का सबसे महत्वपूर्ण चरण सोमवार से शुरू हुआ। इसकी शुरुआत में ही बड़ा झटका लग गया। जलवायु बदलाव की अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि विकसित और विकासशील देशों के बीच का यह डेडलॉक सम्मिट को फेल करने का अहम कारण बन सकता है। हालाँकि अभी कोशिशें की जा रही हैं कि इस मसले पर एक राय बनाने की कोशिश की जाए. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की निदेशक और पर्यावरण राजनीति की विशेषज्ञ सुनीता नारायण के मुताबिक दुनिया को जलवायु बदलाव के खतरों से बचाने के नजरिए से अंतरराष्ट्रीय एकजुटता के लिए यह बड़ा झटका है। इसकी पूरी जिम्मेदारी विकसित देशों की है जो है जो यह समझने की कोशिश ही नहीं कर रहे कि उन्हें भविष्य में अपने कार्बन उत्सर्जन की दर को घोषित करना चाहिए। यह घोषणा बाध्यकारी होनी चाहिए ताकि बाद में वह मुकर न सकें। इसके लिए क्योटो प्रोटोकॉल को ध्यान में रखकर ही बातचीत हो सकती है और विकसित देश इसे न मानने पर अड़े हुए हैं. 


जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर शुरू हो रही कोपेनहेगेन बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी १७ दिसम्बर को  हिस्सा लेगें.प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कोपेनहेगेन सम्मेलन में हिस्सा लेना का फ़ैसला अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और फ्रांस के राष्ट्रपति निकोला सार्कोज़ी के आग्रह के बाद आया है.पिछले हफ़्ते मनमोहन सिंह से मुलाक़ात के दौरान राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उनसे सम्मेलन में हिस्सा लेने का आग्रह किया था.उसके बाद पोर्ट ऑफ़ स्पेन में मुलाकात के दौरान निकोला सार्कोज़ी ने भी मनमोहन सिंह से अनुरोध किया था कि वो कोपेनहेगेन बैठक में हिस्सा लें. इधर माकपा नेता सीताराम येचुरी ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कोपेनहेगेन जाने का फैसला व्हाइट हाउस के बयान के जवाब में किया गया है तो यह देश के लिए अच्छा नहीं है। कोपेनहेगेन में जलवायु परिवर्तन पर होने वाले शिखर सम्मेलन में जा रहे संसदीय प्रतिनिधिमंडल में येचुरी भी शामिल हैं। उन्होंने व्हाइट हाउस के उस बयान का हवाला दिया, जिसमें दावा किया गया है कि भारत और चीन के शीर्ष नेताओं की अमेरिकी राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद दोनों ही देशों ने पहली बार कार्बन उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य तय किये हैं।माकपा नेता ने कहा कि इसका मतलब दबाव और भारत के रूख में नरमी के रूप में निकलता है। हमें उम्मीद है कि सरकार प्रधानमंत्री द्वारा संसद में व्यक्त प्रतिबद्धताओं के अनुरूप काम करेगी। इन प्रतिबद्धताओं में किसी तरह की नरमी हमें स्वीकार्य नहीं है।' व्हाइट हाउस के बयान में कहा गया कि राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत और चीन के शीर्ष नेताओं के साथ हुई द्विपक्षीय बैठकों और अमेरिका द्वारा उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य घोषित करने के बाद भारत और चीन ने पहली बार कार्बन तीव्रता कम करने के लक्ष्य तय किये हैं। पिछले हफ्ते बहुचर्चित फिल्म २०१२ में देखा था की  कि हमारी पृथ्वी अचानक सूर्य की धधक से नष्ट हो जाती है. इस धधक से पृथ्वी का केंद्र अत्यंत गरम हो जाता है, जिससे पृथ्वी की भीतरी परतों में भारी उथलपुथल मचती है. इसके परिणामस्वरूप प्रलय आ जाती है. सूनामी, भूकंप और ज्‍वालामुखी से पृथ्वी पर समूचा जीवन नष्ट हो जाता है, सिर्फ थोड़े-से आधुनिक जलस्त्रोतों को छोड़कर, जिन्हें जी-8 देशों ने कुछ थोड़े से लोगों को बचाने के लिए तैयार किया है. यह स्तब्ध कर देने वाला कथानक है. पहले ही विश्व इस दबाव को महसूस कर रहा है-पिछले दशक की गर्मियां अब तक सबसे ज्‍यादा तीखी रही हैं. भीषण चक्रवात और तूफान आए, विनाशकारी अकाल पड़े और बरसातें हुईं, समुद्र की सतह खतरनाक रूप से चढ़ गई और तमाम देशों में खेती नष्ट हुई. दूर की छोड़ दें तो भारत में ही इस साल गर्मियों में सूखा पड़ा, मुंबई में असामान्य बारिश हुई और नरगिस चक्रवात ने म्यांमार को भारी क्षति पहुंचाई. यह सब जलवायु परिवर्तन का ही नतीजा है. खतरा सिर्फ जानो-माल को ही नहीं है, बल्कि समाज को भी है, क्योंकि तब असफल देशों की संख्या बढ़ने से आतंकवाद, नशीली दवाओं, हथियारों की तस्करी और विस्थापन में भी इजाफा होगा, जिससे दुनिया और भी असुरक्षित हो जाएगी.

लेकिन कोपेनहेगेन के बेल्ला सेंटर में जलवायु परिवर्तन पर चल रहे शिखर सम्मेलन में आसन्न संकट पर बातचीत के लिए जुटे 192 देशों के रुख से नहीं लगता कि वे पृथ्वी पर खतरे को लेकर कतई चिंतित हैं. सम्मेलन के शुरू में सम्मेलन के अध्यक्ष कोनी हेडेगार्ड ने यह कह कर कुछ उत्साह जगाने की कोशिश की कि  ''इतिहास में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जब विश्व अलग-अलग रास्ते जाने का चुनाव कर सकता है. यह ऐसा निर्णायक क्षण है. हम हरित समृद्धि और सुरक्षित भविष्य की ओर जाने का रास्ता चुन सकते हैं, या गतिरोध वाला रास्ता जिस पर हम जलवायु परिवर्तन के बारे में कुछ भी न करें और उसका खामियाजा हमारी संतानों और उनके बाद वाली संतानों को भरना पड़े. जाहिर है, चुनाव करना कतई कठिन नहीं है.'' 
दुख है कि ऐसी बातें कोई भी गंभीरता से सुनने को तैयार नहीं लगता. कोपेनहेगेन तीन वर्षों से चल रही बातचीत का चरमोत्कर्ष था, जहां से पृथ्वी को बचाने की रूपरेखा निकलनी चाहिए थी. लेकिन हेडेगार्ड और अन्य नेता अब शर्म के साथ इसे ''प्रक्रिया की शुरुआत, न कि अंत'' बता रहे हैं. 192 देशों के नेता 18 दिसंबर को अचानक कोई सामूहिक फैसला न कर लें तो यह सम्मेलन एक राजनैतिक समझैते के रूप में समाप्त होने वाला है जिसमें सिर्फ वे सदिच्छा जाहिर करेंगे, न कि कोई लागू होने वाला कदम उठाएंगे. संक्षेप में, यह सम्मेलन एक गर्मागर्म बहस भर रह जाएगा. इस बीच अमेरिका में यह सम्मेलन पहले ही देर रात के प्रहसनों में मजाक का विषय बन गया है. एनबीसी पर जिमी फैलॉन ने अपने दर्शकों से पूछा, ''क्या आप लोग कोपेनहेगेन में यूएन के पर्यावरण परिवर्तन सम्मेलन को लेकर रोमांचित हैं? हां, यह आज शुरू हो रहा है, राष्ट्रपति ओबामा ने कहा है कि अमेरिका 2020 तक कार्बन उत्सर्जन 17 प्रतिशत तक कम कर सकता है. वे शायद कह सकते हैं कि जाहिर है, तब तक मैं इस पद पर नहीं रंगा. इसलिए मैं कोई भी वादा कर सकता हूं. 2020 तक हर आदमी, औरत और बच्चे के लिए एक मुफ्त एक्सबॉक्स, हर छैला के लिए एक मेगन फॉक्स क्लोन होगा. यह मेरी समस्या नहीं होगी, तब राष्ट्रपति टिंबरलेक की समस्या होगी.'' जे लेनो ने मजाक किया, ''वे कहते हैं, गरमी ऐसे बढ़ती रही तो 2015 तक हिलेरी क्लिंटन पसीज सकती हैं.''

कोपेनहेगेन सम्मेलन कई तरह से अपनी शुरुआत से ही असफल होने वाला था. यह ऐसा सम्मेलन होने वाला था जिसमें क्योटो प्रोटोकॉल के तथाकथित एनेक्स-1 के औद्योगिक देशों को अपने जीएचजी उत्सर्जन में कानूनी रूप से अधिक कटौती का वचन देना था. उन्हें प्रतिबद्धता की दूसरी अवधि को पूरा करना था जो 2012 से 2016 तक होनी थी. यह और बात है कि प्रोटोकॉल के तहत अधिकांश देश 2005 से 2012 तक की प्रतिबद्धता की पहली अवधि के लक्ष्यों को पूरा करने में असफल रहे हैं. इस अवधि में उन्हें अपने जीएचजी उत्सर्जन में 1990 के स्तर से औसत 5 प्रतिशत तक कटौती करनी थी. लेकिन 1992 में रियो के पृथ्वी सम्मेलन में यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसी) पर हस्ताक्षर के बाद से विश्व जीएचजी उत्सर्जन स्तर 30 प्रतिशत तक बढ़ गया है.

आइपीसीसी कह चुका है कि अगर वैश्विक तापमान को दो अतिरिक्त सेंटीग्रेड के खतरे के बिंदु से आगे बढ़ने से रोकना है तो औद्योगिक देशों को 2020 तक अपने जीएचजी स्तर में 1990 के स्तर से 25 से 40 प्रतिशत के बीच कटौती करनी होगी. अमेरिका समेत अधिकांश देश मुश्किल से 5 से 17 फीसदी की कटौती करना चाहते हैं. भारत की ओर से बातचीत करने वाले चंद्रशेखर दासगुप्ता इसे ''दुखद'' बताते हैं. अमेरिका, जो पृथ्वी का शत्रु नंबर एक है, क्योटो प्रोटोकॉल का वर्षों से अनुमोदन करने से इनकार करने के बाद राजी हुआ कि वह अपने कार्बन उत्सर्जन में 2005 के स्तर से 17 प्रतिशत तक कटौती करेगा. अगर आप उसे प्रोटोकॉल के कटऑफ वर्ष 1990 के अनुसार देखें तो यह कटौती मात्र 4 प्रतिशत ही बैठती है, जबकि यह इसकी तिगुनी होनी चाहिए थी.

गरीब देशों पर जलवायु परिवर्तन का असर पड़ने से अमीर देशों को उन्हें भारी मुआवजा देना था ताकि वे विपरीत स्थिति का सामना कर सकें. यूएनएफसीसीसी के मुताबिक, विकासशील देशों को इससे होने वाली क्षति की भरपाई के लिए विकसित देशों को उन्हें प्रतिवर्ष 400 अरब डॉलर मुहैया कराने होंगे. लेकिन अब तक सबसे अधिक 100 अरब डॉलर के मुआवजे के भुगतान की बात ब्रिटिश प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने की थी. यह आंकड़ा भी घट गया है और विकसित देश सिर्फ 40 अरब डॉलर देना चाहते हैं और वह भी केवल सबसे कम विकासशील देशों के लिए. औद्योगिक देशों को स्वच्छ प्रौद्योगिकी भी देनी थी ताकि विकासशील देश अपने यहां उत्सर्जन घटा सकें. लेकिन इन देशों ने बौद्धिक संपदा अधिकार का मुद्दा उठाया है और अब प्रौद्योगिकी ज्ञान की जगह सिर्फ सूचनाओं के आदान-प्रदान पर बात हो रही है.

तो अमेरिका, जहां प्रति व्यक्ति जीएचजी उत्सर्जन औसत भारतीय के मुकाबले 18 गुना है, शर्तें मानने से इनकार क्यों कर रहा है जबकि राष्ट्रपति अमेरिकी रीति-नीति बदलने की बात कह चुके हैं? इसका सीधा-सा जवाब हैः वहां कई बड़ी-बड़ी लॉबियां हैं जो यथास्थिति बनाए रखने के लिए प्रतिवर्ष 30 करोड़ डॉलर खर्च कर रही हैं. इनमें कोयला लॉबी शामिल है जिसकी पैठ 50 में से 22 राज्‍यों में है. फिर तेल लॉबी है, जॉर्ज बुश जिसके करीबी थे. ये लॉबियां ऑटोमोबाइल और हाइवे लॉबी के अतिरिक्त हैं. इसलिए भले ही ओबामा ने 2020 तक कार्बन उत्सर्जन में 17 फीसदी तक कटौती का वादा कर दिया है लेकिन उन्हें ऐसा करने में सीनेट में भारी मुश्किलों का सामना करना होगा. आश्चर्य नहीं कि क्योटो प्रोटोकॉल में अमेरिका की ओर से बातचीत करने वाले तत्कालीन उप-राष्ट्रपति अल गोर को सीनेट ने 95-0 से नकार दिया था-जिसके बाद अमेरिका के बारे में तमाम असुविधाजनक सचाइयां उजागर हो गई थीं. अमेरिका का मुख्य तर्क है कि क्योटो ने दुनिया में सबसे ज्‍यादा जीएचजी का उत्सर्जन करने वाले दो देशों चीन और भारत को शामिल नहीं किया. चीन एक विसंगति है क्योंकि इसने जीएचजी उत्सर्जन के मामले में अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया है और आर्थिक प्रगति के साथ विकासशील देशों की कक्षा से तेजी से बाहर आ रहा है. चीन जानता है कि जीएचजी उत्सर्जन पर लगाम लगाने या हरित प्रौद्योगिकी लाने में उसे करीब एक दशक लगेगा. तब उत्सर्जन कम करने पर उसके विकास पर कोई असर नहीं पड़ेगा. इसलिए अभी हाल तक वह बिना किसी बंदिश के, स्वेच्छा से भी कटौती करने से इनकार कर रहा था. लेकिन पिछले महीने राष्ट्रपति हु जिंताओ ने घोषणा की कि चीन अपने यहां कार्बन उत्सर्जन में 40 फीसदी की कटौती करेगा. यह मात्रा भी विकसित देशों से की जा रही अपेक्षा की तुलना में कुछ भी नहीं है, क्योंकि उनसे पूरा का पूरा उत्सर्जन खत्म करने की उम्मीद की जाती है, जबकि उत्सर्जन का संबंध जीडीपी में प्रत्येक डॉलर जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा से जुड़ा है. वास्तविक अर्थों में चीन के उत्सर्जन स्तर में कमी नहीं आएगी-सिर्फ गति धीमी होगी.

अमेरिकी अड़ियलपन किसी वायरस की तरह यूरोप में भी फैल गया है. अब यूरोप भी भारी कटौती के अपने वादे से पीछे हटने लगा है, जो उन्होंने शुरू में किया था. एक समय यूरोप 2050 तक अपने यहां जीएचजी उत्सर्जन में 50 फीसदी की कटौती की बात कर रहा था. लेकिन यूरोप उत्सर्जन में कटौती करके अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी अमेरिका के मुकाबले औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में पीछे नहीं रहना चाहता. कटौती से उत्पादन लागत बढ़ेगी. परंपरागत ईंधन के मुकाबले पुनःप्रयोग में आने वाली ऊर्जा महंगी पड़ती है. कुछ समय के लिए जब तेल की कीमतें प्रति बैरल 160 डॉलर पर थीं तो वैकल्पिक ऊर्जा आशाजनक लगने लगी थी. लेकिन तेल की कीमतें प्रति बैरल 70 डॉलर पर आने के बाद ये आशाएं धूमिल पड़ गईं.

जलवायु परिवर्तन पर वार्ता को अगर किसी एक बात ने सबसे ज्‍यादा झटका दिया तो वह है आर्थिक मंदी. रोजगार सुरक्षा पहली प्राथमिकता बन गई है. विकसित देश जब बेरोजगारी की दर कम करने की कोशिश कर रहे हैं, वे जीवन शैली में कोई बदलाव या अर्थव्यवस्था में हेरफेर नहीं चाहेंगे. इसलिए पिछले दो वर्षों से वे आपस में मिलकर क्योटो प्रोटोकॉल को निष्फल करने की साजिश में जुट गए हैं. अमीर देशों का एक गुट बनाते हुए ऑस्ट्रेलिया, जो प्रति व्यक्ति जीएचजी उत्सर्जन में सबसे आगे है, वर्षों तक प्रोटोकॉल में शामिल होने से इनकार करता रहा है. जब वहां केविन रड प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने अंततः उसका समर्थन किया लेकिन उसके बाद से ऑस्ट्रेलिया प्रोटोकॉल के सिद्धांतों को नष्ट करने में लगा रहा है.

कोपेनहेगेन से पहले ऑस्ट्रेलिया ने एक प्रस्ताव रखा था, जिसमें प्रतिबद्धता की बात आने पर विकसित और विकासशील देशों के बीच अंतर को बिगाड़ने की कोशिश की गई थी. क्योटो प्रोटोकॉल में माना गया था कि औद्योगिक देशों पर ऐतिहासिक जिम्मेदारी है क्योंकि उन्होंने पिछली दो सदियों में वातावरण में टनों जीएचजी का उत्सर्जन किया है. इन देशों को न सिर्फ उत्सर्जन में कटौती करनी होगी बल्कि विकासशील देशों की आर्थिक मदद करनी होगी. चीन और भारत समेत जी-77 देशों ने पाया कि यह प्रस्ताव पूरे प्रोटोकॉल को ही पलट देने का प्रयास है ताकि इस पर नए सिरे से बातचीत हो. उन्होंने तुरंत इसे खारिज कर दिया.

इस बीच अमीर देशों ने ज्‍यादा जरूरतमंद देशों को वित्तीय मदद देने का प्रस्ताव देकर जी-77 देशों में फूट डालने की कोशिश की, खासकर मालदीव जैसे द्वीपीय देशों को, जो खतरे में हैं. चीन और भारत को, जो स्वच्छ विकास व्यवस्था के तहत भारी रकम पा चुके हैं, चुप रखने के लिए उन्होंने कहा कि जंगलों को बचाने के लिए और मुआवजा दिया जाएगा. इस प्रकार वन कटाई और विनाश से उत्सर्जन में कमी के लिए एक कोष जारी किया गया जो ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे देशों को अपने जंगलों को बचाने में मदद करेगा. विकासशील देशों का रुख नरम रखने में असफल होने के बाद विकसित देश अब एक डेनिश प्रस्ताव पर जोर दे रहे हैं जो कोपेनहेगेन से निकलने वाला एक राजनैतिक समझैता होगा. 'प्लेज ऐंड रिव्यू' नाम के इस प्रस्ताव को जी-77 और चीन पहले ही क्योटो प्रोटोकॉल के मुख्य प्रावधानों को नष्ट करने के प्रयास के तौर पर देख रहे हैं. कोपेनहेगेन में कोई वाजिब समझैता नहीं होता है तो नेताओं को दुनिया भर में आम जनता के गुस्से का सामना करना पड़ेगा. खासकर औद्योगिक देशों में, जिन्हें अपने स्वार्थ के कारण पृथ्वी के दुश्मन के तौर पर देखा जा रहा है. फिल्म 2012 कहीं हमारी आशंका से पहले न सच बन जाए. कृपया लिंक देखे 
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किन्तु विडम्बना तो यह है की पर्यावरण की बात करते समय जिस एक विषय पर बिल्कुल ही बात नहीं हो रही है वह है- पर्यावरण का दर्शन. पर्यावरण का दर्शन अर्थात मनुष्य के जीवन का दर्शन. विज्ञान के प्रभाव में धीरे धीरे मनुष्य ने पर्यावरण के दर्शन से अपना जीवन दर्शन अलग कर लिया है और विज्ञान के साथ मिलकर जीवन का अनोखा दर्शन विकसित कर लिया है. या तो हम समझना नहीं चाहते या वाकई हमें समझ में नहीं आता कि वर्तमान पर्यावरण की समस्या का मूल कारण इसके विज्ञानमय दर्शन में ही निहित है. जैसा कि आज हो रहा है सारी बहस सिर्फ विज्ञान पर आकर सिमट गयी है. क्या इससे कोई रास्ता निकलेगा? हमें, आपको और उनको भी यह समझना होगा कि विज्ञानमय दर्शन और औद्योगीकरण की यूरोपीय अवधारणा इस समस्या के मूल में है. आज जिसे विकास कहा जा रहा है वह समस्या के मूल में है. कुछ समय पहले पश्चिम ने ही नारा दिया था कि बिना विनाश के विकास. लेकिन जल्द ही उनको लगा कि विनाश न करने की बात करके भी विकास के दौरान विनाश को रोक पाना मुश्किल है. तो फिर उन्होंने नारा दिया है सतत विकास. मैं कहता हूं, विकास को सस्टेनेबल बनाने की बजाय दिमाग को सस्टेनेबल बनाओ. दस-पचास साल की योजना बनाने की बजाय हजार साल की योजना बनाओ क्योंकि हजार साल बाद भी धरती पर हमारी संताने तो रहेंगी ही. अगर उनके लिए आप धरती को सुरक्षित छोड़ना चाहते हैं तो अपने दर्शन में बदलाव करना ही होगा.लेकिन जब दर्शन में बदलाव की बात होती है तो कोई इस पर बात नहीं करना चाहता. कोपेनहेगन में भी यही होगा. विज्ञान पर राजनीति होगी और सब लोग विदा हो जाएंगे. उर्जा के जिन विकल्पों को साफ सुथरा बताया जा रहा है उस पर आगे बढ़ने की बात होगी जिसमें परमाणु तकनीकि से बिजली पैदा करने की वकालत होगी. विज्ञान की समस्या को विज्ञान के समाधान से समझने समझाने की कोशिश होगी. इसलिए कोपेनहेगन के कोपभाजन का शिकार वे तो कतई नहीं होंगे जो इसके विनाश के लिए जिम्मेदार हैं. यह थोड़ा असहज है लेकिन सच्चाई यही है कि कोपेनहेगन के कोपभाजन का शिकार एक बार फिर पर्यावरण ही बनाया जाएगा लेकिन ऐसा होगा पर्यावरण बचाने के नाम पर. हालाँकि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा है कि उनका देश ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को सीमित करने संबंधी करार पर दस्तखत करने को तैयार है, बशर्ते इससे प़डने वाले आर्थिक बोझ को सभी समान रूप से उठाने के लिए तैयार हों. पूर्व में भी यही सब चलता रहा है. एक  बानगी भर देखें :
रियो सम्मेलन- 1992

ब्राजील में हुए रियो-पृथ्वी-सम्मेलन में पर्यावरण की रक्षा के लिए एक संधि पर सहमति बनी जिसे "यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेन्शन ऑन क्लाइमेट चेंज" या यूएनएफसीसीसी कहते हैं। रियो में सहमति बनी थी कि ग्लोबल वामिंüग के लिए जिम्मेदार गैसों की मात्रा इस हद तक सीमित की जाए कि जलवायु परिवर्तन मानव नियंत्रण से बाहर नहीं जाए।

क्योटो सम्मेलन- 1997

क्योटो में 1997 में हुई संधि की मुख्य बात ये थी कि औद्योगीकृत देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को 1990 के स्तर से, करीब सवा पांच प्रतिशत कम करेंगे। क्योटो संधि बाध्यकारी नहीं थी, अमरीका ने इस पर हस्ताक्षर भी नहीं किए थे। इसलिए इससे ज्यादा उम्मीदें लगाई भी नहीं गई थीं। यह संधि 2012 में खत्म हो रही है।

बाली सम्मेलन- 2007

दो साल पहले बाली सम्मेलन में तय हुआ था कि ग्लोबल वामिंüग के खिलाफ प्रभावी और दीर्घकालिक उपायों पर सहमति बनाई जाएगी। इसके लिए दिया गया वक्त कोपेनहेगेन सम्मेलन के साथ ही खत्म होने वाला है।

इधर चीन वर्ष 2050 तक अपनी कुल ऊर्जा खपत में एक तिहाई हिस्से की आपूर्ति नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से करने की योजना बना रहा है।चीन के एक स्थानीय अखबार ने यह खबर दी है। कोयले पर पूरी तरह निर्भर चीन दुनिया भर में सबसे अधिक मात्रा में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करता है। "चाइना डेली" के मुताबिक वर्ष 2020 तक देश में होने वाली कुल ऊर्जा खपत में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत पहुंचने का अनुमान है।
अखबार ने ऊर्जा अनुसंधान संस्थान के महानिदेशक हान वेंक द्वारा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के लिए तैयार किए गए ब्लूप्रिंट  का हवाला देते हुए यह दावा किया है। हान के मुताबिक वर्ष 2030 तक देश की कुल ऊर्जा खपत में नवीकरणीय स्रोतों की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है जिससे एक अरब टन कोयला बचाया जा सकेगा। वर्ष 2050 तक कुल ऊर्जा खपत में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतोंकी हिस्सेदारी बढ़कर एक तिहाई हो जाएगी।
जिससे दो अरब टन कोयले की खपत कम हो जाएगी।12 लाख किलोवाट बिजली पैदा होती है अखबार के मुताबिक चीन में अभी पवन ऊर्जा से 12 लाख किलोवाट से अधिक बिजली पैदा की जाती है जो वर्ष 2000 में साढे तीन लाख किलोवाट ही थी।

2 और 2.5 का फेर 
इस बात पर लगभग आम सहमति है कि धरती के गर्म होते जाने का असर जलवायु और जैव-विविधता पर पड़ना अवश्यम्भावी है। ग्लोबल वार्मिग के दुष्प्रभावों को नियंत्रित करने के लिए जरूरी है कि औद्योगीकरण से पहले के मुकाबले धरती के तापमान में वृद्धि 2 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा नहीं हो। तापमान में इससे ज्यादा वृद्धि नहीं हो, इसके लिए जरूरी है कि वातावरण में कार्बन की मात्रा में 2.5 लाख मेगाटन से ज्यादा की वृद्धि नहीं हो।



जबकि  कोपेनहेगेन में जलवायु सम्मेलन के दस दिन पहले फ़्रांस और ब्रिटेन ने विकासशील देशों में पर्यावरण सुरक्षा क़दमों में मदद के लिए विकसित देशों का एक कोष बनाने का सुझाव दिया था . त्रिनिडाड व टोबैगो में त्रेपन सदस्यों वाले राष्ट्रकुल देशों के शिखर सम्मेलन की शुरुआत में ब्रिटिश प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने कहा था  कि उनका देश 10 अरब डॉलर का कोष बनाने का प्रस्ताव दे रहा है और स्वयं आनेवाले तीन वर्षों में उसमें 1.3 अरब डॉलर का योगदान देगा. सम्मेलन में मेहमान के तौर पर भाग ले रहे फ़्रांसीसी राष्ट्रपति निकोला सारकोज़ी ने कहा था  कि कोपेनहेगेन में तय होना चाहिए कि इस कोष में 2010 से 2012 तक हर साल 10 अरब डॉलर जमा किए जाएंगे. अगले ही साल से ग़रीब देश इस कोष का लाभ उठा सकेंगे. पर इसमें से कुछ वास्तविक भी है या महज घोषणा भर. कोपेनहेगेन से कुछ निकलेगा इसकी संभावना नहीं के बराबर है । सवाल है जो पर्यावरण अमेरिका के लिये अर्थशास्त्र है, वही पर्यावरण हमारे लिये संस्कृति है । और कोपेनहेगेन में इसी संस्कृति को कानूनी जामा पहनाकर टेक्नालाजी बेचने-खरीदने का धंधा शुरु हुआ है । संस्कृति बेचकर विकासशील देशो के उन्हीं उघोगों और कारपोरेट सेक्टरो को कमाने के लिये कोपेनहेगेन में 200 बिलियन डालर है जिनके धंधे तले भारत में किसानी खतरे में पड चुकी है और पीने का पानी दुर्लभ हो रहा है । मनमोहन सिंह भी इसी समझ पर ठप्पा लगाने 18 दिसंबर को कोपेनहेगेन जायेंगे। मनमोहन के अर्थशास्त्र ने जो नयी सस्कृति देश में परोसी है, उसमें धंधे और मुनाफे में सबकुछ सिमट गया है । लोकतंत्र का हर पहरुआ पहेल मुनाफा बनाता है फिर सवाल खड़ा करता है । अछूता चौथा खम्भा यानी मीडिया भी नहीं है। जाहिर है धंधा मीडिया की जरुरत बन चुकी है तो कोपेनहेगेन को लेकर उसकी रिपोर्टिग भी उसी दिशा में बहेगी जिस दिशा में मुनाफा पानी तक सोख ले रहा है । पृथ्वी गर्म हो रही है। जीवन को खतरा है । 2012 तक सबकुछ खत्म हो जायेगा.....कुछ इसी तरह अखबार और न्यूज चैनल लगातार खबरे दिखा भी रहे है । इसी मीडिया के लिये कोई मायने नहीं रखता कि आधुनिकता और औघोगिकरण के साये में कैसे मानसून को ही छिन लिया गया । बीते बीस सालों के मनमोहनइक्नामिक्स के दौर में 45 हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या कर ली और नौ फीसदी खेती योग्य जमीन को बंजर बनाया गया । चार फिसदी खेती की जमीन को उघोगों ने हड़प लिया । यह सवाल मीडिया के लिये मौजू नहीं है । याद कीजिये कैसे दो दशक पहले तक एक बहस होती थी कि पत्रकारिता और साहित्य एक दूसरे से जुडे हुये हैतब सरोकार का सवाल सबसे बड़ा माना जाता है । लेकिन नये दौर में पत्रकारिता बिकने को तैयार है तो साहित्य कमरे में बौद्धिकता से दो दो हाथ कर रहा है । कहते है तीसरा विश्वयुद्द पानी को लेकर ही होगा । ऐसे में बात कोपेनहेगेन की क्या करें........... 


होगा वही जो अमेरिका और उसके पिछलग्गू चाहेंगे और शायद सबसे पीछे की कतार में हम खड़े नजर आयेंगे.






Low Floor Bushes: Who is the villen?

 Bus caught fire


मेट्रो की तरह डीटीसी की लो फ्लोर बसों के भी दिन अच्छे नहीं नजर आ रहे हैं। बृहस्पतिवार को दो बसों में फिर आग लग गई। हालांकि किसी भी यात्री को आंच तक नहीं आई, लेकिन यह बसें मानो मुसीबत बनती जा रही हैं। सरकार ने बस बनाने वाली कंपनी टाटा मोटर्स को कड़ी फटकार लगाई है। डिपो और कंपनी के मैनेजर को निलंबित कर दिया गया। घटना की जांच के लिए चार विशेषज्ञों की एक कमेटी बना दी गई है, जो महीने भर में रिपोर्ट सौंपेगी। पर  दिल्ली में डीटीसी की लो-फ्लोर बसों में आग लगने का सिलसिला ठहरने का नाम नहीं ले रहा है। रविवार रविवार सुबह करीब पौने सात बजे सागर पुर में डीटीसी बस के पिछले हिस्से में आग लग गई. इससे पहले बीते दिन शनिवार को पहली घटना बदरपुर से गुड़गांव जा रही बस में हुई, जिसमें 50 से ज्यादा मुसाफिर थे। सुबह करीब सवा नौ बजे बस महरौली-बदरपुर रोड पर लाल कुआं के सामने से गुजर रही थी, तभी इंजन से धुआं निकलने लगा। बस के पहिये भी जाम हो गए थे। दूसरी घटना अक्षरधाम फ्लाईओवर के पास हुई। रूट नंबर-355 की बस आनंद पर्वत से नोएडा जा रही थी। दोपहर करीब 12 बजे बस अक्षरधाम फ्लाईओवर के नीचे पहुंची तो बस के पीछे वाले राइट साइड के पहिये से धुआं निकलने लगा। उस वक्त बस में करीब 45 सवारियां थीं। ड्राइवर और कंडक्टर ने बस को तुरंत खाली करा लिया।


लो फ्लोर ग्रीन बसों में आग की पिछली घटनाएं 
30 मार्च: राम मनोहर लोहिया अस्पताल के पास रूट नंबर आरएल-77 की बस में आग से काफी नुकसान।
30 नवंबर: राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल के पास रूट नंबर आरएल-77 की बस में आग से मामूली नुकसान।
3 दिसंबर: मोती नगर इलाके में रूट नंबर 832 की बस पूरी तरह से जल गई।
3 दिसंबर : अमर कॉलोनी इलाके में रूट नंबर 724 की बस में आग से मामूली नुकसान। 



इस आग का धुआं कल सोमवार को विधान सभा में भी उठा. दिल्ली  में एक के बाद एक आये दिन लो फ्लोर बसों में आग लगने की घटनाओं का मामला सोमवार को दिल्ली विधानसभा में जोर-शोर से उठाया गया। शीला सरकार ने टाटा पर 4 करो़ड रूपए का जुर्माना किया है और 150 करो़ड रूपए का भुगतान भी रोक लिया है।
इस मामले में परिवहन मंत्री द्वारा दिए गए जवाब से असन्तुष्ट विपक्ष भाजपा ने सदन का बहिष्कार किया। सदस्यों द्वारा उठाये गए इस मामले में परिवहन मंत्री अरविन्द्र सिंह ने कहा कि लो फ्लोर बसें दिल्लीवासियों के लिए पूरी तरह से ठीक हैं। उन्होंने दावा किया कि अब तक एक ही बस में आग लगी है। अन्य बसों में जो घटनाएं हुई उसका सी.एन.जी. कारण नहीं है इन घटनाओं की तकनीकी जांच की जा रही है और जो कमियां पाई जाएंगी उन्हें जल्दी ठीक किया जाएगा।
परिवहन मंत्री ने जानकारी दी कि इन घटनाओं को देखते हुए सरकार ने बस निर्माता टाटा कम्पनी की नई आने वाली बसों का भुगतान रोक दिया है साथ ही कम्पनी पर चार करो़ड रूपए की पेनल्टी लगाई गई है। अरविन्दर सिंह ने कहा कि डी.टी.सी. के बेडे में कुल 991 लो फ्लोर बसें है और इनकी नियमित जांच के बाद ही प्रतिदिन स़डकों पर उतारा जाता है उन्होंने कहा कि अब तक सी.एन.जी. के कारण एक ही बस में आग लगी है। अन्य घटनाएं तकनीकी कारणों से हुई। जिनकी जांच की जा रही है।
उन्होंने कहा कि सरकार इन घटनाओं के प्रति पूरी तरह से चिन्तित है। इसके लिए जहां चार विशेषज्ञों की जांच कमेटी गठित की गई है वहीं टाटा कम्पनी को भी इस मामले में क़डे निर्देश दिए गए हैं और स्पष्ट कहा गया कि वह बसों के रखरखाव सिस्टम को और दुरूस्त करें वरना उसका कान्टैक्ट रद्द भी किया जा सकता है।

पब्लिक के खून पसीने की कमाई खर्च करके भारी भारी भरकम कीमत पर खरीदी गई डीटीसी की लो फ्लोर में आग लगने की घटना ने दिल्ली की बसों की सेफ्टी पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। ये हादसे इसलिए भी गंभीर हैं, क्योंकि न सिर्फ इन बसों की खरीद पर भारी रकम खर्च की गई बल्कि इनके रखरखाव पर डीटीसी को रोजाना लाखों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। हालत यह है कि अगर इन बसों की मेंटेनेंस शर्तों को देखा जाए तो बसों को खरीदने के लिए जितनी कीमत दी गई है, उतनी ही कीमत इन रखरखाव के तौर पर भी दी जाएगी। इसके बावजूद बसों में आग लगने से साफ हो गया है कि पूरे सिस्टम में ही खामियां हैं, जिन्हें दुरुस्त करने की जरूरत है। 
1. मेंटेनेंस : जब बसों को खरीदने के साथ ही उनकी मेंटेनेंस की शर्त जोड़ी गई थी, उस वक्त डीटीसी ने दावा किया था कि इससे शहर में बस व्यवस्था दुरुस्त होगी और चूंकि बस बनाने वाली कंपनी के एक्सपर्ट कर्मचारी ही मेंटेनेंस करेंगे इसलिए सुबह वक्त पर बसें तैयार मिलेंगी। लेकिन हुआ उलटा। हालात यह हैं कि डिपो में मेंटेनेंस पहले से ही बदतर हो गई है। डीटीसी की सौ बसों वाले डिपो में जितना स्टॉफ रखा जाता था, प्राइवेट कंपनी उससे आधा ही रखती है। यह स्टॉफ भी अनट्रेंड है। कई जगह तो कंपनी ने मेंटेनेंस का काम आगे ठेके पर दे दिया है। इन्हें इतना कम वेतन दिया जाता है कि डीटीसी के अधिकारी किसी कर्मचारी को ठीक मेंटेनेंस के लिए डांट देते हैं तो वह कर्मचारी अगले दिन आता ही नहीं है। कायदे से मेंटेनेंस के लिए हर डिपो में ऑटोमोबाइल या मेकेनिकल इंजीनियर होना चाहिए। लेकिन प्राइवेट कंपनी की बसों वाले डिपो में कोई सीनियर इंजीनियर ही नहीं होता। 

2. डीटीसी प्रबंधन  : बसों की मेंटेनेंस करने वाली कंपनी के प्रति डीटीसी के ही कुछ अफसरों की सहानुभूति है। यही वजह है कि कुछ अरसा पहले ठीक तरह से मेंटेनेंस न करने के कारण डीटीसी के कुछ अफसरों ने इस कंपनी पर जुर्माना ठोक दिया था लेकिन डीटीसी के ही कुछ अफसरों ने जुर्माना ठोकने वाले अफसरों की पीठ थपथपाने की बजाय जुर्माने की राशि को ही ज्यादा बताते हुए कमिटी बना दी। यही वजह है कि बसों की मेंटीनेंस पर ही ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता।

3. अनाड़ी ड्राइवर : नई नवेली बसों की बुरी हालत के लिए कुछ हद तक डीटीसी के वे ड्राइवर भी जिम्मेदार हैं, जो अनाड़ी हैं। डीटीसी ने कथित तौर पर भ्रष्टाचार खत्म करने के इरादे से दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड के जरिए ड्राइवर तो नियुक्त कर दिए लेकिन उनमें से कई ड्राइवर तो ऐसे हैं, जिन्होंने इससे पहले शहर की सड़कों पर कभी बस चलाई ही नहीं। यही वजह है कि इन ड्राइवरों को इन अत्याधुनिक बसों की ज्यादा जानकारी ही नहीं हैं। डीटीसी के ही एक वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी का कहना है कि लो फ्लोर बसों में गुरुवार को जो हादसे हुए हैं, उनमें बस के पिछले पहिए जाम हो गए। पहिया जब जाम होने लगता है तो बस उसी तरह से भारी हो जाती है, जैसे टायर पंक्चर होने पर होता है। ऐसे में ट्रेंड ड्राइवर फौरन बस रोककर जांच करता है। लेकिन ड्राइवर अगर बस चलाता रहता है तो उससे इसी तरह टायर गर्म होकर फट जाता है और आग लग जाती है। गुरुवार को भी दोनों ही बसों में पहिया जाम होने की वजह से बस में आग लगी। सीमापुरी में भी तीन महीने पहले इसी तरह बस में आग लगी थी।

4. जिम्मेदारी  : मेंटेनेंस की शर्तें तय होने केबावजूद अब तक जिम्मेदारी तय नहीं है। हालांकि जिन डिपो में लो फ्लोर बसें हैं और उनमें मेंटेनेंस प्राइवेट कंपनी के जिम्मे है लेकिन यह ठीक हो रही है या नहीं, इसे लेकर कोई जवाबदेही तय नहीं है। डिपो में तैनात डीटीसी कर्मचारियों की जिम्मेदारी महज इतनी है कि जब बस डिपो से बाहर पैसेंजरों के लिए तो वह साफ हो। लेकिन बस मेकेनिकल तौर पर दुरुस्त है या नहीं, इसे जांचने का जिम्मा किसका होगा, कोई नहीं जानता। यही वजह है कि बस में खराबी का तभी पता चलता है, जब वह रास्ते में खराब होती है या फिर उसमें आग लगने जैसी कोई घटना होती है।

5. अनसेफ डिज़ाइन  : जब ये बसें खरीदी गईं तो दावा किया गया था कि इनमें ऐसा मटीरियल इस्तेमाल हुआ है जो जल्दी आग नहीं पकड़ता। लेकिन इन घटनाओं से साफ हो गया है कि इसमें दम नहीं है। पीछे इंजन लगा है लेकिन सीटें उसके ऊपर ही बना है। कई एक्सपर्ट इस बस की बॉडी के डिजाइन को ही अनसेफ मानते हैं। आईएफटीआरटी इंडियन फाउंडेशन फॉर ट्रांसपोर्ट रिसर्च के को-ऑर्डिनेटर एस. पी. सिंह बसों का मेंटेनेंस में तो गड़बड़ है डिजाइन भी सेफ नहीं है।



कृपया लिंक पर क्लिक करें और खुद देख लें http://navbharattimes.indiatimes.com/delhiarticleshow/5297872.cms 


६. बस बॉडी कोड लागू नहीं : केंद्र सरकार ने बसों की सेफ्टी के लिए बस बॉडी कोड लागू किया है। यह कोड पिछले साल 1 अक्टूबर को लागू होना था, लेकिन कागजातों का अनुवाद न होने की वजह से मामला टल गया। हालांकि कानूनी तौर पर इस बस बॉडी कोड को लागू करना जरूरी नहीं है, लेकिन अगर डीटीसी चाहती तो इस बस बॉडी कोड को अपनी बसों में तो लागू कर ही सकती थी। इस बस बॉडी कोड में बसों में लगने वाली हर चीज के स्तर का कोड तय है। ऐसे में अगर बस बॉडी कोड लागू होता है तो जाहिर है कि इन बसों की सेफ्टी के प्रति पैसेंजरों का विश्वास और बढ़ सकता है।

७.टाइप अप्रूवल : इन बसों के टाइप अप्रूवल को लेकर भी तकनीकी जानकार सवाल उठा रहे हैं। दरअसल, जब भी कोई नया वाहन तैयार होता है, उसका पहले टाइप अप्रूवल लिया जाना जरूरी होता है। इंडियन फाउंडेशन ऑफ ट्रांसपोर्ट रिसर्च एंड ट्रेनिंग के को-ऑडिर्नेटर एस.पी. सिंह का कहना है कि पहले बसों का टाइप अप्रूवल पुणे की एक एजेंसी (एआरएआई) से लिया जाता था, लेकिन अब इन बसों के लिए अहमद नगर की एजेंसी वीआरडीई से टाइप अप्रूवल लिया गया है। सिंह का कहना है कि यह पता लगाया जाना जरूरी है कि आखिर इन बसों के लिए टाइप अप्रूवल एआरएआई से क्यों नहीं लिया गया जबकि अब तक यही बस बनाने वाली कंपनी एआरएआई से ही टाइप अप्रूवल लेती रही है। उनका कहना है कि इन बसों में जिस तरह से हादसे हो रहे हैं, उससे साफ है कि इन बसों में मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट है और उसे दुरुस्त किया जाना जरूरी है।



पर एक बात अभी भी सोचने की है की यही लो फ्लोर बसें दिल्ली के अलावा और भी शहरों में चल रही हैं पर वह ऐसी दुर्घटना की बात सामने नहीं आई है. अगर आई हो तो कृपया बताएं. फिर वजह कहीं कुछ और तो नहीं?  




कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए दिल्ली के रंग-रूप को चार चांद लगाने में एक तरफ तो मेट्रो और दूसरी तरफ लो फ्लोर बसों का खासा योगदान माना जा सकता है। हरी और लाल लो फ्लोर बसें जब सड़कों पर इठलाती-बलखाती चलती हैंतो मन का गदगद हो जाना स्वाभाविक ही है। एक संकेत मिलता है कि हम वर्ल्ड क्लास सिटी के नागरिक बनने की ओर अग्रसर हैं।



मगरयह खुशी यह संतोष पल भर में ही काफूर हो जाता हैक्योंकि जिन बसों की सुंदरता पर हम और आप फिदा हो रहे हैंवह केवल दिखावा ही है। इसे इत्तफाक नहीं कहा जा सकताक्योंकि जब एक महीने में ही चार बसों में आग लग जाए तो कोई भी कह उठेगा कि दाल में काला जरूर हैतभी तो ये खूबसूरत बसें धुएं के गुबार में समा रही हैं।



दरअसलइन बसों की खरीद से लेकर मेंटिनंस तक हर कदम पर इतने आरोप लगते रहे हैं कि हर बार ऐसी घटना पर ठिठकना पड़ता है। बसों की खरीद का मामला लोकायुक्त के पास लंबित है और अब बसों की मेंटिनंस पर भी सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। दिल्ली सरकार द्वारा खरीदी जा रही एक लो फ्लोर सीएनजी बस की कीमत 50 लाख रुपये से अधिक है।



मामला केवल इसी कीमत पर ही नहीं रुकताबल्कि सच तो यह है कि हर साल रखरखाव के नाम पर लगभग 10 लाख रुपये एक बस पर खर्च किए जाते हैं। ऐन्युअल मेंटिनंस कॉन्ट्रैक्ट यानी एएमसी की शर्त बस की खरीद के साथ ही जुड़ी हुई है। एक बस की उम्र आमतौर पर 8 साल मानी जाती है और सरकार प्रति बस करीब 85 लाख रुपये मेंटिनंस ही दे रही है। कुल मिलाकर हिसाब लगाएं तो एक बस 1.35 करोड़ रुपये की बैठती है। हालाँकि 


सरकार ने बसों के खराब रख-रखाव के लिए टेल्‍को पर 4 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया है.सरकार ने चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर इसी तरह हादसे जारी रहे, तो आपराधिक मामला दर्ज किया जाएगा. पूरे मामले की जांच के लिए 4 सदस्‍यीय कमेटी बनाई गई है, जो 1 महीने के अंदर रिपोर्ट पेश करगी. बहरहाल, आरामदायक और सुरक्षित यातायात की चाहत रखने वाले राजधानीवासी को अभी भी सरकार के ठोस कदम का इंतजार है. अब देखते हैं की आगे क्या होगा या क्या होने वाला है फिलहाल कोई राहत तो नहीं दिख रही है और न ही कुछ नया सुनने को आ रहा है बस तलाश है एक बलि के बकरे की? देखते हैं किसकी बलि चद्ती है. तबतक के लिए बस इतना जान लें की ये है दिल्ली मेरी जान!



Wednesday, December 9, 2009

Why Telangana?

बुधवार देर रात जैसे ही केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने अलग तेलंगाना राज्य की प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की, हैदराबाद और अन्य ज़िलों में उत्सव जैसा माहौल हो गया. किन्तु यह बात समझ से परे है की क्या एक तेलंगाना की स्वीकृति का क्या अर्थ लिया जाये?  चलिए इससे पहले आपको तेलंगाना राज्य की पृष्ठभूमि से परिचित कराता हूँ. अभी जिस क्षेत्र को तेलंगाना कहा जाता है, उसमें आंध्र प्रदेश के 23 ज़िलों में से 10 ज़िले आते हैं.




मूल रूप से ये निज़ाम की हैदराबाद रियासत का हिस्सा था.इस क्षेत्र से आंध्र प्रदेश की 294 में से 119 विधानसभा सीटें आती हैं. 1948 में भारत ने निज़ाम की रियासत का अंत कर दिया और हैदराबाद राज्य का गठन किया गया. निजाम के अधीन कुतुबशाही शासन के कारण जीवनशैली और भाषण के मामले में तेलंगाना उत्तर भारत के ज्यादा निकट है। दोनों क्षेत्रों के प्रमुख उत्सव भी अलग-अलग हैं।
1956 में हैदराबाद का हिस्सा रहे तेलंगाना को नवगठित आंध्र प्रदेश में मिला दिया गया.निज़ाम के शासनाधीन रहे कुछ हिस्से कर्नाटक और महाराष्ट्र में मिला दिए गए. इस प्रकार  भाषा के आधार पर गठित होने वाला आंध्र प्रदेश पहला राज्य बना. 

चालीस के दशक में कामरेड वासुपुन्यया कि अगुवाई में कम्‍युनिस्टों ने पृथक तेलंगाना की मुहिम की शुरूआत की थी.उस समय इस आंदोलन का उद्देश्य था भूमिहीनों कों भूपति बनाना.छह वर्षों तक यह आंदोलन चला लेकिन बाद में इसकी कमर टूट गई और इसकी कमान नक्सलवादियों के हाथ में आ गई. आज भी इस इलाक़े में नक्सलवादी सक्रिय हैं.1969 में तेलंगाना आंदोलन फिर शुरू हुआ था.दरअसल दोनों इलाक़ों में भारी असमानता है. आंध्र मद्रास प्रेसेडेंसी का हिस्सा था और वहाँ शिक्षा और विकास का स्तर काफ़ी ऊँचा था जबकि तेलंगाना इन मामलों में पिछड़ा है.तेलंगाना क्षेत्र के लोगों ने आंध्र में विलय का विरोध किया था. उन्हें डर था कि वो नौकरियों के मामले में पिछड़ जाएंगे.अब भी दोनों क्षेत्र में ये अंतर बना हुआ है. साथ ही सांस्कृतिक रूप से भी दोनों क्षेत्रों में अंतर है. इस कारण हमेशा राजनितिक रूप से तेलंगाना को संतुष्ट करने के प्रयास किये जाते रहे. शुरुआत में तेलंगाना को लेकर छात्रों ने आंदोलन शुरू किया था लेकिन इसमें लोगों की भागीदारी ने इसे ऐतिहासिक बना दिया.इस आंदोलन के दौरान पुलिस फ़ायरिंग और लाठी चार्ज में साढे तीन सौ से अधिक छात्र मारे गए थे.उस्मानिया विश्वविद्यालय इस आंदोलन का केंद्र था.उस दौरान एम चेन्ना रेड्डी ने 'जय तेलंगाना' का नारा उछाला था लेकिन बाद में उन्होंने अपनी पार्टी तेलंगाना प्रजा राज्यम पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया.इससे आंदोलन को भारी झटका लगा.इसके बाद इंदिरा गांधी ने उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया था.1971 में नरसिंह राव को भी आंध्र प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया था क्योंकि वे तेलंगाना क्षेत्र के थे. चलिए अब के सी आर की बात करते हैं. नब्बे के दशक में के चंद्रशेखर राव तेलुगु देशम पार्टी के हिस्सा हुआ करते थे.1999 के चुनावों के बाद चंद्रशेखर राव को उम्मीद थी कि उन्हें मंत्री बनाया जाएगा लेकिन उन्हें डिप्टी स्पीकर बनाया गया.वर्ष 2001 में उन्होंने पृथक तेलंगाना का मुद्दा उठाते हुए तेलुगु देशम पार्टी छोड़ दी और तेलंगाना राष्ट्र समिति का गठन कर दिया. 2004 में पृथक तेलंगाना की वायदा करके कांग्र्रेस ने केसीआर के साथ चुनाव लड़ा लेकिन बाद में वे वायदे से मुकर गए। तब वाई एस राजशेखर रेड्डी ने चंद्रशेखर राव से हाथ मिला लिया था  और पृथक तेलंगाना राज्य का वादा किया.बाद में उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया. इसके बाद तेलंगाना राष्ट्र समिति के विधायकों ने इस्तीफ़ा दे दिया और चंद्रशेखर राव ने भी केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया था.
अलग तेलंगाना राज्य के गठन की प्रक्रिया शुरु करने की केंद्र सरकार की घोषणा ने तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के नेता चंद्रशेखर राव यानी केसीआर को हीरो बना दिया है. पर क्या यह ख़ुशी देर तक कायम रह पायेगी? इसके साथ ही अब एक बार फिर राज्यों के पुनर्गठन की चर्चा चल पड़ी है। ऐसी खबर है कि सरकार दूसरा राज्य पुनर्गठन आयोग गठित करने की सोच रही है। इसी बीच उत्तर  प्रदेश की चीफ मिनिस्टर मायावती ने भी अपने प्रदेश को तीन हिस्सों में बांटने पर सहमति जताई है। यही सिफारिश कांग्रेस के स्थानीय नेता भी कर चुके हैं। दूसरे तमाम राज्यों में भी बंटवारे की पुरानी मांगें नई करवट लेने लगी हैं। हालांकि ऐसे लोगों की संख्या भी कोई कम नहीं, जो पुनर्गठन आयोग की चर्चा को कांग्रेस की सियासी चाल मानते हैं। तेलंगाना के नेताओं को खास तौर से यह डर सता रहा था  कि अलग राज्य बनाने के अपने कमिटमेंट को टालने के लिए कांग्रेस यह आइडिया खोज लाई है। बहरहाल, इस सियासी हलचल से परे राज्यों के पुनर्गठन का मामला सचमुच विचार की मांग करता है। इस काम में कई तरह की झंझटें तो हैं, लेकिन यह जरूरी है। छोटे राज्यों की मांग गैरवाजिब नहीं कही जा सकती, क्योंकि प्रशासन के लिहाज से बड़े राज्य वाकई अच्छे साबित नहीं होते। यह बात पहले ही साफ हो चुकी है। छोटे राज्यों में काफी हद तक सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक एकरूपता होती है, जिससे विकास योजनाएं बनाना और लागू करना आसान हो जाता है। इस मामले में दिक्कतें यह हैं कि खर्च बढ़ता है, बंटवारे को लेकर असंतोष पैदा होता है और इससे भी छोटे टुकड़ों के लिए मुहिम चल सकती है। फिलहाल करीब दस राज्यों की मांग हो रही है, जैसे गोरखालैंड, कोडागु, विदर्भ, हरित प्रदेश, बुंदेलखंड, पूर्वान्चल, लद्दाख, मिथिलांचल, गोंडवाना और तेलंगाना। डर है कि अगर इन्हें मान लिया गया, तो ऐसी ही अनगिनत मांगें उठ खड़ी होंगी। यह आशंका सही हो सकती है, लेकिन पुनर्गठन आयोग ऐसे पैमाने बनाए और उन्हें मानने के लिए सभी पार्टियां हामी भरें कि अनचाही मांगें जड़ न जमा सकें। फिर भी अगर कोई मांग पैमानों पर खरी हो, तो उसे एडजस्ट करने में ऐतराज क्यों होना चाहिए? राज्यों के बीच आपसी विवाद जरूर एक बड़ा मुद्दा है। जैसे कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा और उड़ीसा में कुछ इलाकों को लेकर विवाद जारी हैं, या फिर नदियों के बंटवारे को लेकर टकराव की नौबत आ जाती है। पुनर्गठन आयोग अगर ऐसे मामलों पर आम सहमति नहीं बनाएगा, तो दसियों नए झगड़े गले पड़ जाएंगे। लिहाजा इस मुद्दे पर बहुत सावधानी की जरूरत है। लेकिन कुल मिलाकर पुनर्गठन का आइडिया फायदेमंद हो सकता है, बशर्ते सभी पार्टियां और संगठन अच्छी नीयत से मिलकर काम करें। एक बात इस सिलसिले में सभी को याद रखनी चाहिए कि तमाम खूबियों के बावजूद छोटे राज्य भी लोगों का भला करने में नाकाम साबित हो जाएंगे, अगर सत्ता का विकेंद्रीकरण नहीं किया गया। विकेंद्रीकरण का कोई विकल्प नहीं, यानी सरकार को अपना आकार घटाना होगा, लालफीताशाही खत्म करनी होगी और नीतियों का निर्माण लोकल लेवल से शुरू करना होगा। कुल मिलकर अभी भी यही समझ में आता है की छोटे राज्यों की मांग के पीछे इनके पीछे सामाजिक और आर्थिक कारक तो हो सकते हैं, लेकिन राजनीतिक कारण सबसे ऊपर हैं। योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष और दसवें वित्ता आयोग के अध्यक्ष रहे कृष्ण चंद पंत अच्छे प्रशासन के लिए छोटे राज्यों के गठन के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन वे मात्र इसे ही विकास की गारंटी नहीं मानते! उनके अनुसार  नए राज्यों की यह मांग 1950 के दशक में बने पहले राज्य पुनर्गठन आयोग की याद दिलाती है। उस वक्त राज्यों के बंटवारे का आधार भाषाई था। इसके पीछे भी एक इतिहास था, क्योंकि स्वतंत्रता आंदोलन में गांधीजी के समय में यह बात उठी थी कि जनतंत्र में प्रशासन को आम लोगों की भाषा में काम करना चाहिए। इससे प्रशासन लोगों के नजदीक आ सकेगा। इसी वजह से तब भाषा के आधार पर राज्य बने। अगर उस वक्त भाषा आधार न होता और खुला मैंडेट होता यानी जहां से दबाव आए वहां बात मान ली जाए तो यह काम बहुत मुश्किल हो जाता। भाषा के आधार पर उस समय जो राज्य बने वह आम तौर पर ठीक रहे। दो राज्यों में कोशिश की गई कि इन्हें द्विभाषी रखा जाए-एक बंबई, जिसमें गुजराती व मराठी लोग थे तथा दूसरा था पंजाब, जहां पंजाबी-हिंदी भाषी थे, लेकिन अंत में इन्हें भी भाषाई आधार पर महाराष्ट्र व गुजरात तथा पंजाब व हरियाणा में बांटना पड़ा। इसलिए नए राज्यों के गठन की दिशा में कोई कदम उठाने से पहले बेहद सावधानी बरती जानी चाहिए। यह मुझे जनवरी २८, २००९ को उनके दैनिक जागरण में छपे साक्षात्कार को पढने से पता चला था. आप भी चाहे तो इस लिंक पर जाकर उनके विचार जान सकते हैं.http://in.jagran.yahoo.com/news/opinion/general/6_3_4121468.html. खैर अब आगे चलते हैं. छोटे राज्यों को लेकर जो बहस चल रही है उसके लाभ-हानि वाले, दोनों पहलू हैं। उदाहरण के लिए हरियाणा है, जहां राज्य बनने के बाद आर्थिक प्रगति हुई है और प्रशासन की पकड़ बढ़ी है। उत्ताराखंड का अनुभव भी अच्छा रहा है। मगर सामान्य तौर पर यह कहना पूरी तरह सही नहीं है कि छोटा राज्य बना दिए जाने भर से विकास व प्रशासन, दोनों मोर्चो पर आप झंडा गाड़ देंगे। कई राज्यों में विकास और अच्छे प्रशासन की बातें सही साबित नहीं हुई हैं। झारखंड व छत्तीसगढ़  में उठ रहे सवाल व समस्याएं इसका प्रमाण हैं। प्रगति के लिए राजनीतिक स्थिरता जरूरी है, मगर छोटे राज्यों में इसका अनुभव अच्छा नहीं रहा है।गोवा, झारखंड, मणिपुर, नगालैंड जैसे छोटे राज्यों में बराबर उथल-पुथल मचती रहती है। दल-बदल कानून का फायदा तो हुआ है, पर फिर भी राज्यों में अस्थिरता एक समस्या के रूप में सामने आ रही है। राज्यों के निर्माण में इन सारे पहलुओं पर भी विचार करना जरूरी है। खास तौर पर एक सवाल रह-रह कर मेरे जेहन में उठता रहता है की क्या क्षेत्रीय भावनाएं जिस तरह उभर रही हैं उसमें नए राज्यों का पिटारा खोलना क्या हमारे संघीय ढांचे की मजबूती में दरारें नहीं बढ़ाएगा?  पर दूसरी ओर यह भी सही है कि जब तक देश के समक्ष गरीबी, कुपोषण, बेकारी तथा सामाजिक-आर्थिक असंतुलन की विकराल समस्याएं हल नहीं होतीं तब तक नए राज्यों की ऐसी मांगों को रोकना मुश्किल होगा। ऐसे में लोगों के असंतोष को हवा देना खतरनाक हो सकता है। नि:संदेह इस पहलू पर सचेत रहने की जरूरत है।  दूसरी ओर भूमंडलीकरण और बाज़ार की ताक़त के ज़ोर पर मनचाहे सौदे करने वाले दौर में राजनीतिक कुशलता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों के आधार पर गठित तीन राज्यों झारखंड, उत्तरांचल और छत्तीसगढ़ आज राजनीतिक रुप से अलग अलग स्थितियों में हैं लेकिन पहले तीन वर्षों की इनकी उपलब्धियाँ इनके निर्माण की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह बनकर खड़ी हैं. विकास, बढ़िया प्रशासन, क्षेत्रीय अस्मिता वगैरह की बातें मात्र कुछ  वर्षों बाद भी किसी को याद हो ऐसा नहीं लगता.झारखंड की हालत शायद सबसे ख़राब है. जबकि प्राकृतिक संसाधनों और स्पष्ट आदिवासी पहचान के चलते इसके विकास और पहचान की संभावना सबसे ज़्यादा थी और शायद अब भी है. नक्सली यहाँ के काफ़ी बड़े इलाक़े में समानांतर शासन चला रहे हैं और उनका प्रभाव क्षेत्र तीन वर्षों में काफ़ी बढ़ा है.मंत्रीमंडल और शासन में साझेदार दल यहाँ प्रेशर ग्रुप की तरह काम नहीं करते, बल्कि वे सत्ता और लूट के साझेदार बने हुए हैं. ठेकेदार, व्यापारी, अधिकारी और नेताओं का जितना प्रबल गठजोड़ झारखंड में दिखता है वैसा आज कहीं नहीं है.

यह माना जा रहा था कि प्राकृतिक संसाधनों का ख़जाना होने तथा कलकत्ता और मुंबई से सीधे जुड़े होने के चलते झारखंड में तेज़ी से पूँजी निवेश होगा, बड़े-बड़े उद्योग लगेंगे पर राजनीतिक-प्रशासनिक अराजकता ने ऐसा होने नहीं दिया है.
उल्टे इस बीच मोदी समूह ने बिहार स्पंज का बचा खुचा कारोबार समेटा, जमशेदपुर से लगा आदित्यपुर औद्योगिकक्षेत्र सूना हुआ और निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र की कई इकाइयों ने दम तोड़ा है.होने को सिर्फ़ सड़क और पुलिया का निर्माण हुआ है जिसमें ठीक-ठाक राजस्व वाले इस प्रदेश की पूँजी सड़क पर जाने के साथ-साथ ठेकेदार, इंजीनियर, अधिकारी और नेताओं की जेबों में भी गई है और सब बम-बम कर रहे हैं.एक और विकास हुआ है, जो सिर्फ़ राँची नहीं बल्कि बाक़ी दोनों प्रदेशों की राजधानी में हुआ है - नई राजधानी विकसित करने की तैयारी. अभी मुख्य काम जगह चुनने का चल रहा है.जिधर मुख्यमंत्री और सरकार की नज़र मुड़ती है वहाँ की ज़मीन मंहगी हो जाती है, बिल्डर लॉबी मालामाल हो रही है.पर हालत यह है कि वे यहीं क़ैद होकर रह गए हैं.
उनके मंत्रियों तक पर झूठे आरोपों का घेरा पड़ जाता है, नौकरशाही हावी रहती है.
कभी चौलाई, मड़वा, कोदा में विदेशियों की दिलचस्प ख़बरें उड़ती हैं तो कभी विकास के नाम पर शहर उजड़ने की.नया निवेश, नया उद्योग, नए कारोबार की ख़बर तो अभी तक सुनाई नहीं पड़ी है.वही नौकरशाह, वही ठेकेदार, वही भाजपा और वही काँग्रेस. बाक़ी राज्य तो एक पार्टी के राज का रोना रो सकते हैं उत्तराँचल ने तो दोनों पार्टियों को भुगत कर देख लिया - समाजवादी पार्टी को वह देखना नहीं चाहता और ब्राह्मण-ठाकुर बहुल राज्य में बहुजन समाज पार्टी के लिए कोई गुँजाइश नहीं है. बड़े उद्योग आने या निवेश के फ़ैसलों का तो पता नहीं लेकिन राज्य प्रशासन कभी नदी बेचने के लिए चर्चा में आया तो कभी सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के विनिवेश के विवाद के चलते.
चुनाव के चलते जो चर्चा हो रही है उसे छोड़ भी दें तो नक्सलियों का आतंक, ठेकों की लूट और चालाक-धूर्त अधिकारियों का राज बढ़ा ही है.
नए राज्य बनने और वहाँ विकास-पिछड़ेपन, शासन-कुशासन की चर्चा का कोई अंत नहीं है. पर इतना ज़रुर लगता है कि जो माँग थी, जो घोषित मंशा थी, वह पूरी नहीं हुई है.उत्तराखंड और झारखंड के नाम पर जो लंबी लड़ाई चली और उन आंदोलनों पर जो राजनीतिक रोटियाँ सेंकीं गईं वह सब धरी रह गईं. आदिवासी राज, अपना राज, विकास और सुशासन जैसी चींजें कहीं नहीं दिखतीं. एक और चीज़ न देखें तो चर्चा अधूरी रहेगी.
भूमंडलीकरण और बाज़ार के आकार की ताक़त के आधार पर बेहतर सौदा पटाने के युग में छोटे राज्यों की सार्थकता पर सवाल उठाना ज़रुरी है.
भुखमरी, ख़ुदकशी, नक्सली आतंक, बच्चे बेचने जैसी बदनामी झेलने वाले आँध्र प्रदेश ने इस बीच क्या-क्या पाया है यह याद करना ज़रुरी है.चंद्राबाबू नायडू कितनी बार लाखों टन अनाज, मनचाही नियुक्तियाँ और अरबों का निवेश ले आए हैं इसे याद करना चाहिएसारी मारकाट, सारी बदनामी और सारी मानवनिर्मित आपदाएँ झेलने के बाद गुजरात ने क्या पाया है यह भी याद करना ज़रुरी है.ऐसे में लगता है कि चार सांसदों वाले उत्तराँचल और 14 सांसदों वाले झारखंड की आवाज़ कौन कहाँ सुनेगा?


पर इन छोटे राज्यों की उठती मांग और क्षेत्रीयता के बढ़ते जोर से मैं कही और से भी सशंकित रहता हूँ की  कहीं यह सब मात्र राजनितिक फायदे के लिए तो नहीं हो रहा. जाति-धर्म-क्षेत्र-भाषा और न जाने किस किस प्रकार के विवाद ये लोग समय-समय पर केवल अपने फ़ायदे के लिए उठाते रहते हैं, और सामान्य नागरिकों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके, तमाशा देखते रहते हैं। अगर यह क्रम यूं ही चलता रहा, तो हिंदुस्तान एक राष्ट्र नहीं रह जायेगा। भाषा-धर्म और जाति की विभिन्नता इस महान देश को अनेक क्षेत्रों में टुकड़े-टुकड़े कर देगी। अभी अनेक राज्य इस प्रकार का घृणित खेल खेलने में जुटते जा रहे हैं। चाहे महाराष्ट्र हो या तमिलनाडु, चाहे आसाम हो या कश्मीर, चाहे कर्नाटक हो या उड़ीसा; हर तरफ भाषावाद, क्षेत्रवाद, धर्मवाद और जातिवाद की आग को अधिक से अधिक भड़काया जा रहा है। एक दूसरे की भाषा को सीखने और समझने की बजाय हम लोग एक दूसरे की भाषा का तिरस्कार करने में व्यस्त होते जा रहे हैं हमारी मूर्खता यह है कि हम मतलब परस्त राजनेताओं के बहकावे में उलझते जा रहे हैं। इन बातों से न धर्म पनप पायेगा, न जाति; न भाषा का विकास हो पायेगा, न क्षेत्र का। जो कुछ भला होगा, वह केवल राजनेताओं का ही होगा। अगर हर राज्य को छोटे-छोटे राज्यों में बांट दिया जाये, तो उतने अधिक मुख्य मंत्री और मंत्रिगण बन जायेंगे। अगर हर राज्य को राष्ट्र का स्वरूप दे दिया जाये तो उतने ही अधिक प्रधान मंत्री और मंत्री बन जायेंगे। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल, लोकसभा तथा विधान सभा अध्यक्ष आदि आदि कितने सारे पदों पर आसीन हो जायेंगे कितने सारे नेता। परंतु भाषा या धर्म या जाति के आधार पर विभाजन करने से भले ही राजनेता प्रसन्न हो जाये और गर्वित महसूस करने लगें; लेकिन हिंदुस्तान और हिंदुस्तानियों का क्या होगा। वे तो लज्जित महसूस करने की हालत में भी नहीं रह जायेंगे। अति विशाल राष्ट्र रूस का जो बुरा हाल हो चुका है, हम उससे कोई सबक नहीं ले पा रहे हैं। 
सबसे अधिक शक्तिशाली, सबसे अधिक प्रगतिशील सोवियत रूस को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर भले ही विश्व में राष्ट्रों की संख्या बढ़गयी हो, और अलग-अलग छोटे-छोटे राष्ट्रों में भले ही राजनेताओं की संख्या बढ़गयी हो लेकिन क्या उन सभी राष्ट्रों का वास्तव में विकास हो रहा है, और क्या वहां के नागरिक अब अधिक प्रसन्न दिखायी दे रहे हैं। मेरा व्यक्तिगत मत यह है कि नेताओं का तो विकास हो गया, परंतु राष्ट्र और नागरिक वैसी ही घुटन महसूस कर रहे हैं, जैसी घुटन एक बहुत बड़े मकान में रहनेवाले किसी व्यक्ति को तब महसूस होती है जब उसे छोटे से एक कमरे में रहने के लिए मजबूर कर दिया जाये। हिंदुस्तान में अलग-थलग लोग विभिन्न अवसरों पर अलगाववाद को बढ़ावा देने की कोशिश करते रहते हैं। कश्मीर को तो बहुत सारे लोग हिंदुस्तान का अंग मानते ही नहीं।

केंद्र सरकार भी पता नहीं क्यों उसे विशेष दर्जा देकर अलग रखे हुए है। उत्तर पूर्वी राज्य और दक्षिणी राज्य भी अपने आपको हिंदुस्तान का हिस्सा मानने में हिचकते रहते हैं। पंजाब, खालिस्तान बनते बनते रह गया। हिंदुस्तान का हिस्सा रहे कुछ क्षेत्र, आज पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका कहलाये जानेवाले राष्ट्र बन गये हैं। तिब्बत को चीन निगल ही चुका है और अब सिक्किम भी खतरे में है। पिछले दिनों में  दिल्ली के उपराज्यपाल ने दिल्ली आनेवालों को परमिट लेना होगा कहकर एक चिंगारी लगा दी थी । महाराष्ट्र में कई राजनेता बारबार यह मांग करते रहे हैं कि मुंबई आनेवाले लोगों पर रोक लगायी जाये। उनका कहना है कि यहां केवल मराठी भाषी लोग ही रहने चाहिये।  अब नया शगूफा मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने छेड़ा है. 
यूरोपीय देशों में  वहां के नागरिक बिना वीज़ा लिये एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र में आते-जाते रहते हैं। इसी आधार पर सार्क देशों के संगठन ने भी यह प्रस्ताव रखा था कि सार्क देशों के नागरिक एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र, बिना किसी भी रोकटोक के यात्रा कर सकें। कई ऐसे भी देश हैं जहां जाने के लिए पहले से वीजा  लेने की आवश्यकता नहीं होती और वहां पहुंचने पर वीज़ा मिल जाता है। जब अनेक राष्ट्र, दूसरे राष्ट्रों के नागरिकों को बिना किसी भी प्रकार की रोक-टोक के, आने-जाने की सुविधा प्रदान कर रहे हैं, तब हिंदुस्तान में एक राज्य से दूसरे राज्य में आना-जाना भी मुश्किल होता जा रहा है। सारा विश्व एक कुटुंब के समान है कहनेवाले ही एक देश को भी एकता के सूत्र में बांध नहीं पा रहे हैं। जो कुछ हिंदुस्तान में घटित हो रहा है, वह भले ही अभी मामूली सी बात लग रही हो, परंतु यदि इसे तुरंत काबू में नहीं लाया गया, तो परिणाम बहुत ही भयानक हो सकते हैं। हिंदुस्तान के बारे में अभी तक शान से कहा जाता था कि यह वह राष्ट्र है, जहां अनेकता में एकता का वास है; जहां आपसी स्नेह तथा भाईचारा कदम-कदम पर दिखायी देता है। लेकिन पिछले कुछ समय से अनेकता में एकता का रूप बदल कर एकता में अनेकता को बढ़ावा देनेवाला नज़र आने लगा है। अब स्नेह को द्वेष में और भाईचारे को नफ़रत में बदलने लगे हैं कुछ स्वार्थी राजनेता। केंद्र सरकार और राज्य सरकारें केवल मूकदर्शक बनी रह जाती हैं। नेताओं को सत्ता की चिंता कुछ इस प्रकार सताती रहती है कि वे अपनी कुर्सी के अलावा कुछ और देख ही नहीं पाते हैं। अलग-अलग दलों की मांगों को स्वीकार करना और अपने स्वार्थवश उनके नेताओं के सामने घुटने टेक कर सब कुछ समर्पित कर देना, सरकारों की विवशता बनती जा रही है। अगर यही हालत बहे रहे तो मुझे तो दर लगता है की  अगर हिंदुस्तान की सरकार सख्ती के साथ तुरंत इन अलगाववादी राजनेताओं के साथ पेश नहीं आयेगी, तो वह दिन दूर नहीं, जब हिंदुस्तान में ही एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने के लिए हिंदुस्तान के नागरिकों को ही लेना पड़ेगा - अंतरराज्यीय वीज़ा!